भाल पे होंठ किसने रखे
जिंदगी में महावर घुली।
दृष्टि वो बन गई बाँसुरी
देह ये हो चली गोकुली।
शिवओम अम्बर
साँसों में बसा लो खुशबू की तरह
महका करेंगे तेरे आंगन में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
तुमसे मिल
जिंदगी मीठी हुई
नीम सरीखी।
अटल हैं जो
अडिग हैं इरादे
ध्रुव हैं वही।
एक औ' एक
दो नहीं, हैं ग्यारह
साथ मिलें तो।
उससे हारी दुनिया सारी,
खुद से जो भी जीत गया।
देवेन्द्र माँझी
यौवन की देहरी पे
सजी लाज की कनातें
प्रिय के स्वागत में
मुस्कानों के फूल सजे।