जाम से नहीं
नयनों से पीकर
बहके हम।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
चिड़ियाँ जागीं
चहकी डाली सारी
हुआ सबेरा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
'साहित्य' वही
सर्वजन हित में
सर्वदा रहे।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
आगे तो बढ़ो
झरने की तरह
जानेंगे सब।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
जलता दिया
मिट्टी का या सोने का
एक समान।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
लाल माणिक
सूर्य ग्रह सा तेज
नवरत्न में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
छेड़ा जो जल
अनगिन लहरें
नदी में बनी।
डॉ. मंजूश्री गर्ग