Sunday, January 29, 2017



फुलौरा दौज

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

फागुन मास में शुक्ल पक्ष की दौज फुलौरा दौज कहलाती है. सारा वातावरण बसंत के रंग में सरोबार है. होली की तैय्यारी चल रही है. शहर के किसी बड़े चौक पर होलिका दहन के लिये होली की स्थापना की गयी है.सूखे लक्कड़ एकत्र किये जा रहे हैं. घर पर माँ, बहनें, भाभियाँ मिलकर बुरकले बनाने में व्यस्त हैं, ताकि होली के दिन होली की पूजा के समय बुरकलों की माला होलिका को पहना सकें. माला में पेन्डेन्ट की जगह गोबर की ही ढ़ाल बनाकर पिरो दी जाती है. लेकिन इन सबसे पहले होलिका के स्वागत के लिये फुलौरा दौज के दिन बालिकाओं की टोली हाथ में फूलों भरी टोकरी लेकर सुबह-सबेरे निकल पड़ती हैं. पहले होलिका दहन के स्थान पर फूल चढ़ाती हैं, फिर आकर अपने घर के आँगन में फूलों की पंखुरियाँ सजाती हैं. फिर आस-पास मित्र घरों में व सगे-संबंधियों के घर जा-जाकर उनके आँगन में फूलों की पंखुरियाँ सजा देती हैं. बड़े बालिकाओं को उपहार देते हैं.
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Saturday, January 28, 2017

सहेजा

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

‘सहेजा’ शब्द ‘सहेजना’ से बना है जिस का अर्थ है सँभालकर रखना. सामान्यतः ‘सहेजा’ शब्द दही के लिये प्रयोग होता है. जब हमें दूध का दही बनाना होता है तो हम उसमें थोड़ा सा दही मिला देते हैं यही थोड़ा सा दही ‘सहेजा’ कहलाता है. यदि हम दही प्रयोग करते समय थोड़ा सा दही ना बचायें तो आगे स्वय दही बनाना मुश्किल हो जायेगा. फिर हमें या तो बाजार से दही लाना होगा या किसी पड़ोसी से सहेजा लेना होगा.
दही तो एक उदाहरण है. यदि हमें किसी भी वस्तु को पुनः प्राप्त करना है तो उसे सहेज कर रखना होता है- जैसे बिना बीजों को सहेजे आगे नई पैदावर उत्पन्न करना मुश्किल है. वस्तुयें ही नहीं संबंधों को भी सहेज कर रखना होता है जो हमारे सुख-दुःख में काम आते हैं.
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Friday, January 27, 2017

गीत
डॉ0 मंजूश्री गर्ग

बसंत ऋतु है आई पिय
देखो कोयल गीत गाने लगी।

खेतों में सरसों सरसाई
बागों में बौराई अमराई
मन की बात जानो पिय
देखो चूनर लहराई।
धीरे-धीरे बात अधर पै आने लगी
देखो कोयल गीत गाने लगी।

फूलों ने खुशबूयें लुटाईं
तितली उड़ती ले अंगड़ाई
जो तुमको मदहोश कर दे पिय
ऐसी मेंहदी हमने रचाई।
धीरे-धीरे रात गहराने लगी
देखो कोयल गीत गाने लगी।

Wednesday, January 25, 2017

अखिल भारतीय कवि सम्मेलन-2017

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

राष्ट्र-पर्व-68वें गणतन्त्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन, 24 जनवरी,2017 को हिन्दी भवन, गाजियाबाद में सम्पन्न हुआ. मुख्य अतिथि श्री लाल कृष्ण आड़वाड़ी जी थे. कवि सम्मेलन के आयोजक कला परिषद् ने इस वर्ष का कवि सम्मेलन डॉ0 कुँअर बेचैन के नाम किया.1 जुलाई, 2017 को डॉ0 कुँअर बेचैन अपने जीवन के मधुर 75 वर्ष पूरे करने वाले हैं, इसीलिये यह वर्ष डॉ0 कुँअर बेचैन के सम्मान में अमृत महोत्सव वर्ष के रूप में मनाने का निश्चय किया गया है. डॉ0 कुँअर बेचैन गजल-सम्राट के नाम से जाने जाते हैं, आपने अनेक मधुर गीतों की भी रचना की है. डॉ0 कुँअर बेचैन ने सुर-संकेत नाम से एक पत्रिका प्रकाशित की थी, जिसके मुखपृष्ठ पर बनाये गये रेखाचित्र आपके द्वारा निर्मित हैं. डॉ0 कुँअर बेचैन मुख्यतः श्रृंगार रस के कवि हैं. जिनकी काव्य-यात्रा सन् 1965 ई0 में गाजियाबाद से ही शुरू हुई थी. मंच पर आसीन कवि चेतन आनन्द डॉ0 कुँअर बेचैन के ही शिष्य हैं. श्री सुरेन्द्र शर्मा, श्री रमेश शर्मा, श्री राज कौशिक, श्री सर्वेश अस्थाना, श्रीमती कीर्ति काले, श्रीमती अंजु जैन, आदि विविध कवियों और कवियत्रियों ने ओज, श्रृंगार व व्यंग्य के विविध भावों को मुक्तक, गीत, गजल, आदि के माध्यम से अभिव्यक्त कर कवि सम्मेलन की शोभा बढ़ायी.
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Monday, January 23, 2017


दीप से दीप मिले
        दीप मालायें सजें।
लहर से लहर मिले
            धारायें बहें।
मन से मन मिले
          प्रीत पले ।

             डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Sunday, January 22, 2017

कोको पाउडर(चॉकलेट पाउडर)


डॉ0 मंजूश्री गर्ग

कोको पाउडर हमें कोको बीन्स् से मिलता है. कोको बीन्स् का पेड़ सबसे पहले अमेरिका में पाया गया. आजकल अफ्रीका में सबसे ज्यादा कोको बीन्स् की खेती होती है. कोको बीन्स् के फल कटहल(jackfruit) के फल की तरह सीधे मुख्य तने या बड़ी शाखाओं में लगते हैं. फल भी आकार में काफी बड़े होते हैं. फल के अन्दर बीस से तीस बड़े आकार के कत्थई या जामुनी रंग के बीज होते हैं यही कोको बीन्स् कहलाते हैं. कोको बीन्स् के फल का बाहरी छिलका उतारकर गूदे सहित कोको बीन्स् को खमीर उठाने के लिये रख दिया जाता है. बाद में कोको बीन्स् को गूदे से अलग कर दिया जाता है. कोको बीन्स् को सुखाने के बाद पीस लिया जाता है. यही कोको पाउडर(चॉकलेट पाउडर) कहलाता है.
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Saturday, January 21, 2017





कॉफी बीन्स्

डॉ0 मंजूश्री गर्ग


कॉफी के पेड़ पर चैरी की तरह के फल लगते हैं, उसका बीज कॉफी बीन्स् कहलाता है. अधिकतर कॉफी चैरी में दो बीज होते हैं, किन्तु कुछ कॉफी चैरी में एक बीज भी होता है. कॉफी का पेड़ लगभग दस से बीस फुट तक ऊँचा होता है. कॉफी के पेड़ पर तीन-चार साल में फल आने लगते हैं.

कॉफी दो प्रकार से तैय्यार की जाती है-

1.     कॉफी चैरी को पानी में भिगोकर उनका गूदा बीन्स् से अलग किया जाता है, फिर उन बीन्स् को धूप में सुखाकर, भूनकर, पीसकर कॉफी पाउडर तैय्यार किया जाता है.

2.     कॉफी चैरी को ऐसे ही धूप में सुखाकर फिर बीन्स् को गूदे से अलग करके, भूनकर, पीसकर कॉफी पाउडर तैय्यार किया जाता है.
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