Monday, February 23, 2026

 

 सीता की प्रतिज्ञाः

                         डॉ. मंजूश्री गर्ग

शूल नहीं चुभे थे कभी

कंटक भरी राहों में,

क्योंकि तुम साथ थे.

रावण की लंका में भी

रही थी सुकून से

क्योंकि तुम साथ थे.

 

आज अकारण ही

निर्वासित किया है तुमने

जानते हुये भी कि

गर्भ में तुम्हारा ही अंश है.

 

बहुत ही अकेली

महसूस कर रही हूँ

मैं जग में.

अपनी ही परछाईं से

डर रही हूँ

मैं वन में.

 

आज राम तुमने नहीं!

मैंने निर्वासित किया है

तुम्हें ह्रदय से.

भूमि से जन्मी हूँ

भूमि में समा जाऊँगी

पर वापस तुम्हारी

अयोध्या में

कभी नहीं आऊँगी.

 

श्रीराम के उद्गारः

 

सीते! वृथा व्यथित होती हो प्रिये!

तुम्हारा राम तो तुम्हारे साथ है।

मृदुल, सौम्य राम तुम्हारे साथ ही

निर्वासित हुआ है अयोध्या से।

 

अयोध्या में तो अयोध्या की निष्ठूर प्रजा का

निष्ठूर राजा राम है, ह्रदयहीन राम है।

तुम बिन अयोध्या ही नहीं,

श्रीहीन है अयोध्या का राजसिंहासन भी।

वंदनीय राम दरबार की वही झाँकी होगी

जहाँ तुम विराजती हो सस्मित राम के वाम अंग।


 


Saturday, February 21, 2026


संयुक्त परिवारों के टूटते ही, संयुक्तता टूटती गयी।

ना आश्रय वृद्धों का रहा, ना छाँव बालकों की रही।

                                      डॉ. मंजूश्री गर्ग 


 

बार-बार आती है मुझको

मधुर याद बचपन तेरी,

आ जा बचपन, एक बार फिर

दे दो अपनी निर्मल शान्ति

व्याकुल व्यथा मिटाने वाली

वह अपनी प्राकृत विश्रांति।

                   सुभद्रा कुमारी चौहान

 

Thursday, February 19, 2026

 

यशोदा हरि पालने झुलावै।

हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै।

मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै ना आनि सुवावै।

तू काहै न बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।

कबहुँ पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।

सोवत जानि मौन है करहिँ, करि-करि सैन बतावै।

इति अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुर गावै।

जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ, सो नंदभामिनी पावै।

                                      सूरदास

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने यशोदा के माध्यम से भारतीय माँ का ही चित्र उकेरा है जो पालने में अपने लाल को सुला रही है, सोया जानकर आँखों के इशारे से सबको चुप रहने को कहती है. वहाँ से हटकर घर के और काम करना ही चाहती है कि बालक अकुलाकर उठ जाता है.


Wednesday, February 18, 2026


रंगों पे रंग

फूलों पे तितलियांँ

उड़ती हुईं।

                      डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, February 17, 2026


बर्फ निराली

धूप की छुअन पा

बनी लहर।

                      डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, February 16, 2026


बुलंदियों को देख समझो ये फलसफा,

गहराई नींव की जरूरी है ऊँचाई के लिये।

                शालिनी गर्ग