सब कुछ कह दूँगी
सब कुछ कह दूँगी,
राज सारे खोल दूँगी।
लगता नहीं; क्योंकि?
सामने जब तुम होते हो,
कुछ भी कहने की हालत में,
तब हम नहीं होते।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कान्हा का प्यार ------
राधा और ललिता दोनों
सखी थीं कान्हा की.
करती थीं प्यार कान्हा से।
पर, जानती थी ललिता
मैं चाहे कितना करूँ प्यार कान्हा से
कान्हा का प्यार राधा, सिर्फ राधा के लिये है।
हो आदि शक्ति तुम ही
निराकार हो या साकार तुम,
हो आदि शक्ति तुम ही।
नदियाँ इठलाती चलतीं,
फलती-फूलती प्रकृति तुम से ही।
गृह-नक्षत्र रहते घूमते,
चाँद चाँदनी बरसाता तुम से ही।
लीन प्रलय में होकर एक दिन,
नव जीवन सब पाते तुम से ही।
गीत
कैसे मन की बात कहें
मन पे मन का बोझ है।
रात अँधेरी चमके तारे
सजन हमारे कहाँ छुपे हो?
हम तो सजनि! साथ तुम्हारे
पूनम मावस हाथ तुम्हारे।
चाँद-चाँदनी साथ चले
धरती औ’ आकाश तले।
फूलों में फूलों की खुशबू
ऐसे मन में आन बसे हो।
चार दिन की चाँदनी से जिंदगी कटती नहीं।
जिंदगी को चाहिये उम्र-भर की रोशनी।।
मन के पाँवों में बँधे हैं, उनकी यादों के घुँघरू।
सँभाल के पाँव रखे चाहे जितना, झनकते ही हैं ये घुँघरू।।
उठती-गिरती लहरें, कहती हैं कथा प्यार की।
सागर की बाँहों में, चाँदनी सिमट आयी है।।