कैसे कटें ये
दिन औ' रात बिन
धूप-चाँदनी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
हवायें चलें
या बरसें बादल
छटेगी धुंध।
तेरे रूप से
साकार है संसार
गंध जीव में।
जग सौन्दर्य
मन का भी सौन्दर्य
देखा कवि ने।
अपनी जड़ें
देश हो या विदेश
ना काटो तुम।
बर्फीली हवा
मैदानी इलाकों में
उतर आई ।
भावुक मन और सिंधु का, एक सरीखा रूप।
जिस पर जितनी तरलता, उतनी उस पर धूप।।
डॉ. कुँअर बेचैन