हिन्दी साहित्य
Thursday, January 11, 2018
नाजुक डाल
झुक-झुक जाये
ना टूटे,
टूटे
मजबूत पेड़
आँधी में।
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
Tuesday, January 9, 2018
प्रतिबंधित जीवन में,
उन्मुक्तता है कैद।
भावनाओं की कैद में
भावना है कैद।
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
Sunday, January 7, 2018
मंजिल पानी है
‘
गर
अवरोधों से डरना कैसा
!
कौन है
?
जिसने ताप सहा नहीं
सूरज जैसा चमका जो भी।
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
Saturday, January 6, 2018
शांत बहुत शांत हैं सागर की लहरें
तूफान आने की प्रबल संभावनायें हैं.
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
Friday, January 5, 2018
जग विष भी देगा तो अमृत हो जायेगा।
मीरा की तरह दीवानी हूँ मैं तेरे नाम की।।
डॉ0मंजूश्री गर्ग
Wednesday, January 3, 2018
कविता
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
नजर उठीं,
उठकर लड़ी,
लड़कर झुकीं,
झुककर खिली।
तुम भँवरा बने,
हम फूल बने,
तुम गूँजे,
फिर उड़े,
हम खिले,
फिर बुझे।
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Monday, January 1, 2018
ऋतु-चक्र
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
सर्दी में सर्दी पड़े, गर्मी में गर्मी.
तभी तो ऋतु-चक्र चलेगा,
सहज जीवन चक्र चलेगा.
बर्फ गिरेगी, हवा चलेगी.
बर्फ पिघलेगी, नदी बहेंगी.
बादल बनेंगे, बादल बरसेंगे.
हर्षित होगी धरा सारी.
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