किसने रंग
आकाश में उँड़ेले
रंगे बादल।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
भीगी हवा में
बरसती बूँदों में
भीगा है मन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बरसे घन
या बरसे सावन
सरसे धरा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
खुशी के पल
धूप खिली आँगन
छँटा कोहरा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सुबह होते
चंद्र हुआ श्रीहीन
छिपे हैं तारे।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
ईर्ष्या से नहीं,
प्रतिस्पर्धा से ही तो,
जीतोगे तुम।
डॉ. मंजूश्री गर्ग