सिंहासन पे
राम की पादुकायें
राम वन में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
प्यार की ज्योत से आलोकित है अंतर्मन,
बहती हैं ज्ञान की नित नयी निर्मल धारायें।
छूटी लगाम
दौड़े मन के घोड़े
टूटा संयम।
धागे में पिरे
माला बन गये ये
मोती निराले।
मित्र वो सच्चा
आईना बनकर
साथ निभाता।