रात भोली सी
और अनूठे दिन
बचपन में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
बालक मन
जैसे सजाओ सजे
कच्चे घड़े सा।
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
'चाहत' की नई किताब लिखेंगे।
तुम मिलो या ना मिलो 'आस' रखेंगे।।
नन्हें कदम
थाम के हाथ माँ का
बढ़ने लगे।