नई उमंगें
नई चाह मन में
जिलाती हमें।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सिंघाड़ा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सिंघाड़ा को संस्कृत में श्रृंगाटक कहते हैं और अंग्रेजी में Water Chestnut। सिंघाड़ा एक तिकोने आकार का फल है, इसका रंग हरा या लाल होता है। ऊपर की तरफ दो काँटे होते हैं। छिलका हटाने पर अंदर सफेद गिरी निकलती है यही भाग खाने योग्य होता है। सिंघाड़े का स्वाद हल्का मीठा और तासीर ठंडी होती है. सिंघाड़े की गिरी को सुखाकर और पीसकर इसका आटा बनाया जाता है जिसका प्रयोग व्रत, उपवास में किया जाता है। सिंघाड़े की सूखी गिरी को फल, फूल के साथ शिवलिंग पर चढ़ाने का भी महत्व है।
सिंघाड़े की बेलें होती हैं जो जलाशयों या पोखरों के पानी की सतह पर फैली होती हैं। जड़ें पानी के भीतर कीचड़ में दूर तक फैली होती हैं। इसके लिये पानी में कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में सिंघाड़े की बेलें नहीं होती। भारतवर्ष में प्रायः प्रत्येक प्रांत में सिंघाड़े की पैदावार होती है विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आदि में।
कसेरू
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कसेरू एक कंद(Bulb) है, आलू और शकरकंद की तरह। अंग्रेजी में कसेरू को क्लब-रश
या बुल्रश कहते हैं, इसका वैज्ञानिक नाम है Scirpus Kysoor। कसेरू आकार में छोटे गोलाकार या अंडाकार होते
हैं और इनका रंग काला या भूरा होता है। बाहरी सतह पर हल्के रोयें और पतली-पतली जड़ें
होती हैं। कसेरू अंदर से एकदम सफेद होता है और स्वाद मीठा व तासीर ठंडी होती है। उबाल
कर खाने में मिठास और भी बढ़ जाती है।
कसेरू एक बारहमासी घास जैसा जलीय पौधा है इसकी खेती नदी, तालाबों, पोखरों के किनारे या दलदली इलाकों में की जाती है। इसका तना त्रिकोणीय होता है। इसकी पत्तियाँ लंबी, नुकीली व घास जैसी चपटी होती हैं। कसेरू पौधे की जड़ें दलदल के अंदर लगी होती हैं।