प्यार-सम्मान
शामिल हों अगर
महकें रिश्ते।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
फालसा
फालसा को अंग्रेजी में इंडियन शरबत बेरी(Indian Sherbet Berry) या फालसा बेरी(Phalsa Berry) कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Grewia asiatica है। फालसा दक्षिणी एशिया
में भारत, पाकिस्तान, कंबोडिया में गर्मी के मौसम में बहुत अधिक मात्रा में पाया
जाता है।
फालसा फल की झाड़ियाँ होती हैं जो 8 मी. तक की
हो सकती हैं। इसकी पत्तियाँ 5-12 सें. मी. तक लंबी होती हैं और इसके फूल और फल गुच्छों
में लगते हैं। जिनमें एक-एक फूल 2 सें. मी. व्यास का होता है और इसमें 12 मि. मी.
की पाँच पंखुरियाँ होती हैं। इन फूलों से 5 से 12 मि.मी. व्यास के फल बनते हैं जो
फालसा कहलाते हैं। इनका रंग जामुनी, मैरून का मिला-जुलासा फालसई रंग होता है
इन्हीं के कारण रंगों की दुनिया में फालसई रंग वर्णित हुआ है जैसे बादामी रंग
बादाम के बाहरी कठोर छिलके के रंग के कारण कहा जाता है। फालसे खट्टे-मीठे बहुत ही
स्वादिष्ट व गुणकारी होते हैं। फालसे का शरबत भी बनाया जाता है, जिसकी तासीर बहुत
ठंडी होती है। गर्मियों के मौसम में फालसे का सेवन बहुत लाभप्रद होता हैं।
काफल
डॉ. मंजूश्री गर्ग
काफल का वैज्ञानिक नाम Myrica esculata है। काफल का पेड़ सदाबहार जंगली पेड़ है। काफल के फल गर्मियों के मौसम में पर्वतीय स्थनों में आते हैं और वहाँ बहुत लोकप्रिय हैं। काफल के पेड़ भारत या नेपाल के पर्वतीय क्षेत्रों में या हिमालय के तराई वाले इलाकों में पाये जाते हैं। काफल के पेड़ एक बड़े वृक्ष या झाड़ी के रूप में मिलते हैं। फलों का आकार बहुत ही छोटा, गोल व दानेदार होता है लगभग 1 से.मी. व्यास से भी कम। रंग हल्का मैरून या जामुनी रंग का मिला-जुला होता है। काफल के फल खाने में खट्टे-मीठे बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं व तासीर ठंड़ी होती है।
खिरनी या
Mimosops Hexandra
डॉ. मंजूश्री गर्ग
खिरनी का फल देखने में लगभग नीम की निवोली के
जैसा होता है लेकिन खाने में बहुत ही स्वादिष्ट व मीठा होता है। खिरनी के पेड़
उत्तर भारत में अपने आप उग जाते हैं। इसका पेड़ बहुत ही घना व ऊँचा होता है। ऊँचाई
लगभग 40-50 फुट तक होती है। खिरनी के पेड़ की आयु भी बहुत अधिक होती है। इस पेड़
की लकड़ी बहुत मजबूत होती है और इसकी छाल औषधि के रूप में काम आती है। खिरनी का फल
गर्मियों के मौसम में आता है। खिरनी का फल नीम की निवोली से थोड़ा लम्बा व चटक
पीले रंग का होता है।
लीची
डॉ.
