Tuesday, August 25, 2026

 

सुबह होते

चंद्र हुआ श्रीहीन

छिपे हैं तारे।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Monday, August 24, 2026


ईर्ष्या से नहीं,

प्रतिस्पर्धा  से ही तो,

जीतोगे तुम।

                      डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, August 22, 2026

 

लोकाट(फल)

 डॉ. मंजूश्री गर्ग

लोकाट(Loquat) रोजेसी(Rosaceac) कुल का फल है। यह आम, आलू बुखारा, चेरी, आदि की तरह ड्रूप फल है। लोकाट का रंग नारंगी या पीला होता है और आकार नाशपाती जैसा होता है लेकिन छोटा होता है। इसके ऊपर पतला छिलका होता है, अंदर नारंगी रंग का ही गूदा होता है और केंद्र में एक या एक से अधिक कठोर बीज होते हैं। कभी-कभी एक ही लोकाट में 5 से 6 बीज तक पाये जाते हैं। लोकाट का गूदा रसीला होता है व स्वाद खट्टा-मीठा होता है। लोकाट के फल पेड़ पर गुच्छों के रूप में लगते हैं। भारत में लोकाट मार्च-अप्रैल के महीने में आती हैं।

लोकाट का पेड़ मूल रूप से चीन देश का है। लगभग 1000 वर्षों से अधिक समय से चीन में इसकी खेती की जा रही है। जापान में भी 1000 वर्षों से इसकी खेती की जा रही है। जापान में इसे जापानी प्लम कहते हैं और चीन में चीनी प्लम। लोकाट का पेड़ सदाबहार होता है। पेड़ की लंबाई प्रायः 5 से 10 मी. तक होती है। पत्तियाँ सरल 4 से 10 इंच लंबी गहरे हरे रंग की होती हैं। क्षेत्र विशेष के मौसम के अनुसार पतझड़ के मौसम में फूल आने शुरू होते हैं। फूल 2 से.मी. व्यास के सफेद पाँच पँखुड़ियों वाले होते हैं और तीन से दस फूलों के गुच्छों में लगते हैं, इनमें मीठी व मादक सुगंध होती है।

आजकल लोकाट की खेती भारत, चीन, जापान के अतिरिक्त अन्य देशों में भी की की रही है जैसे-जार्जिया, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, पाकिस्तान, न्यूजीलैंड, आदि।

 

 

 

 



बंजर मन

कुंठित धरती से

कैसे खिलेंगे।

             डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, August 21, 2026


थकित मन

चाँदनी सी शीतल

तेरी छुअन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, August 20, 2026


 

जब चाहते हैं प्रभु, दर्शन तभी मिलते हैं।

हम में कहाँ सामर्थ्य है, तीर्थ हम कर पायें।।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

  

Wednesday, August 19, 2026


चपलता से

घुटरून चलत

दौड़ते राम।

                      डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, August 18, 2026


जलता दिया

मिट्टी का या सोने का

एक समान।

                            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, August 17, 2026


सादा पत्थर

पूजा  तुमने, तभी

बना है 'शिव'।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, August 16, 2026


सागर बसी 

मचलती नदियाँ 

करती शोर।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, August 15, 2026


राधा के संग

झूला झूलें हैं कान्हा

गायें मल्हार।

                 डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, August 14, 2026

 


हरियाली तीज की हार्दिक शुभकामनायें

रिमझिम-रिमझिम बूँदें सरसा रही मन को।

सखियों संग झूलों की पेंगे छूने चली गगन को।

        डॉ. मंजूश्री गर्ग





15 अगस्त 2026 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें


लाल किले पे
लहराये तिरंगा
शान हमारी।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग
 

Thursday, August 13, 2026


नयन मिले

प्रीत पले दोनों में

मन मुस्काये।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, August 12, 2026


मन-आँगन

सजी हैं कल्पनायें

जैसे अल्पना।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, August 11, 2026


धरा पे नहीं

कदम आज मेरे

फूली खुशी से।

                   डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, August 10, 2026


नन्हीं सी बूँद

आशा की किरण ले

आयी है द्वार।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, August 9, 2026


नई उमंगें

नई चाह मन में

जिलाती हमें।

                       डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, August 8, 2026


मन-आँगन

झूला झूले हैं हम

प्रेम झूले से।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, August 7, 2026


सिंघाड़ा


डॉ. मंजूश्री गर्ग

सिंघाड़ा को संस्कृत में श्रृंगाटक कहते हैं और अंग्रेजी में Water Chestnut। सिंघाड़ा एक तिकोने आकार का फल है, इसका रंग हरा या लाल होता है। ऊपर की तरफ दो काँटे होते हैं। छिलका हटाने पर अंदर सफेद गिरी निकलती है यही भाग खाने योग्य होता है। सिंघाड़े का स्वाद हल्का मीठा और तासीर ठंडी होती है. सिंघाड़े की गिरी को सुखाकर और पीसकर इसका आटा बनाया जाता है जिसका प्रयोग व्रत, उपवास में किया जाता है। सिंघाड़े की सूखी गिरी को फल, फूल के साथ शिवलिंग पर चढ़ाने का भी महत्व है।

