सरसे धरा
बूँद-बूँद बरसे
सारा ही दिन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
अधर द्वार
दीप राम नाम का
रोशन मन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नयनों से नयनों तक अविरल
बहती रहे दर्श की धारा
सुर्ख हथेली पर उंगली से
लिखते रहना नाम तुम्हारा।
बारम्बार इस तरह तुमको
लिखने में कुछ बात और है।
कृष्ण शलभ
अँधेरी रात
कठिन डगर है
सम्बल तेरा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
चलो तो सही
पगडंडी खुद ही
जायेगी बन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सत्य पे टिका
दोलायमान धर्म
डिगता नहीं।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
प्यार-सम्मान
शामिल हों अगर
महकें रिश्ते।
डॉ. मंजूश्री गर्ग