आँसू से नहीं
खुशियों से गिनते
जीवन पल।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
पीपल वृक्ष
डॉ. मंजूश्री गर्ग
पीपल वृक्ष को संस्कृत में अश्वत्थ कहते हैं।
इसका वैज्ञानिक नाम है Ficus Religiosa। पीपल
का वृक्ष बरगद और नीम के वृक्ष की तरह विशालकाय होता है और सैंकड़ों वर्षों तक
जीवित रहता है। भारत के अतिरिक्त यह पेड़ नेपाल, श्रीलंका, चीन, इंडोनेशिया में भी
पाया जाता है। भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को देव वृक्ष माना जाता है, इसके
सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्तःचेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। ऐसी
मान्यता है कि पीपल के वृक्ष की पूजा करने से सद्गति मिलती है।
पीपल के वृक्ष की लंबाई लगभग 15 से 20 फुट तक
होती है, शाखायें चारों ओर फैली होती हैं। इसके पत्ते देखने में दिल के आकार के
बहुत ही सुन्दर होते हैं। बसन्त ऋतु में पुराने पत्ते झड़ जाते हैं और हल्के पीले,
हल्के गुलाबी रंग के नये पत्ते आने शुरू होते हैं जो देखने में बहुत ही सुन्दर
लगते हैं। हल्की सी हवा चलने पर जब यह लहराते हैं तो लगता है बसन्त ऋतु के आगमन का
स्वागत कर रहे हों। एक कवि ने तो मन की चंचलता के लिये पीपल के पत्तों की उपमा
देते हुये कहा है-
पीपल पात
सरिस मन डोला।
पीपल के पत्तों की शिराओं का जाल बहुत मजबूत
होता है। सूखे हुये पत्तों को 10-15 दिन पानी में भिगोने से इनका हरा भाग निकल
जाता है और सुन्दर जालीनुमा पत्ता शेष बचता है जिसे पूरी तरह सुखाकर इस पर
चित्रकारी भी की जाती है। उदाहरण-
पीपल के फूल गुप्त रहते हैं और फल आकार में
मूँगफली के छोटे दानों जैसे होते हैं। बीज राई के दानों से बहुत छोटे होते हैं
किन्तु इनसे उत्पन्न विशाल वृक्ष सैंकड़ों वर्षों तक खड़ा रहता है।
पीपल के पत्ते जानवरों के चारे के रूप में
प्रयोग होते हैं। पीपल की लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम नहीं आती लेकिन यज्ञ के लिये
आम की लकड़ी के समान पवित्र मानी जाती है। प्राचीन समय में ऋषिगण पीपल की लकड़ी और
शमी की लकड़ी को रगड़कर यज्ञ के लिये अग्नि प्रज्वलित करते थे। यज्ञ में घी डालने
वाली लंबी चम्मच(स्त्रुआ) को भी पीपल की लकड़ी से बनाया जाता है।
श्रीमद् भागवत् में लिखा है कि द्वापर युग में
परमधाम जाने से पहले श्री कृष्ण दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान-लीन हुये
थे। भगवान बुद्ध को भी बोधगया में पीपल के वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था,
जिसे बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है।
श्री नरेश मेहता
जन्म-तिथि- 15 फरवरी,1922, शाजापुर(मध्य प्रदेश)
पुण्य-तिथि- 22 नवंबर,2000, भोपाल(मध्य प्रदेश)
श्री नरेश मेहता आधुनिक
हिन्दी साहित्य के एक प्रतिष्ठित कवि, लेखक व नाटककार थे। उनका बचपन का नाम
पूर्णशंकर था। नरसिंह गढ़ की राजमाता ने एक सभा में उनके काव्य-पाठ पर प्रसन्न
होकर उन्हें ‘नरेश’ उपाधि दी।
कालांतर में उन्होंने अपना यही नाम रख लिया। उनका काव्य-लेखन 1935-36 से आरंभ हुआ। मुक्तिबोध,
प्रभाकर माचवे, नेमिचंद्र जैन, सोहनलाल द्विवेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान, आदि कवियो
से प्रशंसा पाकर काव्य लेखन की ओर अग्रसर हुये। बनारस विश्व विद्यालय से एम. ए.
