Tuesday, October 13, 2026

 

हो आदि शक्ति तुम ही

 

निराकार हो या साकार तुम,

हो आदि शक्ति तुम ही।

नदियाँ इठलाती चलतीं,

फलती-फूलती प्रकृति तुम से ही।

गृह-नक्षत्र रहते घूमते,

चाँद चाँदनी बरसाता तुम से ही।

लीन प्रलय में होकर एक दिन,

नव जीवन सब पाते तुम से ही।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग


Monday, October 12, 2026



11 अक्टूबर 2026 से 19 अक्टूबर 2026 तक मनाये जाने वाले शारदीय नवरात्री पर्व
पर
देवी माँ आपको शत्-शत् नमन


शारदीय नवरात्रों में हम ही नहीं करते आराधना माँ देवी की,

गुलमेंहदी, गुलदाउदी, गेंदा, गुलाब महक कर कर रहे हैं आऱाधना।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, October 11, 2026

 


11 अक्टूबर 2026, रविवार, अश्विन मास शुक्ल पक्ष प्रतिपदा तिथि

श्री अग्रसेन जयंती पर अग्रसेन महाराज को शत्-शत् नमन

Saturday, October 10, 2026


वंशावली में

माता-पिता शामिल

सदा रहेंगे।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, October 9, 2026


कमरे में है

'विंडोज' खुलते ही

जहाँ सारा ही।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, October 8, 2026


भजन

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

बीच भँवर में नाव फँसी है

अब तो पार लगा दो प्रभु।

 

पूजा की विधि जानूँ ना

जानूँ बस एक तेरा नाम मैं।

मन का संयम टूटे ना

आस निरास में बदले ना

अब तो पार लगा दो प्रभु।

 

भूल गये क्या मुझको भगवन्

कैसे तुम्हें पुकारूँ मैं।

विनती करते हारी मैं

अब तो सुध ले लो प्रभु मेरी

अब तो पार लगा दो प्रभु।

 

पग-पग पर अपराध हुये

हाथ जोड़ मैं विनती करती

सब अपराध क्षमा करो तुम

भाग्य रेख को तुम बदल दो

अब तो पार लगा दो प्रभु।

 

 

Wednesday, October 7, 2026


भोर का तारा हूँ मैं

 

आओ मेरे साथ जागो।

कुछ पल साथ चलो।

भोर का तारा हूँ मैं,

देकर तुम्हें नयी सुबह,

जीवन में भर कर उजाला,

खो जाऊँगा मैं कहीं।

आओ मेरे साथ जागो।

कुछ पल साथ चलो।

          डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, October 6, 2026

 

नीम वृक्ष


डॉ. मंजूश्री गर्ग

नीम वृक्ष भारतीय मूल का पर्णपाती वृक्ष है। इसका वैज्ञानिक नाम Azadirachta indica है। संस्कृत में इसे निंब कहते हैं व अंग्रेजी में Neemtree  या  Margosatree कहते हैं। नीम वृक्ष भारत के अतिरिक्त भारत के समीपवर्ती देशों में नेपाल, बांग्लादेश, बर्मा, थाइलैंड, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका के साथ-साथ अफ्रीका, दक्षिणी अफ्रीका, आदि अन्य उष्ण कटिबन्धीय व उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पाया जाता है।

नीम वृक्ष की लंबाई 15 से 20 मी. तक होती है। इसका तना सीधा लगभग 1 मी. व्यास तक होता है। इसकी छाल कठोर व दरार युक्त सफेद या भूरे रंग की होती हैं। शाखायें चारों तरफ फैली हुई व बहुत मजबूत होती हैं, इसीलिये सावन के महीने में आम के पेड़ की शाखाओं की तरह इन पर झूले डाले जाते हैं। तने से एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ निकलता है जो गोंद होता है। नीम के पेड़ पर पत्तियाँ इस पर कटावदार संयुक्त लगती हैं जो पतझड़ के मौसम में झड़ जाती हैं और बसन्त के मौसम में नई कोंपले आनी शुरू होती हैं जो हल्की गुलाबी-हल्के पीले रंग की होती हैं। फूल सुगन्धित सफेद रंग के गुच्छों के रूप में खिलते हैं जिन पर 2 से. मी. लम्बा व 1.5 से.मी. व्यास का चिकना व अण्डाकार हल्के पीले रंग का फल लगता है जिसे निंबौली कहते हैं। इसमें बीज होता है। नीम की पत्तियों व फलों का स्वाद हल्का कड़वा होता है, लेकिन दोनों ही स्वास्थ्य के लिये लाभकारी होते हैं। नीम वृक्ष की पतली पुरानी टहनियाँ दातुन के काम आती हैं जो दाँतों के स्वास्थ्य के लिये लाभकारी होती हैं। नीम की पत्तियों को उबालकर इसके पानी से नहाने पर चर्म रोग में बहुत लाभ मिलता है।

