Friday, December 15, 2017


नारी तो एक फूल..........

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

नारी तो एक फूल है
सौरभ बिखेरना है उसे।

          चाहे जिस रंग में खिले।
          चाहे जिस ढ़ंग में ढ़ले।
          चाहे उगे कमल सी
          चाहे पले गुलाब सी।

चाहे ले सौम्यता
बेला औ चमेली सी
चाहे ले उच्श्रृंखलता
गुलमोहर औअमलतास सी।

          चाहे निर्बल गुलमेंहदी सी
          चाहे सबल गैंदे सी
          चाहे झरे हरसिंगार सी
          चाहे सजे मालती सी।

मुस्कान बिखेरना है उसे
नारी तो एक फूल है।

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Thursday, December 14, 2017



माँझीः दो शब्द-



माँझी न खोलो इन बेड़ियों को
गर न हो हिम्मत तूफानों से लड़ने की।
मन में कोई आस नहीं, ना ही महत्वाकांक्षा कोई.

इस तट-किनारे अस्तित्व बना,
अनगिन बहारें देखी यहाँ,
तूफान भी झेले बहुत।

माँझी! जंजीर खोलने से पहले सोच लेना,
गर बेड़ियाँ खोली, तो साथ निभाना पार तक।

                                    डॉ0 मंजूश्री गर्ग





Wednesday, December 13, 2017


बिन थामे ही हाथ, हमेशा
थामे रहते हाथ हमारा।
कैसे कह दें! साथ नहीं हो,
पल-पल साथ निभाते हो।

                                     डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Tuesday, December 12, 2017


भावों के समुन्दर में लहरें जब उठती हैं
                              याद तुम्हारी आती है।
सीपी-तट पर सोई बातें
                             आकर बिखर जाती हैं।

                                        डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Saturday, December 9, 2017


उर्वशी की मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि-  उर्वशी कामाध्यात्म की कविता

उर्वशी को कामाध्यात्म की कविता कहा गया है. प्रारम्भ में धर्म इतनी ही रोक लगाता है कि विवाहित स्त्री-पुरूष किसी तीसरे से यौन समाबन्ध स्थापित न करें, किन्तु जब धर्म का निवृत्तिवादी रूप प्रकट हुआ तब कामाचार दुराचार का पर्याय बन गया तथा यह माना जाने लगा कि जब नर-नारी एक-दूसरे को जान लेते हैं तब वे ईश्वर के पास नहीं पहुँच पाते. बौद्ध धर्म, जैन धर्म और ईसाई धर्म निवृत्ति मूलक हैं. काम पर नियंत्रण करने का कार्य अत्यन्त दुरूह सिद्ध हुआ. हर युग में हर देश में धर्म और काम झगड़ते आये और इससे यह हुआ कि काम की वायु से धर्म का दीपक बुझ गया.

आधुनित युग में विज्ञान के अनुसंधानों के आलोक में काम की महिमा बढ़ी. कवि और चिंतक दर्शन के ऐसे स्रोत के पास पहुँचने लगे जो काम के तटों से होकर बहता है. फ्रॉयड से पहले भी ऐसे धार्मिक सम्प्रदाय हुये थे जो काम को त्याज्य नहीं मानते थे. सूफी मत, शाक्त मत, तन्त्रवाद और वैष्णवों का सहज क्रिया सम्प्रदाय, सभी धर्मों की धारा काम के तटों का स्पर्श करती है.

दिनकर जी की रश्मियाँ इसी समुद्र से अपना मेघजल ले आयी हैं और पश्चिम से बहकर आने वाली लॉरेंस, आदि विचारकों की नदी पर बरस सकी हैं. उर्वशी की दार्शनिक पीठिका की यही मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि है.
  
 उर्वशी में शाक्त दृष्टि-

तन्त्रवाद के अनुसार सृष्टि का उद्भव और विकास शिव और शक्ति के समागम से होता है. तान्त्रिकों की दृष्टि में जो परमशिव है वही परम-शक्ति है. दोनों स्वरूपतः अभिन्न हैं, जिनमें लिंग-भेद नहीं है. इसलिये वह अलिंग होकर भी सर्वलिंग रूप में प्रकाशित होता है. दिनकर जी के पुरूरवा इसी दार्शनिक तथ्य की स्थापना करते हुये कहते हैं-

वह निरभ्र आकाश, जहाँ की निर्विकल्प सुषमा में,
न तो पुरूष मैं पुरूष, न तुम नारी केवल नारी हो,
दोनों हैं प्रतिमान किसी एक ही मूल सत्ता के,
देह बुद्धि से परे, नहीं जो नर अथवा नारी है।