किया। ऑल इंडिया रेडियो, इलाहाबाद में कार्यकारी अधिकारी के रूप में कार्य किया। इन्दौर
से प्रकाशित ‘चौथा संसार’
हिन्दी दैनिक का संपादन भी
किया। श्री अज्ञेय जी द्वारा सम्पादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक प्रमुख कवि के रूप में प्रसिद्ध हुये। सन्1956 में नलिन
विलोचन शर्मा व केसरी कुमार के साथ मिलकर ‘नकेनवाद’ की स्थापना की।
श्री नरेश मेहता ने आधुनिक
कविता को नयी व्यंजना के साथ नया आयाम दिया। रागात्मकता, संवेदना और उदात्तता उनकी
सर्जना उनकी कविता के मूल त्तत्व हैं। कविता के अतिरिक्त उपन्यास, कहानी, नाटक,
संस्मरण, आलोचना, आदि विधाओं में भी उनका रचनात्मक योगदान रहा। उनके साहित्यिक जीवन
के निर्माण में उनकी पत्नी महिमा मेहता का भी विशेष योगदान रहा। उनकी प्रमुख
कृतियाँ है-
काव्य-संग्रह- वन पाखी!, बोलने दो
चीड़ को, मेरा समर्पित एकांत, पिछले दिनों नंगे पैर, अरण्या, आदि।
खण्ड-काव्य- संशय की एक रात,
शबरी, प्रार्थना पुरूष, आदि।
उपन्यास- यह पथ बंधु था,
नदी यशस्वी है, आदि।
कहानी-संग्रह- तथापि, एक
समर्पित महिला, जलसाघर, आदि।
श्री नरेश मेहता को सन्
1988 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया व सन् 1992 में भारतीय
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
श्री नरेश मेहता की कुछ
कविताओं के अंश-
शब्द केवल शब्द नहीं होते
वे प्रार्थनायें होती हैं
जो मनुष्य के भीतर का
अंधकार हर लेती हैं।
नरेश मेहता
मौन भी एक भाषा है,
बशर्ते उसे सुनने वाला
कोई ह्रदय मौजूद हो।
नरेश मेहता
गुलमोहर
डॉ. मंजूश्री गर्ग
लाल वितान
छत्र सा सजे द्वार
गुलमोहर।
डॉ.
मंजूश्री गर्ग
गुलमोहर का वानस्पतिक नाम डोलोक्सि रेजिया है। गर्मियों के
मौसम में सड़क किनारे व पार्कों में लाल, नारंगी व पीले फूलों से लदे गुलमोहर के
वृक्ष विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। गुलमोहर को रॉयल पोंइशियाना व फ्लेम ट्री के
नाम से भी जाना जाता है। इसे ‘स्वर्ग का फूल’ भी कहते हैं। संस्कृत में इसे ‘कृष्ण चूड़’ भी कहते हैं,
क्योंकि श्री कृष्ण भगवान की प्रतिमा के मुकुट का श्रृंगार गुलमोहर के फूलों से भी
किया जाता है। भारत में गुलमोहर के वृक्ष गर्म व नमी वाले सभी स्थानों में पाये
जाते हैं। भारत में गुलमोहर के फूल मार्च-अप्रैल से लेकर जुलाई-अगस्त तक देखने को
मिलते हैं। भारत के अतिरिक्त युगांडा, नाइजीरिया, श्रीलंका, मेक्सिको,
आस्ट्रेलिया, अमेरिका, आदि देशों में भी गुलमोहर के वृक्ष पाये जाते हैं। यद्यपि
मेडागास्कर गुलमोहर का मूल उत्पत्ति स्थान है, लेकिन आजकल प्रायः वहाँ देखने को
नहीं मिलते हैं।।
गुलमोहर के पेड़ की लंबाई 20 से 25 फुट तक होती है और ऊपर
से फैला हुआ होता है जो पेड़ के ऊपर लगभग एक छत्र का आकार लेता है। पत्तियाँ
संयुक्त होती हैं और बहुत छोटी-छोटी होती हैं जो पतली-पतली टहनियों पर दोनों ओर
लगी होती हैं। यह टहनियाँ एक बड़ी टहनी के दोनों ओर समानांतर लगी होती हैं जो
मिलकर 10-12 इंच का आकार लेती हैं जो देखने में फर्न जैसी बहुत ही सुंदर लगती हैं।
यह पत्तियाँ बहुत ही नाजुक होती हैं जो जरा सी हवा चलते ही झड़ जाती हैं। गुलमोहर
के फूल प्रत्येक देश के मौसम के अनुसार अलग-अलग समय में खिलते हैं। गुलमोहर का फूल
आकार में बड़ा होता है लगभग 13 से.मी. का। फूल में पाँच पँखुड़ियाँ होती हैं। चार
पँखुड़ियाँ आकार और रंग में एक समान होती हैं, पाँचवी पँखुड़ी थोड़ी लंबी होती है
जिसमें पीले या सफेद धब्बे होते हैं। गुलमोहर के फूल मकरंद के अच्छे स्रोत होते
हैं, शहद की मक्खियाँ इन पर खूब मँडराती हैं। कुछ समय बाद इन फूलों पर फली लगती
हैं जो लगभग 8 से 10 इंच लंबी होती हैं और इनमें भूरे रंग के बीज होते हैं। आयुर्वेदिक
की कुछ औषधियों में गुलमोहर के बीज व छाल का प्रयोग किया जाता है।