सिंघाड़े की बेलें होती हैं जो जलाशयों या पोखरों के पानी की सतह पर फैली होती हैं। जड़ें पानी के भीतर कीचड़ में दूर तक फैली होती हैं। इसके लिये पानी में कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में सिंघाड़े की बेलें नहीं होती। भारतवर्ष में प्रायः प्रत्येक प्रांत में सिंघाड़े की पैदावार होती है विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आदि में। 

Thursday, August 6, 2026


कसेरू

डॉ. मंजूश्री गर्ग

कसेरू एक कंद(Bulb) है, आलू और शकरकंद की तरह। अंग्रेजी में कसेरू को क्लब-रश या बुल्रश कहते हैं, इसका वैज्ञानिक नाम है Scirpus Kysoor। कसेरू आकार में छोटे गोलाकार या अंडाकार होते हैं और इनका रंग काला या भूरा होता है। बाहरी सतह पर हल्के रोयें और पतली-पतली जड़ें होती हैं। कसेरू अंदर से एकदम सफेद होता है और स्वाद मीठा व तासीर ठंडी होती है। उबाल कर खाने में मिठास और भी बढ़ जाती है।

कसेरू एक बारहमासी घास जैसा जलीय पौधा है इसकी खेती नदी, तालाबों, पोखरों के किनारे या दलदली इलाकों में की जाती है। इसका तना त्रिकोणीय होता है। इसकी पत्तियाँ लंबी, नुकीली व घास जैसी चपटी होती हैं। कसेरू पौधे की जड़ें दलदल के अंदर लगी होती हैं।

Wednesday, August 5, 2026


मुड़ जायेंगे

लचक है लता सी

चाहोगे जैसे।

               डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, August 4, 2026


दिल ये चाहे

सितारों में कहीं हो

नाम अपना।

                 डॉ. मंजूश्री गर्ग


Monday, August 3, 2026


'आईना' देखा

औ' तुम मिल गये 

पल भर में।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, August 2, 2026


लक्ष्य पाने की

चाह जगी मन में

बढ़े कदम।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, August 1, 2026

 

                                                                      अंगूर

डॉ. मंजूश्री गर्ग

अंगूर एक स्वादिष्ट व सुंदर फल है। संस्कृत में इसे द्राक्ष व अंग्रेजी में Grapes कहते हैं। आम फल को जहाँ फलों का राजा कहा जाता है वहीं अंगूर फल को सर्वोत्तम कहा जाता है। अंगूर में माँ के दूध के समान पोषक तत्व होते हैं। यह सबल-निर्बल, स्वस्थ-अस्वस्थ सभी के लिये समान उपयोगी है। अंगूर के रस से आयुर्वेद में द्राक्षासवएक औषधि बनती है जिसके सेवन से महिलाओं में होने वाली रक्त की कमी की पूर्ति होती है। अंगूर के रस के सेवन से रक्त-स्राव की कमी को पूरा किया जाता है। अंगूर से ही किशमिश, मुनक्के व Wine बनती है। किशमिश का प्रयोग मेवे के रूप में होता है। मिठाईयों में भी किशमिश को डाला जाता है। ऐसे ही खाने में भी किशमिश स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक होती हैं। मुनक्के का प्रयोग कब्ज होने पर या बुखार में किया जाता है। Wine का प्रयोग थोड़ी मात्रा में ह्रदय रोगियों के लिये लाभकारी होता है।

अंगूर की खेती का प्रारम्भ लगभग 5000 वर्ष पूर्व भारत से हुआ था। अंगूर की बेलें होती हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं- 5 फुट से 6 फुट तक लंबी होने पर इन्हें तार या पतली लकड़ी के बाने बनाकर फैला दिया जाता है। अंगूर गुच्छों के रूप में लगते हैं। अंगूर कई प्रकार के होते हैं-एक- हरा या हल्का पीले रंग के अंगूर होते हैं। यह स्वाद में खट्टे-मीठे होते हैं, आकार में गोल या लंबे दोनों प्रकार के पाये जाते हैं। इनका व्यास 2 से. मी. से 3 से.मी. तक होता है। इन्हें सुखाकर किशमिश बनाई जाती है। दूसरे- लाल रंग के अंगूर होते हैं, इनका आकार थोड़ा बड़ा होता है, स्वाद में मीठा होता है, अंदर बीज भी होता है जो खाया नहीं जाता। अन्य अंगूरों में बीज बहुत छोटे होते हैं और खाते समय पता ही नहीं चलते। इन्हीं को सुखाकर मुनक्के बनाये जाते हैं। तीसरे- काले रंग के अंगूर होते हैं जो आकार में बड़े व स्वाद में मीठे होते हैं। इनके बीज भी बहुत छोटे होते हैं। इन्हीं से Wine बनाई जाती है।

