यौवन की देहरी पे
सजी लाज की कनातें
प्रिय के स्वागत में
मुस्कानों के फूल सजे।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बूँद-बूँद से समुद्र बने
फूल-फूल से उपवन
तुम अपने को कम
मत समझो, तुमसे ही
देश और विश्व बने।
जो पल जिया
खुशी से, अपना है।
बाकी बेगाने।
ठहरी बूँद
सीपी सम पाती में
मोती सी सजी।
दिल से, आँखों से, किसी ठौर से देखा ना गया।
वो उजाला था, मगर गौर से देखा ना गया।।
डॉ. कुअँर बेचैन
ता उम्र बँधे
कच्चे धागे की डोर
कितनी दृढ़!
कंकड़ ने बनाये, अनगिन वृत्त।
मन मेरा, पानी सा तरल।।