Friday, April 7, 2017


देखते ही देखते प्रखर धूप चढ़ आई
अपनी ही परछाईं नजर नहीं आई।
सोचते ही सोचते उम्र ढ़ल गई, जो
 कह ना पाई बात, वही बात बन आई।

                           डॉ0 मंजूश्री गर्ग


Thursday, April 6, 2017


मैंने कब कहा......

चाँद-तारे ला दो
ला दो हीरे-मोती।

बस खास पलों में
साथ तेरा चाहा।

अनमोल हैं वो पल
जो बीतें साथ तेरे।

               डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Wednesday, April 5, 2017


गीत
डॉ0 मंजूश्री गर्ग

बसंत ऋतु है आई पिय
देखो कोयल गीत गाने लगी।

खेतों में सरसों सरसाई
बागों में बौराई अमराई
मन की बात जानो पिय
देखो चूनर लहराई।
धीरे-धीरे बात अधर पै आने लगी
देखो कोयल गीत गाने लगी।

फूलों ने खुशबूयें लुटाईं
तितली उड़ती ले अंगड़ाई
जो तुमको मदहोश कर दे पिय
ऐसी मेंहदी हमने रचाई।
धीरे-धीरे रात गहराने लगी
देखो कोयल गीत गाने लगी।


2.

सप्तपदी भी नहीं
ना ही सात वचन
ना ही कन्यादान
फिर भी है बेला विदाई की।

साथ ना छोड़ना मेरा
नदी की भाँति
वन-प्रांतर छोड़ आयी हूँ
समा लो मुझे अपनी बाहों में।

                   ड़ॉ0 मंजूश्री गर्ग



Monday, April 3, 2017


गर्मी की छुट्टियाँ.......

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

गर्मी की छुट्टियाँ यानि घर-घर समर कैम्प............

सत्तर के दशक में कॉन्वेंट स्कूलों की बाढ़ नहीं आयी थी, सभी बच्चे हिन्दी मीडियम स्कूलों में पढ़ते थे. 20 मई को रिजल्ट आने के बाद 7-8 जुलाई तक की गर्मी की छुट्टियाँ हो जाती थीं. पुरानी किताबों से पीछा छूटता था और नयी किताबों के आने में लगभग दो महीने का समय रहता था. तब तक बिल्कुल फ्री; चाहे जो मन हो करो, जहाँ मर्जी घूमो.

कुछ दिन नानी के यहाँ जाना होता था, वहाँ पहले से मौसी आई हुई हैं उनके बच्चे हैं, मामा के बच्चे हैं. एक साथ घर में पंद्ह-बीस बच्चों का जमघट. दिनभर साथ खेलना, खाना, लड़ना-झगड़ना और फिर दोस्ती करना. कुछ नया सीखने को मिलता था औऱ कुछ दूसरों को सिखाने का मौका.

आज की तरह सत्तर के दशक में घर-घर हॉबी क्लीसिज लगनी शुरू नहीं थीं किन्तु एक-दूसरे से कुछ ना कुछ नया सीखने को मिलता ही था. स्कूलों में कागज पर ड्राइंग करते ही हैं लेकिन जब फेब्रिक कलर का पता चला तो छुट्टियों में फेब्रिक पेंटिंग का भी शौक शुरू हो गया. दादी, नानी से रात को किस्से-कहानी सुनने में भी बहुत आनंद आता था. बुआजी बम्बई से आई हैं उनसे भेलपूरी सीख कर बनाने में बहुत आनंद आया. हम अरवे-चने तो खाते ही थे उसमें नमकीन मिला, प्याज-आलू मिला, खट्टी-मीठी चटनी मिला, भेलपूरी बनाने में बहुत आनंद आने लगा.

वास्तव में तब दस महीने की पढ़ाई के बाद बच्चों को तरोताजा होने का, रूटीन पढ़ाई से छुट्टी मिलने का भरपूर मौका मिलता था, अपनी सोच, अपना शौक विकसित करने का पूरा मौका मिलता था. आज की तरह नहीं कि स्कूल बंद हुये नहीं कि बच्चों की हॉबी क्लासिज शुरू. सुबह दो घंटे डांस क्लास जाना है, शाम को पेंटिंग क्लास जाना है. बचे हुये समय में स्कूल से मिला होमवर्क करना है, उसके लिये कोचिंग क्लास जाना है. बस एक जगह से दूसरी जगह भागम-भाग..............

Sunday, April 2, 2017



ऐसा ना हो कभी........

डॉ0 मंजूश्री गर्ग


ऐसा ना हो कभी
मन्दिर में मूरत हो
भगवान ना हों.

ऐसा ना हो कभी
नदी में जल हो
लहर ना हो.

ऐसा ना हो कभी
जीवन में साँसें हों
उमंग ना हो.

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Saturday, April 1, 2017


हाइकु

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

झुक झुका के
तराजू की तरह
साधा जीवन।

'जॉकरी' सही
पल भर को सही
हँसी तो आई।

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