देव, मानव
अपनी सीमाओं में
बँधे दोनों ही।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
आओ कान्हा!
मन धीर ना धरे
तुम्हारे बिन।
आधुनिक लिबास में, आधुनिकता का दम भरते हैं।
जकड़े हैं वही, आज भी रूढ़ियों की सोच में।।
पंक में रह
कमल सा खिलना
जग का सार।
तेरी यादों की खुशबू से जी भरता ही नहीं।
घूमते रहते हैं दिन-रात इसी उपवन में।।
माँझी वही जो
प्रतिकूल हवा में
पार लगा दे।