Monday, July 17, 2017


प्रिय का इन्तजार है............

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

प्रिय का इन्तजार है और
हम संवरने बैठे हैं।

आकाश ने बिखेरे हैं रंग औ’
हम कुंकुम लगाये बैठे हैं।

मेंहदी ने बिखेरी है खुशबू, औ’
हम मेंहदी लगाये बैठे हैं।

हवायें लाई हैं संदेशा, औ’
हम आँचल सँवारे बैठे हैं।

प्रिय का इन्तजार है, औ’
हम सँवरने बैठे हैं।

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Thursday, July 13, 2017


शून्यः

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

जिंदगी है शून्य, शून्य के समान
जहाँ कभी दुःख की आती घटायें.
जैसे शून्य में छा जाते है बादल
और कभी सुख की फूटती किरणें
कि जैसे बिखरती हैं किरणें रवि की।

जहाँ कभी फैलती रवि की लाली,
और कभी फैलती शशि की ज्योति।
जहाँ कभी फैलती रवि की प्रचंड अग्नि,
और कभी फैलती शशि की स्निग्ध शांति।

शून्य में ही मँडरा रहे सब नक्षत्र-गण
और विहार कर रहे विविध पक्षी-गण.
शून्य तो शून्य है, पर रहता न कभी शून्य
जिंदगी भी है शून्य, पर रहती न कभी शून्य।



Tuesday, July 11, 2017


जरा तो मुस्कुरा के चल,
कि चाँदनी बिखरा के चल।
बहुत अँधेरा है दिल में,
जरा उजाला कर के चल।

             डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Friday, July 7, 2017


झमाझम,
बरस रहा पानी।
भीग रही
गुड़िया रानी।
छतरी उड़े
हवा में और
भीगे हाथ
कागज की नाव।
सपने रहे
अधूरे मन
कैसे तैरे
नाव पानी में।   

      डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Thursday, July 6, 2017


जहाँ पूर्ण विकास है,
वहाँ ठहराव है।
जहाँ ठहराव है
वहाँ विकास का मार्ग अवरूद्ध है।

                                            डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Monday, July 3, 2017


‘मैं’ ही ‘मैं’ हूँ तो क्या ‘मैं’ हूँ
‘तुम’ ही ‘तुम’ हो क्या ‘तुम’ हो
‘मैं’ भी हूँ, ‘तुम’ भी हो तो ‘हम’ हैं.

                                                          डॉ0 मंजूश्री गर्ग




Sunday, July 2, 2017


दो दिल, मानों
गंगा के
दो किनारों पे
जलते
दो दिये।

एक प्रवाह
एक गति
एक आभा
एक मिलन आस
मन में लिये।


          डॉ0 मंजूश्री गर्ग