मैं आऊँगा! आऊँगा! आऊँगा!
कभी मैं हवा बन के आऊँगा,
बिखरेंगी जुल्फें तेरी, सवारूँगा।
कभी मैं चाँद बन के आऊँगा,
छूकर गात तेरे, चाँदनी बिखराऊँगा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
देखते ही उन्हें पलकें झुका लेते हैं।
नजर लग जाती है नजर भर देखने से।
नीरा नंदन
प्यार, ममता
सदभावना पले
जन-मन में।
पासे का खेल
'चौपड़' बना 'लूडो'
वही पुराना।
बसन्ती मौसम
पीली-पीली सरसों
मनभावन।
और झुके हैं
फलों से लदे वृक्ष
नतमस्तक।
सूर के पद
तुलसी की चौपाई
युगों ने गायीं।