सुबह-शाम
बीतें पल अमोल
प्रकृति संग।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
वट वृक्ष
डॉ.
मंजूश्री गर्ग
वट वृक्ष भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है। यह
सैंकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाला सदाबहार पेड़ है। इसे बरगद और बड़ के नाम से
भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus benghalensis और अंग्रेजी में इसे banyan कहते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश में संगम के
किनारे ऐसा ही एक वट वृक्ष है जिसे अक्षय वट कहते हैं। भारत में प्रायः सभी जगह वट
वृक्ष पाये जाते हैं। पाँच वट वृक्षों का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है-
1. अक्षय वट-
प्रयागराज
2. पंचवट-
नासिक
3. वंशीवट- वृंदावन-मथुरा
के बीच भाण्डीरवन में
4. गयावट-
गया
5. सिद्ध वट
उज्जैन
भारत के अतिरिक्त नेपाल, वर्मा, श्रीलंका,
इंडोनेशिया, जापान, पाकिस्तान, आदि देशों व अन्य उष्ण कटिबंधीय देशों में भी पाया
जाता है।
वट वृक्ष की शाखाओं से जड़ें निकलकर धीरे-धीरे
धरती के अन्दर चली जाती हैं और पेड़ के लिये एक स्तम्भ का काम करती हैं. इन जड़ों
को ‘बरोह’ या ‘प्राप’ जड़
कहते हैं। यह एक द्वीबीजपत्री व
सपुष्पक वृक्ष है। इसकी लंबाई लगभग 15 से 20 मी. तक होती है और चारों तरफ काफी
भूभाग में फैला होता है। कलकत्ता के बॉटनिकल गार्डन में 250 साल पुराना एक वट
वृक्ष है जिसकी लंबाई 24.5 मी. के लगभग है और चारों ओर लगभग 18,918 वर्ग मी. के
क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसे सन् 1989 ई. में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में
शामिल किया गया था। वट वृक्ष की पत्तियाँ लगभग 4 से 5 इंच चौड़ी व 7 से 8 इंच लंबी
अंडाकार होती हैं। इसका फल छोटा गोलाकर व लाल रंग का होता है जिसके अंदर बीज पाया
जाता है। वट वृक्ष अन्य पेड़ों की तुलना में 4 से 5 प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन देता है लगभग
बीस घंटों तक ऑक्सीजन देता है।
हिंदू धर्म में वट वृक्ष की बहुत महत्ता है। प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ
मास की अमावस्या तिथि को सुहागिन स्त्रियाँ वट सावित्री व्रत रखती हैं व वट वृक्ष
की पूजा करती हैं।
पीपल वृक्ष
डॉ. मंजूश्री गर्ग
पीपल वृक्ष को संस्कृत में अश्वत्थ कहते हैं।
इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus Religiosa। पीपल
का वृक्ष बरगद और नीम के वृक्ष की तरह विशालकाय होता है और सैंकड़ों वर्षों तक
जीवित रहता है। भारत के अतिरिक्त यह पेड़ नेपाल, श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया में भी
पाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है, इसके
सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तःचेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। ऐसी
मान्यता है कि पीपल के वृक्ष की पूजा करने से सद्गति मिलती है।
पीपल के वृक्ष की लंबाई लगभग 15 से 20 फुट तक
होती है, शाखायें चारों ओर फैली होती हैं। इसके पत्ते देखने में दिल के आकार के
बहुत ही सुन्दर होते हैं। बसन्त ऋतु में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और हल्के पीले,
हल्के गुलाबी रंग के नये पत्ते आने शुरू होते हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर
लगते हैं। हल्की सी हवा चलने पर जब यह लहराते हैं तो लगता है बसन्त ऋतु के आगमन का
स्वागत कर रहे हों। एक कवि ने तो मन की चंचलता के लिये पीपल के पत्तों की उपमा
देते हुये कहा है-
पीपल पात
सरिस मन डोला।
पीपल के पत्तों की शिराओं का जाल बहुत मजबूत
होता है। सूखे हुये पत्तों को 10-15 दिन पानी में भिगोने से इनका हरा भाग निकल
जाता है और सुन्दर जालीनुमा पत्ता शेष बचता है जिसे पूरी तरह सुखाकर इस पर
चित्रकारी भी की जाती है। उदाहरण-
पीपल के फूल गुप्त रहते हैं और फल आकार में
मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दानों से बहुत छोटे होते हैं
किन्तु इनसे उत्पन्न विशाल वृक्ष सैंकड़ों वर्षों तक खड़ा रहता है।
पीपल के पत्ते जानवरों के चारे के रूप में
प्रयोग होते हैं। पीपल की लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम नहीं आती लेकिन यज्ञ के लिये
आम की लकड़ी के समान पवित्र मानी जाती है। प्राचीन समय में ऋषिगण पीपल की लकड़ी और
शमी की लकड़ी को रगड़कर यज्ञ के लिये अग्नि प्रज्वलित करते थे। यज्ञ में घी डालने
वाली लंबी चम्मच(स्त्रुआ) को भी पीपल की लकड़ी से बनाया जाता है।
श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि द्वापर युग में
परमधाम जाने से पहले श्री कृष्ण दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान-लीन हुये
थे। भगवान बुद्ध को भी बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था,
जिसे बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है।