नया संघर्ष
नयी ऊँचाई पे ही
जन्म है लेता।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
'अक्षर' है वो
जो क्षर नहीं होता
ब्रह्म स्वरूप।
रात गुनगुनाती रही,
थपकी देकर सुलाती रही।
औ' हम ख्वाबों में खोये
जागे रहे रात भर।।
परीक्षा-घड़ी
धैर्य और संयम
खोयें ना हम।
वो शब्द नहीं हैं! आँसू हैं जो
कविता बन कागज पे उतर आयें हैं।
कैसे! उन्हें हम मुस्कुरा कर महफिल में गा दें,
जो रूँधे कंठ से लिखे गये हैं।
दूर बजती
मंदिर की घंटियाँ
देती सुकून।
झिलमिलाये
चाँद की छवि
जब-जब छेड़े
चंचल हवा
नदी का जल।