राधा ही नहीं
रूप, रस, माधुरी
कान्हा के साथ।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
छोटा सा दिल
मासूम धड़कन
थामे जिंदगी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
भावों की नावें
बहती आर-पार
सहज रिश्ते।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
अंश हो तुम
काँटा भी चुभे तुम्हें
होती चुभन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सत्य पे टिका
दोलायमान धर्म
डिगता नहीं।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
दीप-पतंगा
दोनों साथ जले हैं
प्रीत निभाने।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सागर भेजे
मेघ लाये संदेशे
नदी के लिये।
डॉ. मंजूश्री गर्ग