बंजर मन
कुंठित धरती से
कैसे खिलेंगे।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
थकित मन
चाँदनी सी शीतल
तेरी छुअन।
जब चाहते हैं प्रभु, दर्शन तभी मिलते हैं।
हम में कहाँ सामर्थ्य है, तीर्थ हम कर पायें।।
चपलता से
घुटरून चलत
दौड़ते राम।
जलता दिया
मिट्टी का या सोने का
एक समान।
सादा पत्थर
पूजा तुमने, तभी
बना है 'शिव'।
सागर बसी
मचलती नदियाँ
करती शोर।