रात भोली सी
और अनूठे दिन
बचपन में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नई आशायें
अंकुरित हैं बीज
नये युग के।
बालक मन
जैसे सजाओ सजे
कच्चे घड़े सा।
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
'चाहत' की नई किताब लिखेंगे।
तुम मिलो या ना मिलो 'आस' रखेंगे।।
नन्हें कदम
थाम के हाथ माँ का
बढ़ने लगे।
बैष्णों देवी माँ
त्रिकुट पर्वत पे
सदा विराजें।
मीठा जल भी
सागर में मिल के
खारा ही खारा।
धूल नहीं ये
हल्दी सी है बिखरी
आज हवा में। *
*4-6-2010 का प्रकृति का दृश्य, जब वातावरण में चारों तरफ हवा में पीला रंग धूल में मिला हुआ था
बच्चे आँगन
फुलवारी है खिली
महके मन।
मन द्वारे पे
खिले खुशी के रंग
सजी रंगोली।
'आम' हैं आप
खास 'आम' हैं पर
'आमों' के बीच।
भाल पे होंठ किसने रखे
जिंदगी में महावर घुली।
दृष्टि वो बन गई बाँसुरी
देह ये हो चली गोकुली।
शिवओम अम्बर
साँसों में बसा लो खुशबू की तरह
महका करेंगे तेरे आंगन में।
तुमसे मिल
जिंदगी मीठी हुई
नीम सरीखी।
अटल हैं जो
अडिग हैं इरादे
ध्रुव हैं वही।
एक औ' एक
दो नहीं, हैं ग्यारह
साथ मिलें तो।
उससे हारी दुनिया सारी,
खुद से जो भी जीत गया।
देवेन्द्र माँझी
यौवन की देहरी पे
सजी लाज की कनातें
प्रिय के स्वागत में
मुस्कानों के फूल सजे।
बूँद-बूँद से समुद्र बने
फूल-फूल से उपवन
तुम अपने को कम
मत समझो, तुमसे ही
देश और विश्व बने।
जो पल जिया
खुशी से, अपना है।
बाकी बेगाने।
ठहरी बूँद
सीपी सम पाती में
मोती सी सजी।
दिल से, आँखों से, किसी ठौर से देखा ना गया।
वो उजाला था, मगर गौर से देखा ना गया।।
डॉ. कुअँर बेचैन
ता उम्र बँधे
कच्चे धागे की डोर
कितनी दृढ़!
कंकड़ ने बनाये, अनगिन वृत्त।
मन मेरा, पानी सा तरल।।
गंगा, यमुना
औ' सरस्वती मिलें
संगम तीर्थ।