आओ कान्हा!
मन धीर ना धरे
तुम्हारे बिन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
घर कंदील
बच्चे बने हैं दीप
रोशन जग।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
जुड़ी है आशा
चाह फिर मन में
लेती हिलोरें।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उतरेगी ही
कलई कितनी हो
खुलेगी पोल।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
करवा चौथ
चाँद के साथ देखा
अपना चाँद।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
यहाँ वहाँ क्या!
फूल खिले कहीं भी
देंगे सुगंध।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
मधुर तान
सुनाये बाँसुरिया
अधर बसी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग