मन मोहती
फिर कूकी कोयल
बागों के बीच।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कर्तव्य-पथ पर बढ़ते रहें कदम हमारे, कभी ना डिगें।
नित नयी लिखती रहें कथायें शौर्य और पराक्रम की।।
ज्ञान की धारा भी, नदी की धारा के समान ऊपर से नीचे की ओर बहती है इसीलिये गुरू का
आसन हमेशा शिष्य के आसन से ऊँचाई पर होता है।
मैं आऊँगा! आऊँगा! आऊँगा!
कभी मैं हवा बन के आऊँगा,
बिखरेंगी जुल्फें तेरी, सवारूँगा।
कभी मैं चाँद बन के आऊँगा,
छूकर गात तेरे, चाँदनी बिखराऊँगा।
देखते ही उन्हें पलकें झुका लेते हैं।
नजर लग जाती है नजर भर देखने से।
नीरा नंदन
प्यार, ममता
सदभावना पले
जन-मन में।
पासे का खेल
'चौपड़' बना 'लूडो'
वही पुराना।