भोर चहकी
इठलाई किरन
महकी क्यारी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बदलते मौसम का हाल क्या कहिये,
सेंसेक्स की तरह चढ़ता-उतरता है पारा।
घोंसला एक
तिनके गूँथ-गूँथ
बया ने रचा।
ज्ञान दीप से
उजियारा जग में
हर युग में।
पार उतारा
केवट ने राम को
या स्वयं तरा।
पीछे ना हटें
बढ़ें, लक्ष्य की ओर
कदम तेरे।