आतंक मिटे
हर दिल धड़के
'द्रोह के लिये।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
मैं जुगनू हूँ अपनी ही रोशनी से जगमगाता हूँ।
उधारी रोशनी नहीं ली सूरज से तारों की तरह।।
जुड़ी है आशा
चाह फिर मन में
लेती हिलोरें।
खिले कमल
पंक में रहकर
पंक से दूर।
सावन ऋतु
मनमीत मिले तो
सरसे मन।
प्यार की ज्योत से आलोकित है अंर्तमन।
बहती हैं ज्ञान की नित नयी निर्मल धारायें।।
समय-धारा
अविरल बहती
नहीं रूकती।