मंजूश्री गर्ग
लीची एक मधुर ड्रूप फल है जो गर्मियों के मौसम
में आता है। इसका वैज्ञानिक नाम Litchi Chinensis है। इसका
मूल उत्पत्ति स्थान चीन माना जाता है। यह ऊष्णकटिबन्धीय फल है। यह मैडागास्कर,
नेपाल, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, थाइलैंड, फिलीपींस, आदि देशों में पाया जाता
है। भारत में सबसे ज्यादा लीची के बाग उत्तराखण्ड के देहरादून में हैं।
लीची का पेड़ सदाबहार पेड़ हैं जो कि 15 से 20
मी. तक ऊँचा होता है और पत्तियाँ लगभग 15 से 25 से. मी. लम्बी व पतली होती हैं
जिनमें स्निग्धता होती है, देखने में बहुत सुन्दर लगती हैं। फूल छोटे हरे, सफेद या
पीले रंग के सुगंधित होते हैं जो लगभग 30 से. मी. लम्बी पैनिकल पर लगते हैं। फूल
आने के लगभग तीन महीने के बाद फल लगता है। भारत में मई, जून के महीने में फल आता
है। फल का बाहरी छिलका मैरून रंग का होत है जो आसानी से हट जाता है। फल के अंदर दूधिया
रंग का मीठा, रसयुक्त गूदा होता है लीची का यही भाग खाने योग्य होता है। फल के बीच
में भूरे रंग की गुठली होती है। लीची में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता
है।
आड़ू
आड़ू को अंग्रेजी में(Peach) कहते हैं। इसका वानस्पतिक नाम प्रूनस पर्सिका
है। कुछ वैज्ञानिक आड़ू की उत्पत्ति स्थान चीन मानते हैं और कुछ ईरान। यह पतझड़ी
वृक्ष है। भारत में पर्वतीय व उपपर्वतीय भागों में इसकी सफल खेती होती है। इसका फल
देखने में बहुत कुछ खुबानी जैसा लगता है। आकार में खुबानी से थोड़ा बड़ा होता है व
हल्के हरे या हल्के पीले रंग का होता है। जहाँ धूप पड़ती है वहाँ का रंग हल्का
गुलाबी हो जाता है। आड़ू पकने पर मीठा लगता है और इसका प्रयोग केवल फल के रूप में
ही किया जाता है, खुबानी की तरह मेवा की तरह नहीं। आड़ू में भी एक गुठली होती है। यह
फल मैदानी भागों में गर्मियों के मौसम में अधिकांशतः पाया जाता है।
आड़ू के वृक्ष का प्रजनन कलिकायन द्वारा होता
है। आड़ू वृक्ष के मूल तने पर अप्रैल, मई महीने में रिंग बड़िंग की जाती है। पौधे 15
से 18 फुट की दूरी पर दिसंबर, जनवरी महीने में लगाये जाते हैं। सुंदर आकार व अच्छी
वृद्धि के लिये प्रति दो वर्ष में कटाई, छँटाई करनी चाहिये। अप्रैल, मई के महीने
में गुलाबी सुंदर रंग के फूल आते हैं और जून के महीने में फल लगता है। प्रति वृक्ष
30 से 50 किलो लगता है। इसकी तासीर गर्म होती है। आड़ू में प्रोटीन, वसा, फाइबर,
कैल्शियम, पोटेशियम, शुगर, आदि प्रचुर मात्रा में होती है।
भोजपत्र
वृक्ष
डॉ. मंजूश्री
गर्ग
भोजपत्र को संस्कृत में भुर्ज, अंग्रेजी में Himalayan Birch कहते हैं। इसका वैज्ञानिक
नाम Betula utilis है। प्राचीन
काल में ग्रंथों की रचना के लिये भोजपत्रों का प्रयोग होता था। वास्तव में भोजपत्र
ताड़ के पत्तों की भाँति कोई पत्ता नहीं होता वरन् भुर्ज वृक्ष की छाल होती है जिस
पर लिखा जाता है। यह छाल कागज से अधिक मजबूत व टिकाऊ होती है। आज भी पुरातत्व
संग्रहालयों में भोजपत्र पर लिखी सैकड़ों पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं जैसे हरिद्वार
में गुरूकुल कांगड़ी विश्व विद्यालय। कालिदास ने भी अपनी कृतियों में भोजपत्र का
उल्लेख किया है।
भोजपत्र वृक्ष हिमालय में लगभग 4,500 मी. तक की
ऊँचाई पर पाया जाता है। यह ठंडे वातावरण में उगने वाला पतझड़ी वृक्ष है जो लगभग 20
मी. तक ऊँचा हो सकता है। यह वृक्ष बहुउपयोगी है। इसके पत्ते छोटे और किनारे
दांतेदार होते हैं। वृक्ष पर नर और मादा मंजरी लगती है। इसकी छाल पतली, कागजनुमा
होती है जिस पर आड़ी धारियों के रूप में तने पर मिलने वाले वायुरंध्र बहुत ही साफ
गहरे रंग में नजर आते हैं। यह छाल लगभग खराब न होने वाली होती है क्योंकि इसमें
रेजिन युक्त तेल पाया जाता है। छाल के विभिन्न रंग होते हैं जैसे-लाल, सफेद, पीला,
सिल्वर, आदि। इन रंगों के आधार पर ही भोजपत्रों के नाम पड़े हैं।
भुर्ज की छाल ऋतु परिवर्तन पर स्वतः वृक्ष से
अलग हो जाती है और यह कई परतों में होती है। प्रत्येक परत कागज की तरह बहुत पतली
होती है। कभी-कभी यह छाल 60 फुट तक निकलती है। प्रारम्भ में चौड़ी होती है और बाद
में क्रमशः संकरी होती जाती है। भूर्ज की छाल को लिखने योग्य बनाने के लिये सबसे
पहले सुखाया जाता है फिर वांछित आकार में काटकर धागे से उन्हें बाँधा जाता है।
दोनों ओर दो काष्ठ फलक रखे जाते हैं। भोज पत्र पर लिखने के लिये गाढ़ी काली स्याही
का प्रयोग किया जाता है जो बादाम के छिलकों को जलाकर, उसकी राख में गोमूत्र मिलाकर
बनाई जाती है। यह स्याही बहुत ही टिकाऊ होती है व पानी से खराब नहीं होती। आजकल भी
कहीं-कहीं धार्मिक अनुष्ठानों के लिये या जन्मपत्री बनाने के लिये भोजपत्रों का
प्रयोग किया जाता है।
भुर्ज वृक्ष की लकड़ी बहुत ही मजबूत, टिकाऊ व
चमकदार होती है। इससे प्लाईवुड भी बनाई जाती है और ड्रम, सितार, गिटार, आदि वाद्य
यंत्र बनाने के भी काम आती है। भुर्ज वृक्ष की लकड़ी को घर में रखना बहुत शुभ माना
जाता है।
खुबानी
डॉ. मंजूश्री गर्ग
खुबानी को अंग्रेजी में एप्रिकोट(Apricot) कहते हैं। यह ‘प्रूनस’ नाम के वनस्पति
परिवार का गुठलीदार फल है। खुबानी मुख्यतः ठंड़े प्रदेशों में उगाया जाता है, अधिक
गर्मी में खुबानी का पौधा मर जाता है। विश्व में सबसे ज्यादा खुबानी तुर्की में
पैदा की जाती है। भारत में कशमीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पैदा की जाती है।
ताजा खुबानी फल के रूप में खाई जाती है और सूखी खुबानी बादाम, अखरोट, आदि मेवा की तरह
खाई जाती है। खुबानी के फल गर्मी के मौसम में आते हैं और इनकी तासीर गर्म होती है।
खुबानी की गुठली को तोड़कर एक बादाम की गिरी निकलती है जिसे खा सकते हैं। वयस्क एक
बार में 5-6 गिरी से ज्यादा न खायें व यह गिरी बच्चों को नहीं देनी चाहिये क्योंकि
इसमें हल्की मात्रा में एक हैड्रसायनिक एसिड नाम का जहरीला पदार्थ होता है।
खुबानी के पेड़ की लंबाई 8 से 12 मी. तक होती है
और तने की मोटाई 40 से. मी. के आस-पास होती है। ऊपर से पेड़ की टहनियाँ व पत्तियाँ
फैली हुई होती हैं। पत्ती का आकार 5 से 9 से. मी. लम्बा व 4 से 8 सें. मी. चौड़ा
होता है अग्रभाग नुकीला होता है। फूल पाँच पंखुरियों वाले सफेद या हल्के गुलाबी
रंग के होते हैं। यह फूल अकेले या दो फूलों के जोड़ों में खिलते हैं। खुबानी का
रंग अधिकांशतः पीला या नारंगी रंग का होता है, जिधर सूरज की रोशनी पड़ती है उधर से
रंग हल्का लाल हो जाता है। खुबानी का छिलका बहुत मुलायम होता है कभी-कभी बाहरी सतह
पर हल्के रोयें होते हैं। खुबानी का रंग जितना गहरा होता है, उसमें विटामिन ई,
विटामिन सी और पोटेशियम की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।