भावों की नावें
बहती आर-पार
सहज रिश्ते।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
अंश हो तुम
काँटा भी चुभे तुम्हें
होती चुभन।
सत्य पे टिका
दोलायमान धर्म
डिगता नहीं।
दीप-पतंगा
दोनों साथ जले हैं
प्रीत निभाने।
सागर भेजे
मेघ लाये संदेशे
नदी के लिये।
सुहाने पल
अतिथि बन आये
सदा दो पल।
चाह नहीं मैं बूँद सी सीपी में गिरूँ औ’ मोती बन जाऊँ.
चाह बूँद सी सागर में गिरूँ औ’ उसी में समा जाऊँ।