नदियों में बहुत शांत थी, झीलों पे बहुत चुप
सागर की तरंगों में उछलती हुई नावें।
डॉ. कुँअर बेचैन
डोर ऊपर
कठपुतली सम
नाचते हम।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सुख-छतरी
दुख की बारिश में
काम ना आई।
रात भोली सी
और अनूठे दिन
बचपन में।
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
बालक मन
जैसे सजाओ सजे
कच्चे घड़े सा।
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।