छेड़ा जो जल
अनगिन लहरें
नदी में बनी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
मन द्वारे पे
खिले खुशी के रंग
सजी रंगोली।
जय श्री राम
राम-सेतु बनाया
नल-नील ने।
दो घड़ी ठहर कर
जीवन की नदी को
बहते देखना है
कविता वहीं कहीं है।
प्रसून जोशी
सिंहासन पे
राम की पादुकायें
राम वन में।
प्यार की ज्योत से आलोकित है अंतर्मन,
बहती हैं ज्ञान की नित नयी निर्मल धारायें।
छूटी लगाम
दौड़े मन के घोड़े
टूटा संयम।