सागर भेजे
मेघ लाये संदेशे
नदी के लिये।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सुहाने पल
अतिथि बन आये
सदा दो पल।
चाह नहीं मैं बूँद सी सीपी में गिरूँ औ’ मोती बन जाऊँ.
चाह बूँद सी सागर में गिरूँ औ’ उसी में समा जाऊँ।
ख्बाबों में बसा
आयेगा एक दिन
आँगन मेरे।
तांडव नृत्य
नटराज रूप में
शिव ने किया।
जाम से नहीं
नयनों से पीकर
बहके हम।
चिड़ियाँ जागीं
चहकी डाली सारी
हुआ सबेरा।