अंगूर की बेलों की सुंदरता के कारण इन्हें अधिकांश इमारतों में पत्थरों पर उकेरा गया है। उदाहरण- आगरा में दयालबाग मंदिर में अंगूर की बेलों की नक्काशी देखने को मिलती है।



Friday, July 31, 2026


उखड़ेंगे ना

दूब से जुड़े हुये

हम धरा से।

                  डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, July 30, 2026



बम-बम भोले के जय घोष से गूँज रहा है आकाश।

भर-भर काँवर गंगा जल से चल दिये हैं काँवड़िये।।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

 

 

  

Wednesday, July 29, 2026


स्वस्तिक और

चहुँमुखी दीपक

एक समान।

                   डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, July 28, 2026


जलकर भी

कहाँ बाती जलती!

जलता दिया।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, July 27, 2026


घनी अँधेरी

बरसात की रातें

डरे है मन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, July 26, 2026


चन्द्र खिलौना

राम हों या श्री कृष्ण

किसने पाया।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, July 25, 2026

 

चिरौंजी

डॉ. मंजूश्री गर्ग

चिरोली या चिरौंजी चिरोली(पियाल) वृक्ष के फल की गुठली की गिरी है जो मेवे के रूप में प्रयोग होती है। यह मधुर बल वर्धक, ह्रदय के लिये उत्तम, स्निग्ध, वात पित्त शामक होती है। अधिकतर मीठे पकवानों जैसे खीर, सेवईं, लड्डू, बर्फी, रबड़ी, कलाकंद, आदि में डाली जाती है।

चिरौंजी के फल को चार या पियाल भी कहते हैं। इसके पेड़ अमतौर पर शुष्क पर्णपाती पर्वतीय जंगलों में पाये जाते है। इसके वृक्षों की लंबाई 50 फीट से 60 फीट के आसपास होती हैं। इसकी पत्तियाँ 6 से 8 इंच लंबी होती हैं आगे से गोलाकार होती हैं। पेड़ पर 3 से 4 से.मी. व्यास के हरे रंग के गोल फल लगते हैं जो पकने पर गहरे बैंगनी और काले रंग के हो जाते हैं। फल के अंदर कठोर गुठली होती है जिसे तोड़कर गिरी निकलती है।

भारत में चिरोली के वृक्ष दक्षिण भारत, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छोटा नागपुर, आदि स्थानों में पाये जाते हैं।

 

Friday, July 24, 2026


मुस्कुराते सूरज से

तुम आये जीवन में

लालिमा तुमसे ही

खिले  मन  मेरा

सूरजमुखी  सा।

             डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, July 23, 2026


टोक देता है कदम जब भी गलत उठता है

ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें।

            कृष्ण बिहारी 'नूर' 

Wednesday, July 22, 2026


सजे हिंडोले

झूले हैं राधा-कृष्ण

वृन्दावन में।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, July 21, 2026


कलियुग में

साम्राज्य झूठ का

सच की हार।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, July 20, 2026


बिन थामे ही हाथ, हमेशा

थामे रहते हाथ हमारा।

कैसे कह दें? साथ नहीं हो

पल-पल साथ निभाते हो।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

  

Sunday, July 19, 2026


खुशी के पल

धूप खिली आँगन

छँटा कोहरा।

                       डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, July 18, 2026


बनोगे संत

अहंकार अपना

तोड़ो तो सही.

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, July 17, 2026

आज की बातें

बीते युग की बातें

होनी हैं कल।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, July 16, 2026


सरसे धरा

बूँद-बूँद बरसे

सारा ही दिन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, July 15, 2026


अधर द्वार

दीप राम नाम का

रोशन मन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग


 

Tuesday, July 14, 2026


नयनों से नयनों तक अविरल

बहती रहे दर्श की धारा

सुर्ख हथेली पर उंगली  से

लिखते रहना नाम तुम्हारा।


बारम्बार इस तरह तुमको

लिखने में कुछ बात और है।

            कृष्ण शलभ

Monday, July 13, 2026


अँधेरी रात

कठिन डगर है

सम्बल तेरा।

                       डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, July 12, 2026


चलो तो सही

 पगडंडी खुद ही 

जायेगी बन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, July 11, 2026


सत्य पे टिका

दोलायमान धर्म

डिगता नहीं।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, July 10, 2026


 प्यार-सम्मान

शामिल हों अगर

महकें रिश्ते।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Thursday, July 9, 2026


उखड़ेंगे ना

दूब से जुड़े हुये

हम धरा सा।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, July 8, 2026


तेरे ध्यान में,

या गुम अपने में।

मालूम नहीं?