शाक्त धर्म में अपने वीर कोटि के साधकों से कहा है कि तुम इस भाव से समागम करो कि प्रत्येक पुरूष में शिव और प्रत्येक नारी में शिवा विद्यमान हैं. दिनकर जी यह मानते हैं कि चुम्बन और चिंतन एक ही सत्य के सागर में पहुँचकर रीत जाने वाली दो नदियाँ हैं. त्वचा और रूधिर की उष्णता को भोगते हुये वह ईश्वर तक पहुँच जाता है-

देवता एक है शयित कहीं इस मदिर शान्ति की छाया में,
आरोहण के सोपान लगे हैं त्वचा, रूधिर में, काया में.
परिरंभ-पाश में बँधे हुये उस अम्बर तक उठ जाओ रे!
देवता प्रेम का सोया है, चुम्बन से उसे जगाओ रे!

ल़ॉरेंस का प्रभाव-
लॉरेंस काम के जबरदस्त समर्थक थे. उनकी आवाज हस्त-मैथुन की सभ्यता के विरोध में उठायी गयी आवाज थी. लॉरेंस का कहना है कि सेक्स हमें उष्णता प्रदान करता है. दिनकर जी की उर्वशी लॉरेस की भाषा में कहती है-

वह विद्युन्मय स्पर्श तिमिर है पाकर जिसे त्वचा की,
नींद टूट जाती है रोमों में दीपक बल उठते हैं.

दिनकर ने उर्वशी महाकाव्य में,  जब से पुरूरवा और उर्वशी का मिलन हुआ है तब से पुरूरवा और औशीनरी का मिलन नहीं दिखाया है. प्रेम में शरीर, मन और आत्मा तीनों धरातल पर नर-नारी एकाकार होते हैं. औशीनरी से पुरूरवा को वह नहीं मिला था जो प्रेम देता है. इसीलिये उर्वशी को देखकर, उसे पाकर पुरूरवा सब कुछ भूल जाते हैं.

लॉरेंस ने दिमागी सेक्स की बड़ी निन्दा की है, दिनकर भी उर्वशी में सभी अनर्थों की जड़ मन को ही बताती है. उर्वशी झुंझलाकर कहती है-

तन का काम अमृत लेकिन यह मन का काम गरल है.

कहीं-कहीं उर्वशी में कवि कुछ ऐसी बातें कह गया है जो उसकी मौलिक हैं किन्तु लॉरेंस के विचारों से उसकी समता है. यह समता ही है प्रभाव नहीं. लॉरेंस ने लिखा
है कि संसार की आधी महान् कवितायें चित्र, संगीत और कहानियाँ यौन आकर्षण के कारण महान हैं. उर्वशी के आत्म-परिचय में दिनकर भी इसी सत्य का अनावरण करते हैं-

भू नभ का संगीत-नाद मेरे निस्सीम प्रणय का है
सारी कविता जयगान एक मेरी त्रिलोक विजय का है।

रूधिर सिद्धान्त-
लॉरेंस बड़ी आस्था से कहते हैं रूधिर में विश्वास ही मेरा सबसे बड़ा धर्म है. रूधिर जो अनुभव करता है, जो विश्वास करता है जो कहता है वह हमेशा सच ही होता है. दिनकर भी उतने ही विश्वास से कहते हैं-

रक्त बुद्धि से अधिक बली है और ज्ञानी भी,
क्योंकि बुद्धि सोचती और शोणित अनुभव करता है।

अन्यत्र भी कहते हैं-

पढ़ो रक्त की भाषा को, विश्वास करो इस लिपि का
यह भाषा यह लिपि मानस को कभी ना भरमायेगी।

दिनकर जी का लक्ष्य था कि मनुष्य काम के विषय में स्पष्टता और ईमानदारी से सोचें ताकि काम के धर्म का बाधक समझने का भ्रम टूट जाये.
  
उर्वशी महाकाव्य प्रेम की अतीन्द्रियता का आख्यान है, कामाध्यात्म की कविता है. यह प्रेम केवल शारीरिक मिलन ही नहीं है, यह शरीर धर्म के आगे के क्षितिज को भी छूता है.


