नीम वृक्ष की छाया अत्यन्त सुखद व शीतल होती है इसीलिये शिवकासी(तमिलनाडु राज्य) जैसे शुष्क क्षेत्र में नीम वृक्ष बहुतायत से लगाये गये हैं। इनकी छाया में आतिशबाजी बनाने का काम होता है।

भारत में नीम का प्रयोग एक औषधि के रूप में किया जाता है। आज के समय में बहुत सी एलोपैथिक दवाईयाँ नीम की पत्ती व उसकी छाल से बनती हैं। कोरोना काल में प्रायः घरों में हवा शुद्ध होने के लिये नीम की टहनियों को रखते थे।

 

 

 

 


Monday, October 5, 2026


बनोगे संत

अंहकार अपना

तोड़ो तो सही।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, October 4, 2026


हर पड़ाव

देते हमें विश्राम

राह में बने।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, October 3, 2026


सुबह-शाम

बीतें पल अमोल

प्रकृति संग।

                         डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, October 2, 2026


देकर देखो

देने में जो है सुख

लेने में नहीं।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, October 1, 2026

 

वट वृक्ष


डॉ. मंजूश्री गर्ग

वट वृक्ष भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है। यह सैंकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाला सदाबहार पेड़ है। इसे बरगद और बड़ के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus benghalensis और अंग्रेजी में इसे banyan कहते हैं। भारत के उत्तर प्रदेश में संगम के किनारे ऐसा ही एक वट वृक्ष है जिसे अक्षय वट कहते हैं। भारत में प्रायः सभी जगह वट वृक्ष पाये जाते हैं। पाँच वट वृक्षों का धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है-

1.      अक्षय वट- प्रयागराज

2.      पंचवट- नासिक

3.      वंशीवट- वृंदावन-मथुरा के बीच भाण्डीरवन में

4.      गयावट- गया

5.      सिद्ध वट उज्जैन

भारत के अतिरिक्त नेपाल, वर्मा, श्रीलंका, इंडोनेशिया, जापान, पाकिस्तान, आदि देशों व अन्य उष्ण कटिबंधीय देशों में भी पाया जाता है।

वट वृक्ष की शाखाओं से जड़ें निकलकर धीरे-धीरे धरती के अन्दर चली जाती हैं और पेड़ के लिये एक स्तम्भ का काम करती हैं. इन जड़ों को ‘बरोह’ या ‘प्राप’ जड़ कहते हैं। यह एक द्वीबीजपत्री व सपुष्पक वृक्ष है। इसकी लंबाई लगभग 15 से 20 मी. तक होती है और चारों तरफ काफी भूभाग में फैला होता है। कलकत्ता के बॉटनिकल गार्डन में 250 साल पुराना एक वट वृक्ष है जिसकी लंबाई 24.5 मी. के लगभग है और चारों ओर लगभग 18,918 वर्ग मी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसे सन् 1989 ई. में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया था। वट वृक्ष की पत्तियाँ लगभग 4 से 5 इंच चौड़ी व 7 से 8 इंच लंबी अंडाकार होती हैं। इसका फल छोटा गोलाकर व लाल रंग का होता है जिसके अंदर बीज पाया जाता है। वट वृक्ष अन्य पेड़ों की तुलना में 4 से 5 प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन देता है लगभग बीस घंटों तक ऑक्सीजन देता है।

हिंदू धर्म में वट  वृक्ष की बहुत महत्ता है। प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को सुहागिन स्त्रियाँ वट सावित्री व्रत रखती हैं व वट वृक्ष की पूजा करती हैं।

 

Wednesday, September 30, 2026


 आँसू से नहीं

खुशियों से गिनते

जीवन पल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग

Tuesday, September 29, 2026


रहो कहीं भी

हो के रहो मेरे ही

हर पल ही।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, September 28, 2026


शरद ऋतु

शीतल मंद हवा

छूती है मन।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, September 27, 2026

 

पीपल वृक्ष

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

पीपल वृक्ष को संस्कृत में अश्वत्थ कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus Religiosa। पीपल का वृक्ष बरगद और नीम के वृक्ष की तरह विशालकाय होता है और सैंकड़ों वर्षों तक जीवित रहता है। भारत के अतिरिक्त यह पेड़ नेपाल, श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया में भी पाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तःचेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। ऐसी मान्यता है कि पीपल के वृक्ष की पूजा करने से सद्गति मिलती है।

पीपल के वृक्ष की लंबाई लगभग 15 से 20 फुट तक होती है, शाखायें चारों ओर फैली होती हैं। इसके पत्ते देखने में दिल के आकार के बहुत ही सुन्दर होते हैं। बसन्त ऋतु में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और हल्के पीले, हल्के गुलाबी रंग के नये पत्ते आने शुरू होते हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर लगते हैं। हल्की सी हवा चलने पर जब यह लहराते हैं तो लगता है बसन्त ऋतु के आगमन का स्वागत कर रहे हों। एक कवि ने तो मन की चंचलता के लिये पीपल के पत्तों की उपमा देते हुये कहा है-

