रोड़े बनी हैं,
प्रगति-पथ पर
अच्छाईयाँ ही।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
लोकाट(फल)
लोकाट(Loquat) रोजेसी(Rosaceac) कुल का
फल है। यह आम, आलू बुखारा, चेरी, आदि की तरह ड्रूप फल है। लोकाट का रंग नारंगी या
पीला होता है और आकार नाशपाती जैसा होता है लेकिन छोटा होता है। इसके ऊपर पतला
छिलका होता है, अंदर नारंगी रंग का ही गूदा होता है और केंद्र में एक या एक से
अधिक कठोर बीज होते हैं। कभी-कभी एक ही लोकाट में 5 से 6 बीज तक पाये जाते हैं।
लोकाट का गूदा रसीला होता है व स्वाद खट्टा-मीठा होता है। लोकाट के फल पेड़ पर गुच्छों
के रूप में लगते हैं। भारत में लोकाट मार्च-अप्रैल के महीने में आती हैं।
लोकाट का पेड़ मूल रूप से चीन देश का है। लगभग
1000 वर्षों से अधिक समय से चीन में इसकी खेती की जा रही है। जापान में भी 1000 वर्षों
से इसकी खेती की जा रही है। जापान में इसे जापानी प्लम कहते हैं और चीन में चीनी
प्लम। लोकाट का पेड़ सदाबहार होता है। पेड़ की लंबाई प्रायः 5 से 10 मी. तक होती
है। पत्तियाँ सरल 4 से 10 इंच लंबी गहरे हरे रंग की होती हैं। क्षेत्र विशेष के
मौसम के अनुसार पतझड़ के मौसम में फूल आने शुरू होते हैं। फूल 2 से.मी. व्यास के सफेद
पाँच पँखुड़ियों वाले होते हैं और तीन से दस फूलों के गुच्छों में लगते हैं, इनमें
मीठी व मादक सुगंध होती है।
आजकल लोकाट की खेती भारत, चीन, जापान के अतिरिक्त
अन्य देशों में भी की की रही है जैसे-जार्जिया, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, पाकिस्तान,
न्यूजीलैंड, आदि।
सिंघाड़ा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
सिंघाड़ा को संस्कृत में श्रृंगाटक कहते हैं और अंग्रेजी में Water Chestnut। सिंघाड़ा एक तिकोने आकार का फल है, इसका रंग हरा या लाल होता है। ऊपर की तरफ दो काँटे होते हैं। छिलका हटाने पर अंदर सफेद गिरी निकलती है यही भाग खाने योग्य होता है। सिंघाड़े का स्वाद हल्का मीठा और तासीर ठंडी होती है. सिंघाड़े की गिरी को सुखाकर और पीसकर इसका आटा बनाया जाता है जिसका प्रयोग व्रत, उपवास में किया जाता है। सिंघाड़े की सूखी गिरी को फल, फूल के साथ शिवलिंग पर चढ़ाने का भी महत्व है।
सिंघाड़े की बेलें होती हैं जो जलाशयों या पोखरों के पानी की सतह पर फैली होती हैं। जड़ें पानी के भीतर कीचड़ में दूर तक फैली होती हैं। इसके लिये पानी में कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में सिंघाड़े की बेलें नहीं होती। भारतवर्ष में प्रायः प्रत्येक प्रांत में सिंघाड़े की पैदावार होती है विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, झारखंड, आदि में।
कसेरू
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कसेरू एक कंद(Bulb) है, आलू और शकरकंद की तरह। अंग्रेजी में कसेरू को क्लब-रश
या बुल्रश कहते हैं, इसका वैज्ञानिक नाम है Scirpus Kysoor। कसेरू आकार में छोटे गोलाकार या अंडाकार होते
हैं और इनका रंग काला या भूरा होता है। बाहरी सतह पर हल्के रोयें और पतली-पतली जड़ें
होती हैं। कसेरू अंदर से एकदम सफेद होता है और स्वाद मीठा व तासीर ठंडी होती है। उबाल
कर खाने में मिठास और भी बढ़ जाती है।
कसेरू एक बारहमासी घास जैसा जलीय पौधा है इसकी खेती नदी, तालाबों, पोखरों के किनारे या दलदली इलाकों में की जाती है। इसका तना त्रिकोणीय होता है। इसकी पत्तियाँ लंबी, नुकीली व घास जैसी चपटी होती हैं। कसेरू पौधे की जड़ें दलदल के अंदर लगी होती हैं।
अंगूर
डॉ.
मंजूश्री गर्ग
अंगूर एक स्वादिष्ट व सुंदर फल है। संस्कृत में इसे
द्राक्ष व अंग्रेजी में Grapes कहते
हैं। आम फल को जहाँ फलों का राजा कहा जाता है वहीं अंगूर फल को सर्वोत्तम कहा जाता
है। अंगूर में माँ के दूध के समान पोषक तत्व होते हैं। यह सबल-निर्बल, स्वस्थ-अस्वस्थ
सभी के लिये समान उपयोगी है। अंगूर के रस से आयुर्वेद में ‘द्राक्षासव’ एक औषधि बनती है जिसके सेवन से महिलाओं में होने वाली रक्त
की कमी की पूर्ति होती है। अंगूर के रस के सेवन से रक्त-स्राव की कमी को पूरा किया
जाता है। अंगूर से ही किशमिश, मुनक्के व Wine बनती है। किशमिश का प्रयोग मेवे के रूप में होता है।
मिठाईयों में भी किशमिश को डाला जाता है। ऐसे ही खाने में भी किशमिश स्वादिष्ट व स्वास्थ्यवर्धक
होती हैं। मुनक्के का प्रयोग कब्ज होने पर या बुखार में किया जाता है। Wine का प्रयोग थोड़ी मात्रा में ह्रदय रोगियों के
लिये लाभकारी होता है।
अंगूर की खेती का प्रारम्भ लगभग 5000 वर्ष पूर्व
भारत से हुआ था। अंगूर की बेलें होती हैं जो देखने में बहुत सुंदर लगती हैं- 5 फुट
से 6 फुट तक लंबी होने पर इन्हें तार या पतली लकड़ी के बाने बनाकर फैला दिया जाता
है। अंगूर गुच्छों के रूप में लगते हैं। अंगूर कई प्रकार के होते हैं-एक- हरा या
हल्का पीले रंग के अंगूर होते हैं। यह स्वाद में खट्टे-मीठे होते हैं, आकार में
गोल या लंबे दोनों प्रकार के पाये जाते हैं। इनका व्यास 2 से. मी. से 3 से.मी. तक
होता है। इन्हें सुखाकर किशमिश बनाई जाती है। दूसरे- लाल रंग के अंगूर होते हैं,
इनका आकार थोड़ा बड़ा होता है, स्वाद में मीठा होता है, अंदर बीज भी होता है जो
खाया नहीं जाता। अन्य अंगूरों में बीज बहुत छोटे होते हैं और खाते समय पता ही नहीं
चलते। इन्हीं को सुखाकर मुनक्के बनाये जाते हैं। तीसरे- काले रंग के अंगूर होते
हैं जो आकार में बड़े व स्वाद में मीठे होते हैं। इनके बीज भी बहुत छोटे होते हैं।
इन्हीं से Wine बनाई जाती है।
अंगूर की बेलों की सुंदरता के कारण इन्हें
अधिकांश इमारतों में पत्थरों पर उकेरा गया है। उदाहरण- आगरा में दयालबाग मंदिर में
अंगूर की बेलों की नक्काशी देखने को मिलती है।