डोर ऊपर
कठपुतली सम
नाचते हम।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सुख-छतरी
दुख की बारिश में
काम ना आई।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
रात भोली सी
और अनूठे दिन
बचपन में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बालक मन
जैसे सजाओ सजे
कच्चे घड़े सा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
डॉ. मंजूश्री गर्ग