अटल हैं जो
अडिग हैं इरादे
ध्रुव हैं वही।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
एक औ' एक
दो नहीं, हैं ग्यारह
साथ मिलें तो।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उससे हारी दुनिया सारी,
खुद से जो भी जीत गया।
देवेन्द्र माँझी
यौवन की देहरी पे
सजी लाज की कनातें
प्रिय के स्वागत में
मुस्कानों के फूल सजे।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बूँद-बूँद से समुद्र बने
फूल-फूल से उपवन
तुम अपने को कम
मत समझो, तुमसे ही
देश और विश्व बने।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
जो पल जिया
खुशी से, अपना है।
बाकी बेगाने।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
ठहरी बूँद
सीपी सम पाती में
मोती सी सजी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग