जगमग सा
सारा जीवन सजे
दीवाली जैसा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उजाला करे
चौखट का दीपक
घर-बाहर।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
जले हैं खेत
फैला है प्रदूषण
शहरों तक।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
आओ कान्हा!
मन धीर ना धरे
तुम्हारे बिन।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
घर कंदील
बच्चे बने हैं दीप
रोशन जग।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
जुड़ी है आशा
चाह फिर मन में
लेती हिलोरें।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उतरेगी ही
कलई कितनी हो
खुलेगी पोल।
डॉ. मंजूश्री गर्ग