बालक मन
जैसे सजाओ सजे
कच्चे घड़े सा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
'चाहत' की नई किताब लिखेंगे।
तुम मिलो या ना मिलो 'आस' रखेंगे।।
नन्हें कदम
थाम के हाथ माँ का
बढ़ने लगे।
बैष्णों देवी माँ
त्रिकुट पर्वत पे
सदा विराजें।
मीठा जल भी
सागर में मिल के
खारा ही खारा।