                  डॉ. मंजूश्री गर्ग

Tuesday, July 7, 2026


बिहारी जी की

वृन्दावन में राजे

मृदु मुस्कान।

        डॉ. मंजूश्री गर्ग

Monday, July 6, 2026


ज्ञान का दीप

मन में जलाकर

फैलायें ज्ञान।

                       डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, July 5, 2026


सजे द्वार पे

तोरण औ' कलश

'शुभागमन'। 

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, July 4, 2026

 

जल ही--------

 

जल ही जीवन

सिंचित उपवन

खिलते फूल।

 

जल ही धार

कटते पत्थर

बनते रेत।

 

जल ही ताप

बनती ऊर्जा

जलते बल्ब।

 

      डॉ. मंजूश्री गर्ग


Friday, July 3, 2026


देव, मानव

अपनी सीमाओं में

बँधे दोनों ही।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, July 2, 2026


नई आशायें

अंकुरित हैं बीज

नये युग के।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, July 1, 2026


आओ कान्हा!

मन धीर ना धरे

तुम्हारे बिन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, June 30, 2026


आधुनिक लिबास में, आधुनिकता का दम भरते हैं।

जकड़े हैं वही, आज भी रूढ़ियों की सोच में।।

                             डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, June 29, 2026


पंक में रह

कमल सा खिलना

जग का सार।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, June 28, 2026


तेरी यादों की खुशबू से जी भरता ही नहीं।

घूमते रहते हैं दिन-रात इसी उपवन में।।

                             डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, June 27, 2026

 

माँझी वही जो

प्रतिकूल हवा में

पार लगा दे।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Friday, June 26, 2026

 


फालसा


डॉ. मंजूश्री गर्ग

फालसा को अंग्रेजी में इंडियन शरबत बेरी(Indian Sherbet Berry) या फालसा बेरी(Phalsa Berry) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Grewia asiatica है। फालसा दक्षिणी एशिया में भारत, पाकिस्तान, कंबोडिया में गर्मी के मौसम में बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है।

फालसा फल की झाड़ियाँ होती हैं जो 8 मी. तक की हो सकती हैं। इसकी पत्तियाँ 5-12 सें. मी. तक लंबी होती हैं और इसके फूल और फल गुच्छों में लगते हैं। जिनमें एक-एक फूल 2 सें. मी. व्यास का होता है और इसमें 12 मि. मी. की पाँच पंखुरियाँ होती हैं। इन फूलों से 5 से 12 मि.मी. व्यास के फल बनते हैं जो फालसा कहलाते हैं। इनका रंग जामुनी, मैरून का मिला-जुलासा फालसई रंग होता है इन्हीं के कारण रंगों की दुनिया में फालसई रंग वर्णित हुआ है जैसे बादामी रंग बादाम के बाहरी कठोर छिलके के रंग के कारण कहा जाता है। फालसे खट्टे-मीठे बहुत ही स्वादिष्ट व गुणकारी होते हैं। फालसे का शरबत भी बनाया जाता है, जिसकी तासीर बहुत ठंडी होती है। गर्मियों के मौसम में फालसे का सेवन बहुत लाभप्रद होता हैं।

 

 


Thursday, June 25, 2026


दीपित है चाँद सूरज की रोशनी से

मोहित हैं हम चाँद की चाँदनी पे।।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, June 24, 2026


हर पड़ाव

देते हमें विश्राम

राह में बने।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, June 23, 2026


बेटी सँवारे 

दोनों कुल कूल से

बन के नदी।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, June 22, 2026


जब समय तुम्हारा है, हर कोई सुनता है।

वरना किस के पास समय है किसी के दर्द सुनने का।।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, June 21, 2026


महकी क्यारी

काँटों के बीच रह

मुस्काये फूल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, June 20, 2026



काफल

डॉ. मंजूश्री गर्ग

काफल का वैज्ञानिक नाम Myrica esculata है। काफल का पेड़ सदाबहार जंगली पेड़ है। काफल के फल गर्मियों के मौसम में पर्वतीय स्थनों में आते हैं और वहाँ बहुत लोकप्रिय हैं। काफल के पेड़ भारत या नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में या हिमालय के तराई वाले इलाकों में पाये जाते हैं। काफल के पेड़ एक बड़े वृक्ष या झाड़ी के रूप में मिलते हैं। फलों का आकार बहुत ही छोटा, गोल व दानेदार होता है लगभग 1 से.मी. व्यास से भी कम। रंग हल्का मैरून या जामुनी रंग का मिला-जुला होता है। काफल के फल खाने में खट्टे-मीठे बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं व तासीर ठंड़ी होती है।