Friday, December 8, 2017


एक बूँदः

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

सागर से चुराकर अपना अस्तित्व
वाष्प बन रख लिया बादल रूप।

सूरज से चुराकर उसकी किरणें
इन्द्रधनुषी रंग में रंगा तन-मन।

तपती धरती को देख मन तड़पा
अश्रु लड़ी में पिर आयी धरती पर।

किन्तु सीपी में गिरी, बनी एक मोती
एक बूँद नन्हीं सी, प्यारी सी।

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Thursday, December 7, 2017


बिम्ब-विधान

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

शब्दों के माध्यम से निर्मित चित्र ही बिम्ब कहलाता है. काव्य-बिम्ब फोटो की तरह यथार्थ बिम्ब न होकर कवि की मानसिकता और भावना के अनुरूप कल्पना द्वारा निर्मित होते हैं. इसमें किसी वस्तु का आभास मात्र होता है. बिम्ब में इन्द्रियों का विशेष स्थान है, इन्द्रियों के द्वारा ही कवि किसी भाव की अनुभूति ग्रहण करता है और उस अनुभूति को कल्पना के माध्यम से शब्दों द्वारा चित्रित करता है. शब्द चित्रों की अनुभूति पाठक या श्रोता पढ़कर या सुनकर ग्रहण करते हैं, साथ ही कवि की अनुभूति से तादात्म्य स्थापित करते हैं. बिम्ब की प्रभावात्मकता उसकी ऐन्द्रियता पर ही निर्भर करती है. इंद्रियों के आधार पर ही बिम्ब के पाँच प्रसुख भेद होते है-

क.  दृश्य बिम्ब
ख.  श्रव्य बिम्ब
ग.   स्पर्श बिम्ब
घ.   घ्राण बिम्ब
ङ.    स्वाद बिम्ब

क.दृश्य बिम्ब-

दृश्य बिम्ब का सम्बन्ध नेत्रों से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर आँखों के सामने किसी घटना या वस्तु का चित्र सा उभर आता है तब वहाँ दृश्य बिम्ब होता है.
 उदाहरण-
     रश्मियों की सूक्ष्म सुइयों में रजत के तार भर,                           शशिकला ने भू-वसन पर की कढ़ाई रात में।

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने चाँदनी रात में प्रकट हुये पृथ्वी के सौन्दर्य का दृश्य उभारकर प्रक्रति के मनोरम दृश्य का दृश्य बिम्ब प्रस्तुत किया है.

ख.श्रव्य बिम्ब-

श्रव्य बिम्ब का सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वाद्य या अन्य प्रकार की ध्वनि का आभास होता है तब वहाँ श्रव्य बिम्ब होता है.
उदाहरण-

खूब झम-झम कर बरस काली घटा.

उपर्युक्त पंक्ति को पढ़कर तेजी से बरसती हुई बारिश का शोर कानों में गूँजता सा महसूस होता है. इसलिये यहाँ श्रव्य बिम्ब है.

ग.स्पर्श बिम्ब-

स्पर्श बिम्ब का सम्बन्ध त्वचा से होता है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर ऐसा आभास होता है कि किसी वस्तु की कोमलता या खुरदुरेपन ने हमें स्पर्श सा किया है, तब वहाँ काव्य में स्पर्श बिम्ब होता है.
 उदाहरण-

     जले जो रेत में तलुवे तो हमने ये देखा
     बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गये.

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने प्रखर धूप में तपी रेत से स्पर्श होते तलुवे का स्पर्श बिम्ब प्रस्तुत किया है.

घ.घ्राण बिम्ब-

घ्राण बिम्ब का सम्बन्ध घ्राणेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वस्तु की सुगन्ध या दुर्गन्ध का आभास होता है, तब वहाँ घ्राण बिम्ब होता है.
उदाहरण-

     सोंधी-सोंधी महक है मिट्टी की,
     पहली-पहली फुहार में शामिल।

उपर्युक्त पंक्तियों में गर्मी के मौसम के बाद जब वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में पहली फुहार पड़ने से जो मिट्टी से सोंधी महक उठती है, उसी का घ्राण बिम्ब प्रस्तुत किया गया है.

ङ.स्वाद बिम्ब-

स्वाद बिम्ब का सम्बन्ध स्वादेन्द्रिय से है. जब किसी काव्य को पढ़कर या सुनकर किसी वस्तु के खट्टे, मीठे, नमकीन या कसैले होने का आभास होता है, तब वहाँ स्वाद बिम्ब होता है.

उदाहरण-

     कुकुरमुत्ते की कहानी
     सुनी जब बहार से
     नबाब के मुँह में आया पानी.

उपर्युक्त पंक्तियों में कुकुरमुत्ते के स्वाद के बिम्ब को उभारा गया है, इसलिये यहाँ स्वाद बिम्ब है.