बच्चे आँगन
फुलवारी है खिली
महके मन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
मन द्वारे पे
खिले खुशी के रंग
सजी रंगोली।
'आम' हैं आप
खास 'आम' हैं पर
'आमों' के बीच।
भाल पे होंठ किसने रखे
जिंदगी में महावर घुली।
दृष्टि वो बन गई बाँसुरी
देह ये हो चली गोकुली।
शिवओम अम्बर
साँसों में बसा लो खुशबू की तरह
महका करेंगे तेरे आंगन में।
तुमसे मिल
जिंदगी मीठी हुई
नीम सरीखी।
अटल हैं जो
अडिग हैं इरादे
ध्रुव हैं वही।