राधा ही नहीं
रूप, रस, माधुरी
कान्हा के साथ।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बंद मुठ्ठी में
अनगिन सपने
लेकर आये।
अरूणिम सुबह हो तुम, सुरमई शाम हो तुम
कड़ी धूप में छाँव हो तुम
प्रिये! मनमीत हो तुम।
जिंदगी तुमसे शुरू, पूरी होगी तुमसे ही
जीवन आधार हो तुम
अंक एक है
शून्य जितने मिले
बढ़ता मान.
बातें उसकी
याद अब आती हैं
जब वो नहीं।
छूने आकाश
चल दिये परिंदे
पक्के इरादे।
आम के बाग
सौधीं सी महक औ'
मीठी सी धूप।