Thursday, August 13, 2026


नयन मिले

प्रीत पले दोनों में

मन मुस्काये।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, August 12, 2026


मन-आँगन

सजी हैं कल्पनायें

जैसे अल्पना।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, August 11, 2026


धरा पे नहीं

कदम आज मेरे

फूली खुशी से।

                   डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, August 10, 2026


नन्हीं सी बूँद

आशा की किरण ले

आयी है द्वार।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, August 9, 2026


नई उमंगें

नई चाह मन में

जिलाती हमें।

                       डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, August 8, 2026


मन-आँगन

झूला झूले हैं हम

प्रेम झूले से।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, August 7, 2026


सिंघाड़ा


डॉ. मंजूश्री गर्ग

सिंघाड़ा को संस्कृत में श्रृंगाटक कहते हैं और अंग्रेजी में Water Chestnut। सिंघाड़ा एक तिकोने आकार का फल है, इसका रंग हरा या लाल होता है। ऊपर की तरफ दो काँटे होते हैं। छिलका हटाने पर अंदर सफेद गिरी निकलती है यही भाग खाने योग्य होता है। सिंघाड़े का स्वाद हल्का मीठा और तासीर ठंडी होती है. सिंघाड़े की गिरी को सुखाकर और पीसकर इसका आटा बनाया जाता है जिसका प्रयोग व्रत, उपवास में किया जाता है। सिंघाड़े की सूखी गिरी को फल, फूल के साथ शिवलिंग पर चढ़ाने का भी महत्व है।

सिंघाड़े की बेलें होती हैं जो जलाशयों या पोखरों के पानी की सतह पर फैली होती हैं। जड़ें पानी के भीतर कीचड़ में दूर तक फैली होती हैं। इसके लिये पानी में कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में सिंघाड़े की बेलें नहीं होती। भारतवर्ष में प्रायः प्रत्येक प्रांत में सिंघाड़े की पैदावार होती है विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आदि में।