मोती का आभास है ओस की बूँद।
पर, पल भर को मोती से क्या कम है?
डॉ. मंजूश्री गर्ग
यौवन की देहरी पे
सजी लाज की कनातें
प्रिय के स्वागत में
मुस्कानों के फूल सजे।
सादा पत्थर
पूजा तुमने, तभी
बना है शिव।
नदियों में बहुत शांत थी, झीलों पे बहुत चुप
सागर की तरंगों में उछलती हुई नावें।
डॉ. कुँअर बेचैन
डोर ऊपर
कठपुतली सम
नाचते हम।
सुख-छतरी
दुख की बारिश में
काम ना आई।
रात भोली सी
और अनूठे दिन
बचपन में।