हाइकु
डॉ. मंजूश्री गर्ग
पास हो प्रिया
प्रियतम का प्यार
बढ़ता सदा।
1.
दूर हो प्रिय
प्रियतमा का प्यार
बढ़ता और।
2.
शांत, निश्छल बहती हवायें,
ना दिन हैं लम्बे, ना ही रातें।
ना गर्मी के दिन, ना ही सर्दी के,
सुहाना सा मौसम है शरद का।
तुमसे मिल
जिंदगी मीठी हुई
नीम सरीखी।
मीठा जल भी
सागर में मिल के
खारा ही खारा।
सहज, निर्मल, निश्छल, बह रही प्रेम-धार।
मानों नदी के तटों-बीच, बह रही जल-धार।।
होंगी निबद्ध
सागर की बाहों में
लघु लहरें।
महके घर
धूप, चंदन सम
तेरे आने से।