Sunday, September 27, 2026

 

पीपल वृक्ष

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

पीपल वृक्ष को संस्कृत में अश्वत्थ कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus Religiosa। पीपल का वृक्ष बरगद और नीम के वृक्ष की तरह विशालकाय होता है और सैंकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है। भारत के अतिरिक्त यह पेड़ नेपाल, श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया में भी पाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तःचेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। ऐसी मान्यता है कि पीपल के वृक्ष की पूजा करने से सद्गति मिलती है।

पीपल के वृक्ष की लंबाई लगभग 15 से 20 फुट तक होती है, शाखायें चारों ओर फैली होती हैं। इसके पत्ते देखने में दिल के आकार के बहुत ही सुन्दर होते हैं। बसन्त ऋतु में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और हल्के पीले, हल्के गुलाबी रंग के नये पत्ते आने शुरू होते हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर लगते हैं। हल्की सी हवा चलने पर जब यह लहराते हैं तो लगता है बसन्त ऋतु के आगमन का स्वागत कर रहे हों। एक कवि ने तो मन की चंचलता के लिये पीपल के पत्तों की उपमा देते हुये कहा है-

पीपल पात सरिस मन डोला।

पीपल के पत्तों की शिराओं का जाल बहुत मजबूत होता है। सूखे हुये पत्तों को 10-15 दिन पानी में भिगोने से इनका हरा भाग निकल जाता है और सुन्दर जालीनुमा पत्ता शेष बचता है जिसे पूरी तरह सुखाकर इस पर चित्रकारी भी की जाती है। उदाहरण-

पीपल के फूल गुप्त रहते हैं और फल आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दानों से बहुत छोटे होते हैं किन्तु इनसे उत्पन्न विशाल वृक्ष सैंकड़ों वर्षों तक खड़ा रहता है।

पीपल के पत्ते जानवरों के चारे के रूप में प्रयोग होते हैं। पीपल की लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम नहीं आती लेकिन यज्ञ के लिये आम की लकड़ी के समान पवित्र मानी जाती है। प्राचीन समय में ऋषिगण पीपल की लकड़ी और शमी की लकड़ी को रगड़कर यज्ञ के लिये अग्नि प्रज्वलित करते थे। यज्ञ में घी डालने वाली लंबी चम्मच(स्त्रुआ) को भी पीपल की लकड़ी से बनाया जाता है।

श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पहले श्री कृष्ण दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान-लीन हुये थे। भगवान बुद्ध को भी बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसे बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है।

 

 

 

 


Saturday, September 26, 2026


भाव-लहरी

ह्रदय में उमड़ी

शब्दों में बही।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, September 25, 2026


नदी जल में

किल्लोल हैं करती

पानी की बूँदें।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, September 24, 2026


थकित मन

चाँदनी सी शीतल

तेरी छुअन।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, September 23, 2026


मधु-मालती के फूल रात में खिलें।

महकें और महकायें मन-आँगन।।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, September 22, 2026


ताप सह के

देते हमें हैं छाँव

वट-पीपल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, September 21, 2026


आज की बातें

बीते युग की बातें

होनी हैं कल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग