Monday, June 15, 2026


काटे पत्थर

पत्थरों से फूटती

जल धारायें।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, June 14, 2026

 


        मन तो बाबरा पंछी है।

        जिस डाल से उड़ाओ उसी पे आ बैठता है।

                                            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, June 13, 2026


आड़ू


 डॉ. मंजूश्री गर्ग

आड़ू को अंग्रेजी में(Peach) कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम प्रूनस पर्सिका है। कुछ वैज्ञानिक आड़ू की उत्पत्ति स्थान चीन मानते हैं और कुछ ईरान। यह पतझड़ी वृक्ष है। भारत में पर्वतीय व उपपर्वतीय भागों में इसकी सफल खेती होती है। इसका फल देखने में बहुत कुछ खुबानी जैसा लगता है। आकार में खुबानी से थोड़ा बड़ा होता है व हल्के हरे या हल्के पीले रंग का होता है। जहाँ धूप पड़ती है वहाँ का रंग हल्का गुलाबी हो जाता है। आड़ू पकने पर मीठा लगता है और इसका प्रयोग केवल फल के रूप में ही किया जाता है, खुबानी की तरह मेवा की तरह नहीं। आड़ू में भी एक गुठली होती है। यह फल मैदानी भागों में गर्मियों के मौसम में अधिकांशतः पाया जाता है।

 

आड़ू के वृक्ष का प्रजनन कलिकायन द्वारा होता है। आड़ू वृक्ष के मूल तने पर अप्रैल, मई महीने में रिंग बड़िंग की जाती है। पौधे 15 से 18 फुट की दूरी पर दिसंबर, जनवरी महीने में लगाये जाते हैं। सुंदर आकार व अच्छी वृद्धि के लिये प्रति दो वर्ष में कटाई, छँटाई करनी चाहिये। अप्रैल, मई के महीने में गुलाबी सुंदर रंग के फूल आते हैं और जून के महीने में फल लगता है। प्रति वृक्ष 30 से 50 किलो लगता है। इसकी तासीर गर्म होती है। आड़ू में प्रोटीन, वसा, फाइबर, कैल्शियम, पोटेशियम, शुगर, आदि प्रचुर मात्रा में होती है।

 

 

 

 

 


Friday, June 12, 2026


निराशाओं के अँधकार होंगे दूर,

आशाओं के सूरज से ही।

                             डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, June 11, 2026


अत्याचार

जो करे या जो सहे

दोनों ही दोषी।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, June 10, 2026

 

भोजपत्र वृक्ष



डॉ. मंजूश्री गर्ग

भोजपत्र को संस्कृत में भुर्ज, अंग्रेजी में Himalayan Birch कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Betula utilis है। प्राचीन काल में ग्रंथों की रचना के लिये भोजपत्रों का प्रयोग होता था। वास्तव में भोजपत्र ताड़ के पत्तों की भाँति कोई पत्ता नहीं होता वरन् भुर्ज वृक्ष की छाल होती है जिस पर लिखा जाता है। यह छाल कागज से अधिक मजबूत व टिकाऊ होती है। आज भी पुरातत्व संग्रहालयों में भोजपत्र पर लिखी सैकड़ों पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं जैसे हरिद्वार में गुरूकुल कांगड़ी विश्व विद्यालय। कालिदास ने भी अपनी कृतियों में भोजपत्र का उल्लेख किया है।

 

भोजपत्र वृक्ष हिमालय में लगभग 4,500 मी. तक की ऊँचाई पर पाया जाता है। यह ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है जो लगभग 20 मी. तक ऊँचा हो सकता है। यह वृक्ष बहुउपयोगी है। इसके पत्ते छोटे और किनारे दांतेदार होते हैं। वृक्ष पर नर और मादा मंजरी लगती है। इसकी छाल पतली, कागजनुमा होती है जिस पर आड़ी धारियों के रूप में तने पर मिलने वाले वायुरंध्र बहुत ही साफ गहरे रंग में नजर आते हैं। यह छाल लगभग खराब न होने वाली होती है क्योंकि इसमें रेजिन युक्त तेल पाया जाता है। छाल के विभिन्न रंग होते हैं जैसे-लाल, सफेद, पीला, सिल्वर, आदि। इन रंगों के आधार पर ही भोजपत्रों के नाम पड़े हैं।

 

भुर्ज की छाल ऋतु परिवर्तन पर स्वतः वृक्ष से अलग हो जाती है और यह कई परतों में होती है। प्रत्येक परत कागज की तरह बहुत पतली होती है। कभी-कभी यह छाल 60 फुट तक निकलती है। प्रारम्भ में चौड़ी होती है और बाद में क्रमशः संकरी होती जाती है। भूर्ज की छाल को लिखने योग्य बनाने के लिये सबसे पहले सुखाया जाता है फिर वांछित आकार में काटकर धागे से उन्हें बाँधा जाता है। दोनों ओर दो काष्ठ फलक रखे जाते हैं। भोज पत्र पर लिखने के लिये गाढ़ी काली स्याही का प्रयोग किया जाता है जो बादाम के छिलकों को जलाकर, उसकी राख में गोमूत्र मिलाकर बनाई जाती है। यह स्याही बहुत ही टिकाऊ होती है व पानी से खराब नहीं होती। आजकल भी कहीं-कहीं धार्मिक अनुष्ठानों के लिये या जन्मपत्री बनाने के लिये भोजपत्रों का प्रयोग किया जाता है।

 

भुर्ज वृक्ष की लकड़ी बहुत ही मजबूत, टिकाऊ व चमकदार होती है। इससे प्लाईवुड भी बनाई जाती है और ड्रम, सितार, गिटार, आदि वाद्य यंत्र बनाने के भी काम आती है। भुर्ज वृक्ष की लकड़ी को घर में रखना बहुत शुभ माना जाता है।




Tuesday, June 9, 2026


महके घर

धूप, चंदन सम

तेरे आने से।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग