ज्ञान का दीप
मन में जलाकर
फैलायें ज्ञान।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सजे द्वार पे
तोरण औ' कलश
'शुभागमन'।
जल ही--------
जल ही जीवन
सिंचित उपवन
खिलते फूल।
जल ही धार
कटते पत्थर
बनते रेत।
जल ही ताप
बनती ऊर्जा
जलते बल्ब।
देव, मानव
अपनी सीमाओं में
बँधे दोनों ही।
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
आओ कान्हा!
मन धीर ना धरे
तुम्हारे बिन।
आधुनिक लिबास में, आधुनिकता का दम भरते हैं।
जकड़े हैं वही, आज भी रूढ़ियों की सोच में।।