पीपल पात सरिस मन डोला।

पीपल के पत्तों की शिराओं का जाल बहुत मजबूत होता है। सूखे हुये पत्तों को 10-15 दिन पानी में भिगोने से इनका हरा भाग निकल जाता है और सुन्दर जालीनुमा पत्ता शेष बचता है जिसे पूरी तरह सुखाकर इस पर चित्रकारी भी की जाती है। उदाहरण-

पीपल के फूल गुप्त रहते हैं और फल आकार में मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दानों से बहुत छोटे होते हैं किन्तु इनसे उत्पन्न विशाल वृक्ष सैंकड़ों वर्षों तक खड़ा रहता है।

पीपल के पत्ते जानवरों के चारे के रूप में प्रयोग होते हैं। पीपल की लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम नहीं आती लेकिन यज्ञ के लिये आम की लकड़ी के समान पवित्र मानी जाती है। प्राचीन समय में ऋषिगण पीपल की लकड़ी और शमी की लकड़ी को रगड़कर यज्ञ के लिये अग्नि प्रज्वलित करते थे। यज्ञ में घी डालने वाली लंबी चम्मच(स्त्रुआ) को भी पीपल की लकड़ी से बनाया जाता है।

श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पहले श्री कृष्ण दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान-लीन हुये थे। भगवान बुद्ध को भी बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था, जिसे बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है।

 

 

 

 


Saturday, September 26, 2026


भाव-लहरी

ह्रदय में उमड़ी

शब्दों में बही।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, September 25, 2026


नदी जल में

किल्लोल हैं करती

पानी की बूँदें।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, September 24, 2026


थकित मन

चाँदनी सी शीतल

तेरी छुअन।

                        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, September 23, 2026


मधु-मालती के फूल रात में खिलें।

महकें और महकायें मन-आँगन।।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, September 22, 2026


ताप सह के

देते हमें हैं छाँव

वट-पीपल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, September 21, 2026


आज की बातें

बीते युग की बातें

होनी हैं कल।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, September 20, 2026


बरखा बाद

धानी चूनर ओढ़

सजी धरती।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, September 19, 2026


श्री नरेश मेहता

 

जन्म-तिथि- 15 फरवरी,1922, शाजापुर(मध्य प्रदेश)

पुण्य-तिथि- 22 नवंबर,2000, भोपाल(मध्य प्रदेश)

श्री नरेश मेहता आधुनिक हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि, लेखक व नाटककार थे। उनका बचपन का नाम पूर्णशंकर था। नरसिंह गढ़ की राजमाता ने एक सभा में उनके काव्य-पाठ पर प्रसन्न होकर उन्हें ‘नरेश’ उपाधि दी। कालांतर में उन्होंने अपना यही नाम रख लिया।  उनका काव्य-लेखन 1935-36 से आरंभ हुआ। मुक्तिबोध, प्रभाकर माचवे, नेमिचंद्र जैन, सोहनलाल द्विवेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, आदि कवियो से प्रशंसा पाकर काव्य लेखन की ओर अग्रसर हुये। बनारस विश्व विद्यालय से एम. ए. किया। ऑल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद में कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य किया। इन्दौर से प्रकाशित ‘चौथा संसार’  हिन्दी दैनिक का संपादन भी किया। श्री अज्ञेय जी द्वारा सम्पादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक प्रमुख कवि के रूप में प्रसिद्ध हुये। सन्1956 में नलिन विलोचन शर्मा व केसरी कुमार के साथ मिलकर ‘नकेनवाद’ की स्थापना की।

श्री नरेश मेहता ने आधुनिक कविता को नयी व्यंजना के साथ नया आयाम दिया। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी सर्जना उनकी कविता के मूल त्तत्व हैं। कविता के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, नाटक, संस्मरण, आलोचना, आदि विधाओं में भी उनका रचनात्मक योगदान रहा। उनके साहित्यिक जीवन के निर्माण में उनकी पत्नी महिमा मेहता का भी विशेष योगदान रहा। उनकी प्रमुख कृतियाँ है-

काव्य-संग्रह-  वन पाखी!, बोलने दो चीड़ को, मेरा समर्पित एकांत, पिछले दिनों नंगे पैर, अरण्या, आदि।

खण्ड-काव्य- संशय की एक रात, शबरी, प्रार्थना पुरूष, आदि।

उपन्यास- यह पथ बंधु था, नदी यशस्वी है, आदि।

कहानी-संग्रह- तथापि, एक समर्पित महिला, जलसाघर, आदि।

श्री नरेश मेहता को सन् 1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया व सन् 1992 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

श्री नरेश मेहता की कुछ कविताओं के अंश-

शब्द केवल शब्द नहीं होते

वे प्रार्थनायें होती हैं

जो मनुष्य के भीतर का अंधकार हर लेती हैं।

                        नरेश मेहता

 

मौन भी एक भाषा है,

बशर्ते उसे सुनने वाला

कोई ह्रदय मौजूद हो।

            नरेश मेहता