बिन थामे ही हाथ,
हमेशा
थामे रहते हाथ
हमारा।
कैसे कह दें? साथ नहीं हो
पल-पल साथ
निभाते हो।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
खुशी के पल
धूप खिली आँगन
छँटा कोहरा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बनोगे संत
अहंकार अपना
तोड़ो तो सही.
डॉ. मंजूश्री गर्ग
आज की बातें
बीते युग की बातें
होनी हैं कल।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सरसे धरा
बूँद-बूँद बरसे
सारा ही दिन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
अधर द्वार
दीप राम नाम का
रोशन मन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नयनों से नयनों तक अविरल
बहती रहे दर्श की धारा
सुर्ख हथेली पर उंगली से
लिखते रहना नाम तुम्हारा।
बारम्बार इस तरह तुमको
लिखने में कुछ बात और है।
कृष्ण शलभ