लठ्ठमार होली
कान्हा खेल रहे होली वृन्दावन में,
राधा राह तके बरसाने में।
आयेगी कान्हा की टोली जब,
लेंगें रंग के साथ खबर लाठी सेे।
कह रही सखियाँ राधा से,
खेलेंगे सब मिल लठ्ठमार होली बरसाने में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बारह महीना-बसंत
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बसंत तो हमारे मन में है
बारह महीने रहता है
बस उसे महसूस करना है
आनंद का अनुभव करना है.
ग्रीष्म ऋतु में
शीतल पेय और आइसक्रीम
मधुर मुस्कान लाते हैं.
कौन कहता है! ग्रीष्म ऋतु शुष्क ऋतु है
खरबूजे, तरबूज की सरसता
इसी ऋतु में मिलती है.
बर्षा ऋतु तो
है पावस ऋतु
चारों ओर हरियाली
भीगी-भीगी हवा
पत्तों से झरता पानी
मन लुभाते ही हैं.
पायस फल आम भी
इसी ऋतु में सरसता भरता है.
शरद ऋतु तो
है ही पावन ऋतु
मंद-मंद समीर
स्वच्छ चाँदनी
वृक्षों से झरते
हारसिंगार के फूल
मन में मादकता भरते ही हैं
शिशिर ऋतु भी
नहीं है कम सुहावनि
सखियों संग
धूप में चौपालें
रात गये चाय-कॉफी की पार्टी
मेवा की गुटरगूँ
गन्ने की मिठास
इसी मौसम की
सौगातें हैं
हेमन्त ऋतु है
ले आती है संदेश बसंत का.
अनायास ही
झड़ते पेड़ों से पत्ते
खेतों में खिलने लगते
सरसों के फूल
सोये हुये अरमान
जागने लगते
फिर एक बार
बसन्त ऋतु तो
है बसंत ऋतु
प्रकृति के कण-कण में
नव आनंद, नव उत्साह
नजर आने लगता है.
वृक्ष नये परिधान पहन सज जाते हैं
वहीं पशु-पक्षी ही क्या
वन-तड़ाग तक नव उत्साह से
भर जाते हैं फिर एक बार.
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सीता की प्रतिज्ञाः
शूल नहीं चुभे
थे कभी
कंटक भरी राहों
में,
क्योंकि तुम
साथ थे.
रावण की लंका
में भी
रही थी सुकून
से
क्योंकि तुम
साथ थे.
आज अकारण ही
निर्वासित किया
है तुमने
जानते हुये भी
कि
गर्भ में
तुम्हारा ही अंश है.
बहुत ही अकेली
महसूस कर रही
हूँ
मैं जग में.
अपनी ही परछाईं
से
डर रही हूँ
मैं वन में.
आज राम तुमने
नहीं!
मैंने
निर्वासित किया है
तुम्हें ह्रदय
से.
भूमि से जन्मी
हूँ
भूमि में समा
जाऊँगी
पर वापस
तुम्हारी
अयोध्या में
कभी नहीं
आऊँगी.
श्रीराम के उद्गारः
सीते! वृथा व्यथित होती हो प्रिये!
तुम्हारा राम
तो तुम्हारे साथ है।
मृदुल, सौम्य
राम तुम्हारे साथ ही
निर्वासित हुआ
है अयोध्या से।
अयोध्या में तो
अयोध्या की निष्ठूर प्रजा का
निष्ठूर राजा
राम है, ह्रदयहीन राम है।
तुम बिन
अयोध्या ही नहीं,
श्रीहीन है
अयोध्या का राजसिंहासन भी।
वंदनीय राम
दरबार की वही झाँकी होगी
जहाँ तुम विराजती हो सस्मित राम के वाम अंग।
यशोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै।
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै ना आनि सुवावै।
तू काहै न बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है करहिँ, करि-करि सैन बतावै।
इति अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुर गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ, सो नंदभामिनी पावै।
सूरदास
उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने यशोदा के माध्यम
से भारतीय माँ का ही चित्र उकेरा है जो पालने में अपने लाल को सुला रही है, सोया
जानकर आँखों के इशारे से सबको चुप रहने को कहती है. वहाँ से हटकर घर के और काम
करना ही चाहती है कि बालक अकुलाकर उठ जाता है.