दो चाँद दिखे,
‘ब्लू मून’ कहलाये,
एक माह में।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बड़ों का साया पेड़ों जैसा।
धूप पी के देते हमें छाँव।।
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
मुठ्ठी भर धूप,
उछाल दो।
गम के बादलों पे,
गम भी मुस्कुरायेंगे।।
एक कंकरी
अनगिन लहरें
शांत झील में।
लक्ष्मी शंकर वाजपेयी
नया संघर्ष
नई ऊँचाई पे ही
जन्म है लेता।
तुम आई हो।
उजाला ही उजाला।
मन-आँगन।