जगमग सा
सारा जीवन सजे
दीवाली जैसा।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उजाला करे
चौखट का दीपक
घर-बाहर।
जले हैं खेत
फैला है प्रदूषण
शहरों तक।
आओ कान्हा!
मन धीर ना धरे
तुम्हारे बिन।
घर कंदील
बच्चे बने हैं दीप
रोशन जग।
जुड़ी है आशा
चाह फिर मन में
लेती हिलोरें।
उतरेगी ही
कलई कितनी हो
खुलेगी पोल।
करवा चौथ
चाँद के साथ देखा
अपना चाँद।
यहाँ वहाँ क्या!
फूल खिले कहीं भी
देंगे सुगंध।
मधुर तान
सुनाये बाँसुरिया
अधर बसी।
गुलमोहर बीच
खिला गुलाब।
सोना, मानुष
जितना तपता है
खरा होता है।
नाटक वही
अभिनेता बदले
राजनीति में।
चमकेगी ही
विरोधों में प्रतिभा
जैसे दीपक।
सुखदायी है
दाहिनीवर्ती शंख
देता समृद्धि।
अखंड ज्योत
रोशन जहाँ सारा
मिटा अँधेरा।
सजे कलश
छलके रंग द्वार
पावन पर्व।
सम आकार
चतुर्भुज बनायें
चार भुजायें।