वो शब्द नहीं हैं! आँसू हैं जो
कविता बन कागज पे उतर आयें हैं।
कैसे! उन्हें हम मुस्कुरा कर महफिल में गा दें,
जो रूँधे कंठ से लिखे गये हैं।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
No comments:
Post a Comment