की
हार्दिक शुभकामनायें
दो पल जिंदगी जिये हम,
एक पल तुमसे मिलने का,
एक पल तुमसे जुदाई का।
दो उपहार मिले जीवन में,
एक उपहार मुस्कान का,
और एक मिला आँसू का।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बादलों से आ
मोती बनी सीपी में
एक बूँद थी।
मन मोहती
फिर कूकी कोयल
बागों के बीच।
कर्तव्य-पथ पर बढ़ते रहें कदम हमारे, कभी ना डिगें।
नित नयी लिखती रहें कथायें शौर्य और पराक्रम की।।
ज्ञान की धारा भी, नदी की धारा के समान ऊपर से नीचे की ओर बहती है इसीलिये गुरू का
आसन हमेशा शिष्य के आसन से ऊँचाई पर होता है।
मैं आऊँगा! आऊँगा! आऊँगा!
कभी मैं हवा बन के आऊँगा,
बिखरेंगी जुल्फें तेरी, सवारूँगा।
कभी मैं चाँद बन के आऊँगा,
छूकर गात तेरे, चाँदनी बिखराऊँगा।