Thursday, June 11, 2026


अत्याचार

जो करे या जो सहे

दोनों ही दोषी।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, June 10, 2026

 

भोजपत्र वृक्ष



डॉ. मंजूश्री गर्ग

भोजपत्र को संस्कृत में भुर्ज, अंग्रेजी में Himalayan Birch कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Betula utilis है। प्राचीन काल में ग्रंथों की रचना के लिये भोजपत्रों का प्रयोग होता था। वास्तव में भोजपत्र ताड़ के पत्तों की भाँति कोई पत्ता नहीं होता वरन् भुर्ज वृक्ष की छाल होती है जिस पर लिखा जाता है। यह छाल कागज से अधिक मजबूत व टिकाऊ होती है। आज भी पुरातत्व संग्रहालयों में भोजपत्र पर लिखी सैकड़ों पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं जैसे हरिद्वार में गुरूकुल कांगड़ी विश्व विद्यालय। कालिदास ने भी अपनी कृतियों में भोजपत्र का उल्लेख किया है।

 

भोजपत्र वृक्ष हिमालय में लगभग 4,500 मी. तक की ऊँचाई पर पाया जाता है। यह ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है जो लगभग 20 मी. तक ऊँचा हो सकता है। यह वृक्ष बहुउपयोगी है। इसके पत्ते छोटे और किनारे दांतेदार होते हैं। वृक्ष पर नर और मादा मंजरी लगती है। इसकी छाल पतली, कागजनुमा होती है जिस पर आड़ी धारियों के रूप में तने पर मिलने वाले वायुरंध्र बहुत ही साफ गहरे रंग में नजर आते हैं। यह छाल लगभग खराब न होने वाली होती है क्योंकि इसमें रेजिन युक्त तेल पाया जाता है। छाल के विभिन्न रंग होते हैं जैसे-लाल, सफेद, पीला, सिल्वर, आदि। इन रंगों के आधार पर ही भोजपत्रों के नाम पड़े हैं।

 

भुर्ज की छाल ऋतु परिवर्तन पर स्वतः वृक्ष से अलग हो जाती है और यह कई परतों में होती है। प्रत्येक परत कागज की तरह बहुत पतली होती है। कभी-कभी यह छाल 60 फुट तक निकलती है। प्रारम्भ में चौड़ी होती है और बाद में क्रमशः संकरी होती जाती है। भूर्ज की छाल को लिखने योग्य बनाने के लिये सबसे पहले सुखाया जाता है फिर वांछित आकार में काटकर धागे से उन्हें बाँधा जाता है। दोनों ओर दो काष्ठ फलक रखे जाते हैं। भोज पत्र पर लिखने के लिये गाढ़ी काली स्याही का प्रयोग किया जाता है जो बादाम के छिलकों को जलाकर, उसकी राख में गोमूत्र मिलाकर बनाई जाती है। यह स्याही बहुत ही टिकाऊ होती है व पानी से खराब नहीं होती। आजकल भी कहीं-कहीं धार्मिक अनुष्ठानों के लिये या जन्मपत्री बनाने के लिये भोजपत्रों का प्रयोग किया जाता है।

 

भुर्ज वृक्ष की लकड़ी बहुत ही मजबूत, टिकाऊ व चमकदार होती है। इससे प्लाईवुड भी बनाई जाती है और ड्रम, सितार, गिटार, आदि वाद्य यंत्र बनाने के भी काम आती है। भुर्ज वृक्ष की लकड़ी को घर में रखना बहुत शुभ माना जाता है।




Tuesday, June 9, 2026


महके घर

धूप, चंदन सम

तेरे आने से।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, June 8, 2026

 तपे सूरज

झुलसे है धरती

बेहाल सब।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Sunday, June 7, 2026

 

खुबानी

डॉ. मंजूश्री गर्ग

                             

खुबानी को अंग्रेजी में एप्रिकोट(Apricot) कहते हैं। यह प्रूनसनाम के वनस्पति परिवार का गुठलीदार फल है। खुबानी मुख्यतः ठंड़े प्रदेशों में उगाया जाता है, अधिक गर्मी में खुबानी का पौधा मर जाता है। विश्व में सबसे ज्यादा खुबानी तुर्की में पैदा की जाती है। भारत में कशमीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पैदा की जाती है। ताजा खुबानी फल के रूप में खाई जाती है और सूखी खुबानी बादाम, अखरोट, आदि मेवा की तरह खाई जाती है। खुबानी के फल गर्मी के मौसम में आते हैं और इनकी तासीर गर्म होती है। खुबानी की गुठली को तोड़कर एक बादाम की गिरी निकलती है जिसे खा सकते हैं। वयस्क एक बार में 5-6 गिरी से ज्यादा न खायें व यह गिरी बच्चों को नहीं देनी चाहिये क्योंकि इसमें हल्की मात्रा में एक हैड्रसायनिक एसिड नाम का जहरीला पदार्थ होता है।

 

खुबानी के पेड़ की लंबाई 8 से 12 मी. तक होती है और तने की मोटाई 40 से. मी. के आस-पास होती है। ऊपर से पेड़ की टहनियाँ व पत्तियाँ फैली हुई होती हैं। पत्ती का आकार 5 से 9 से. मी. लम्बा व 4 से 8 सें. मी. चौड़ा होता है अग्रभाग नुकीला होता है। फूल पाँच पंखुरियों वाले सफेद या हल्के गुलाबी रंग के होते हैं। यह फूल अकेले या दो फूलों के जोड़ों में खिलते हैं। खुबानी का रंग अधिकांशतः पीला या नारंगी रंग का होता है, जिधर सूरज की रोशनी पड़ती है उधर से रंग हल्का लाल हो जाता है। खुबानी का छिलका बहुत मुलायम होता है कभी-कभी बाहरी सतह पर हल्के रोयें होते हैं। खुबानी का रंग जितना गहरा होता है, उसमें विटामिन ई, विटामिन सी और पोटेशियम की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 


Saturday, June 6, 2026


मोती का आभास है ओस की बूँद।

पर, पल भर को मोती से क्या कम है?

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, June 5, 2026


यौवन की देहरी पे

सजी लाज की कनातें

प्रिय के स्वागत में

मुस्कानों के फूल सजे।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग