Tuesday, August 8, 2017


हिन्दी गजल-विद्रोह के स्वर
डॉ0 मंजूश्री गर्ग

हिन्दी साहित्य के आरम्भिक काल से कही जाती रही गजल-विधा का समुचित विकास हिन्दी भाषा में आधुनिक काल के अस्सी और नब्बे के दशक में हुआ है. लगभग चालीस वर्षों में अनेक सुधी हिन्दी कवियों ने हिन्दी भाषा में गजलें कही हैं और हिन्दी साहित्य में गजल विधा को एक साहित्यिक विधा के रूप में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. दशकों पुरानी हिन्दी गजल का शतकों पुरानी उर्दू गजल के समकक्ष बैठना व उर्दू गजल से तुलनात्मक अध्ययन सम्भव हो पाना अपने आप में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है.

हिन्दी गजल की उपलब्धि संख्यात्मक व गुणात्मक दोनों ही दृष्टियों से सराहनीय है. कुछ गजल संकलन तो स्वतन्त्र कवियों के हैं जैसे- पुरूषोत्तम प्रतीक का ‘घर तलाश कर’, विज्ञान व्रत का ‘बाहर धूप खड़ी है’, रामकुमार कृषक का ‘नीम की पत्तियाँ’, दुष्यंत कुमार का ‘साये में धूप’, डॉ0 कुँअर बेचैन का ‘दीवारों पर दस्तक’,
शिवओम अम्बर का ‘आराधना अग्नि की’, आदि; और कुछ गजल संकलनों में अनेक कवियों द्वारा कही गजलें संकलित हैं जैसे- ‘इसी दरमियां’, ‘गजलें ही गजलें’, ‘नवीनतम हिन्दी गजलें’, ‘गजल सप्तक’, आदि. विविध गजल संकलनों के अतिरिक्त हिन्दी की विविध पत्र-पत्रिकाओं में भी हिन्दी गजलें प्रकाशित हो रही हैं. इस प्रकार हिन्दी गजलों की संख्या लाखों से भी अधिक पहुँचती है. संख्यात्मक दृष्टि से तो हिन्दी गजल का अभूतपूर्व विकास हुआ ही है, साथ ही गुणात्मक दृष्टि से भी हिन्दी गजलों की उपलब्धि अद्वितीय है. भाव-पक्ष और शिल्प-पक्ष दोनों ही दृष्टियों से हिन्दी गजल का स्थान गजल साहित्य में महत्वपूर्ण है.

हिन्दी गजल के समुचित विकास से पूर्व अधिकांश गजलों में प्रेम प्रसंगों की अभिव्यक्ति होती थी और गजलों का भावपक्ष शराब और शबाब के रंग में डूबा हुआ होता था. हिन्दी गजलों में मानव-मन को अनुभूत करने वाली विविध(वैयक्तिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, आदि) संवेदनाओं को अभिव्यक्त किया गया है. हिन्दी गजलों में पारम्परिक गजलों से भिन्न आम आदमी के प्रेम प्रसंगों को अभिव्यक्त किया गया है. जैसे एक शेअर में शायर ने आम आदमी के रूप में जी रहे नायक की छवि अभिव्यक्त की है-

दिनभर हम मशगूल रहेंगे दुनियादारी में लेकिन
साँझ ढ़ले जब घर लौटेंगे याद तुम्हारी आएगी।
                                  राजगोपाल सिंह

मानव मन में जन्मे कुंठा, भय, संत्रास जैसे मानसिक विकारों की सफल अभिव्यक्ति हिन्दी गजलों में हुई है जैसे प्रस्तुत शेअर में शायर ने त्रासदी भरी जिंदगी जी रहे मानव की आत्म विश्लेषित अवस्था की अभिव्यक्ति की है-

जाने किसकी साजिश थी ये
मुझको मुझसे ही न मिलाया।
इक दिन मेरी खामोशी ने
मेरे भीतर शोर मचाया।
                    विज्ञान व्रत

हिन्दी गजलों में गजल-विधा के अनुरूप अप्रत्यक्ष रूप से शासन तंत्र, प्रशासन तंत्र,
पुलिस विभाग, न्याय विभाग, व्यापारी वर्ग, समाज सेवी संगठनों में व्याप्त अवसरवादिता, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार जैसी कुरीतियों पर व्यंग्य किये गये हैं. जैसे प्रस्तुत शेअर में शायर ने सिफारिश जैसी कुरीति पर व्यंग्य किया है-

नाव जर्जर, धार में है, पर किसी जलयान से
हम नहीं लाये सिफारिश पत्र कूलों के लिये।
                             चन्द्रसेन विराट

हिन्दी गजलों में समसामयिक समस्याओं जैसे- जनसंख्या बढ़ोत्तरी, विसंगत समाज, पर्यावरण प्रदूषण, आतंकवाद, आदि समस्यायों को भी सफलतापूर्वक अभिव्यक्त किया गया है. जैसे प्रस्तुत शेअर में शायर ने पर्यावरण प्रदूषण के प्रमुख कारण वनों के नष्ट होने की ओर इंगित किया है-

आपने खुद ही पुकारा है चिलकती धूप को
लोग पहले काटते थे ‘नीम’ या ‘पीपल’ कहीं।
                                  राजगोपाल सिंह

हिन्दी गजलों में भारतीय संस्कृति में व्याप्त कर्म के महत्व व मानवता के महत्व को अभिव्यक्त किया गया है, जो समस्त मानव सृष्टि के विकास के लिये परमावश्यक है. जैसे प्रस्तुत शेअर में शायर ने सच्चे कर्मयोगी के विषय में कहा है-

जिसे है चाह मंजिल तक पहुँचने की कुँअर वो ही
सदा बढ़ता रहा, खाकर भी वो ठोकर नहीं लौटा।
                                     डॉ0 कुँअर बेचैन

हिन्दी गजलों के राजनीतिक संवेदना से जुड़े वे अंश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जिनमें किसी दल या नेता का नाम लेकर नहीं वरन् अप्रत्यक्ष रूप से राजनेताओं
के भ्रष्ट आचरण व स्वार्थी राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य किये हैं. प्रस्तुत शेअर उल्लेखनीय हैं-
कहाँ तो तय था चिरागाँ हरेक घर के लिये
कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिये।
                               दुष्यंत कुमार

इस चिलकती धूप में कुछ और भी ज्यादा जले
सर पै हम ताने हुये थे, शामियाने काँच के।
                                डॉ0 कुँअऱ बेचैन

हिन्दी गजलों का शिल्प पक्ष भी भाव पक्ष की भाँति नवीनता लिये हुये हैं. एक ओर जहाँ गजल विधा के स्वरूप के अनुकूल गजल विधा की भाषा सरल, सहज, स्वाभाविक, सम्प्रेषणीय, गद्यात्मक व कोमलकांत पदावली युक्त है, वहीं गजलों में नये मुहावरों का प्रयोग, नवीन प्रतीकों का प्रयोग, सुन्दर बिम्बों की अभिव्यक्ति, नवीन उपमानों का प्रयोग, मानवीकरण अलंकार की सफल अभिव्यक्ति हिन्दी गजलों के सशक्त शिल्प पक्ष के परिचायक हैं.

हिन्दी गजलों में जिस किसी शेअर में किसी पौराणिक या ऐतिहासिक कथा को अभिव्यक्त किया गया है वह शेअर हिन्दी गजलों की संक्षिप्त कलेवर में व्यापक भावाभिव्यक्ति को दर्शाते हैं. जैसे- प्रस्तुत शेअर में शायर ने महाभारत युद्ध के पौराणिक प्रसंग को अभिव्यक्त किया है-


बीच में एक अर्जुन पशेमान था
कुछ इधर भाई थे कुछ उधर दोस्तों।
                         ज्ञान प्रकाश विवेक

हिन्दी गजलों के माध्यम से उर्दू बह्रों(बह्रे ‘मुतकारिब’, बह्रे ‘रमल’, बह्रे ‘मुतदारिक’, बह्रे ‘हजज’, आदि) का हिन्दी साहित्य में प्रवेश हुआ है, जिनका प्रयोग भविष्य में हिन्दी साहित्य की अन्य विधाओं में भी हो सकता है.

भावपक्षीय व शिल्पपक्षीय गुणों से परिपूर्ण हिन्दी गजलों ने पाठकों व श्रोताओं के ह्रदय में जो विशिष्ट स्थान बनाया है वो हिन्दी गजल की सबसे बड़ी उपलब्धि है. जबकि आम जिन्दगी से जुड़े प्रसंगों को हिन्दी साहित्य में नई कविता के पक्षधर कवि नीरसता व संप्रेषण शून्यता के साथ पाठकों व श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे, ऐसे समय में एक सरस विधा का पाठकों व श्रोताओं के बीच लोकप्रिय होना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है और यह सरस विधा हिन्दी गजल ही है.











Monday, July 31, 2017


गोपी-चंदन

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

गोपियाँ मिलीं श्रीकृष्ण से
अंतिम बार द्वारिका में।
शिकवे कह भी ना पाईं
और देह चंदन हो गयी।

                       डॉ0 मंजूश्री गर्ग

श्रीकृष्ण के मथुरा जाने के बाद गोपियाँ श्रीकृष्ण के विरह में दिन-रात लीन रहने लगीं. ना उन्हें अपनी सुध रही और ना परिवार की. दिन-प्रतिदिन कृशकाय होती गयीं. श्रीकृष्ण चाहकर भी मथुरा से वापस वृन्दावन नहीं आ पाये, वरन् परिस्तिथि वश उन्हें समुद्र में द्वारिकापुरी बसानी पड़ी. एक बार सब वृन्दावनवासी कान्हा से मिलने द्वारिकापुरी गये, वहाँ गोपियों की अति दयनीय दशा देखकर  कान्हा अश्रु-विह्वल हो गये. ना अपनी व्यथा कह पाये ना गोपियों की सुन पाये. अपनी योगमाया से श्रीकृष्ण ने गोपियों को वहीं द्वारिका की मिट्टी में समाहित कर दिया. वहाँ की मिट्टी चंदन की तरह महकने लगी. आज भी द्वारिका में गोपी-चंदन मिलता है, जिसे भक्तगण प्रसाद के रूप में अपने साथ लाते हैं.



Friday, July 28, 2017



सूरदास का वात्सल्य वर्णन

डॉ0 मंजूश्री गर्ग


सूरदास भक्तिकाल के कृष्ण काव्य-धारा के प्रतिनिधि कवि हैं. भगवान कृष्ण की लीलाओं का गायन करना ही उनका प्रमुख उद्देश्य था. कृष्ण की बाल क्रीड़ाओं और मातृ-भावना को लेकर सूरदास ने जो मनोहारी और प्रभावशाली वर्णन किया है, वह अद्वितीय है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूरदास की प्रशंसा करते हुये लिखा है,  कृष्ण जन्म की आनन्द-बधाई के उपरान्त ही बाल-लीला प्रारम्भ हो जाती है. जितने विस्तृत और विशुद्ध रूप में बाल्य जीवन का चित्रण इन्होंने किया है उतने विस्तृत रूप में और किसी कवि ने नहीं किया. शैशव से लेकर कौमार अवस्था तक के क्रम से लगे हुये न जाने कितने चित्र मौजूद हैं. उनमें केवल बाहरी रूपों और चेष्टाओं का ही विस्तृत और सूक्ष्म वर्णन नहीं है, कवि ने बालकों की अन्तःप्रकृति में भी पूरा प्रवेश किया है और अनेक बाल्यभावों की सुन्दर स्वाभाविक व्यंजना की है. आचार्य शुक्ल ने अन्यत्र भी लिखा है सूरदास वात्सल्य का कोना-कोना झाँक आये हैं.

कृष्ण जन्म का समाचार सुनते ही ब्रज की गलियों में अपार आनन्द का समुद्र उमड़ पड़ता है जिसकी अभिव्यक्ति सूरदास ने एक ग्वालिन के मुख से की है------

सोभा सिंधु न अंत रही री।
नंद भवन भरि-पूरि उँमगि चलि ब्रज की बीथिन फिरति बही री।
देखी जाइ गोकुल मैं घर-घर बेचति फिरति दही री।
कहँ लगि कहौं बनाई बहुत विधि कहत न मुख सहसहु निबही री।
जसुमति उदर अगाध उदधि तें उपजीं ऐसी सबनि कही री।
सुर स्याम प्रभु इन्द्र नीलमनि ब्रज वनिता उर लाइ गही री।

यशोदा की गोद में विराजमान कृष्ण की छवि की सुन्दर अभिव्यक्ति प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने की है-------

गोद लिए जसुदा नन्दनंदहिं
पीत झहुलिया की छवि छाजति बिज्जुलता सोहति मनु कंदहिं।

इसी प्रकार यशोदा द्वारा कृष्ण को पालने में सुलाने का कितना स्वाभाविक, मार्मिक चित्र प्रस्तुत गीत में कवि ने अभिव्यक्त किया है-----------

यशोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै।
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै ना आनि सुवावै।
तू काहै न बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।
कबहुँ पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन है करहिँ, करि-करि सैन बतावै।
इति अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुर गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ, सो नंदभामिनी पावै।

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने यशोदा के माध्यम से भारतीय नारी का ही चित्र उकेरा है जो पालने में अपने लाल को सुला रही है, सोया जानकर आँखों के इशारे से सबको चुप रहने को कहती है. वहाँ से हटकर घर के और काम करना ही चाहती है कि बालक अकुलाकर उठ जाता है.

यशोदा श्रीकृष्ण को अँगुली पकड़कर चलना सिखाती हैं और श्रीकृष्ण बाल-सुलभ प्रवृत्ति के कारण डगमगाते कदमों से आगे बढ़ते हैं----------

सिखवत चलन जसोदा मैया।
अरबराइ कर पानि गहावत डगमगाइ धरैं पैंया।

माता की आवाज सुनकर, दौड़कर कृष्ण के आने का और यशोदा के गोद में लेने का चित्र प्रस्तुत गीत में अभिव्यक्त किया है-------

नंदधाम खेलत हरि डोलत।
जसुमति करति रसोई भीतर आपुन किलकत बोलत। 
टेरि उठी जसुमति मोहन कौ आबहु काहै न धाइ।
बैज सुनत माता पहिचानि चले घुटरूवनि पाइ।
लै उठाइ अंचल गहि पोंछे धूरि भरी सब देह।
सूरज प्रभु जसुमति रज झारति कहाँ भरि यह खेह।

यशोदा द्वारा स्नान करने को कहने पर कन्हैया किस तरह मचलते हैं, यह चित्र प्रस्तुत गीत में अभिव्यक्त हुआ है------

जसोदा जबहिं कह्यौ अन्हवावन रोइ गए हरि लोटत री।
तेल उबटनौ लै आगे धरि लालहिं चोटत पोटत री।
मैं बलि जाऊँ न्हाउ जनि मोहन कत रोवत बिनु काजै री।
पाछै धरि राख्यौ छपाइ कै उबटन तेल समाजै री।
महरि बहुत विनती करि राखति मानत नहीं कन्हैया री।
सूर स्याम अति ही बिरूझाने सुर मुनि अंत न पैया री।

प्रायः बच्चे पिता के साथ भोजन करते हैं, तुलसीदास के राम भी दशरथ के साथ भोजन करते हैं. श्रीकृष्ण भी नन्दबाबा के साथ भोजन कर रहे हैं, भोजन करते समय बाल सुलभ चपलता का वर्णन प्रस्तुत पद में कवि ने किया है----
  
जैवत कान्ह नंद इक ठौरे।
कछुक खात लपटात दोऊ कर बाल केलि अति भोरे।
बरा कौर मेलत मुख भीतर मिरिच दसन टकटौरे।
तीछन लगी नैन भरि आए रोवत बाहर दौरे।
फूँकति बदन रोहिनी ठाढ़ी लिए लगाइ अँकोरे।
सूर स्याम की मधुर कौर दे कीन्हे तात निहोरे।

माता यशोदा श्रीकृष्ण को दूध पिलाने के लिये लालच देती हैं कि दूध पीने से चोटी जल्दी बड़ी हो जायेगी, इसीलिये दूध पीते समय श्रीकृष्ण उत्सुकतावश अपनी चोटी देखते जाते हैं कि चोटी बढ़ रही है या नहीं---------

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी।
किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहुँ है छोटी।

श्रीकृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है, श्रीकृष्ण द्वारा माखन चोरी और मणि रचित खम्भे में अपने ही प्रतिबिंब से किये वार्तालाप का वर्णन प्रस्तुत गीत में कवि ने अभिव्यक्त किया है------------

आजु सखि मनि खंभ निकट हरि जंह गोरस को गोरी।
निज प्रतिबिंब सिखावत ज्यों सिसु, प्रगट करैं जनि चोरी। 
अरध भाग आजु तैं हम तुम भली बनी है जोरी।
माखन खाहु, कतहि डारत हौ छाँड़ि देहु मति भोरी।
बाँट न लेहु सबै चाहत हौ यहै बात है थोरी।

बालक कृष्ण द्वारा चन्द्रमा को देखकर उसे प्राप्त करने के लिये मचल उठने का और हठ करने का मनोरम वर्णन कवि ने प्रस्तुत पंक्तियों में किया है------

मैया मैं तो चन्द खिलौना लैहौं।
जैहों लोटि धरनि मैं अबहिं तेरी गोद न ऐहौं।
सुरभि का पयपान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं।
ह्वै हौ पूत नन्दबाबा को तैरो सुत न कहैहौं।

आँख-मिचौनी के खेल में किस प्रकार माता यशोदा श्रीकृष्ण का पक्ष लेती हैं और किस प्रकार श्रीकृष्ण अपने निर्णय पर अडिग हैं कि श्रीदामा को ही चोर बनाना है. साथ ही पुत्र के जीतने पर माता यशोदा की ह्रदयग्राही खुशी का वर्णन प्रस्तुत गीत में कवि ने किया है--------

हरि तब अपनी आँख मुँदाई।
सखा सहित बलराम छुपाने जहँ तहँ गई भगाई। 
कान लागि कह्यौ जननि य़शोदा वा घर में बलराम।
बलराम को आवन दैहों श्रीदामा सौं काम
दौरि-दौरि बालक सब आवत छुवत महरि कौ गात।
सब आए रहे सुबल श्रीदामा हारे अब कैं तात।
सोर पारि हरि सुबलहिं धाए गहयौ श्रीदामा जाइ।
दै दै सौंह नंदबाबा की, जननी पै लै आइ।
हँसि-हँसि तारी देत सखा सब भए श्रीदामा चोर।
सूरदास हँसि कहतिं जसोदा जीत्यौ है सुत मोर।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उचित ही लिखा है-
यशोदा के बहाने सूर ने मातृ ह्रदय  का ऐसा स्वाभाविक, सरल और ह्रदयग्राही चित्र खींचा है कि आश्चर्य होता है।

कृष्ण बड़े हो गये हैं बाहर सखाओं के साथ खेलना ही शुरू नहीं कर दिया वरन् श्रीकृष्ण के मन में गाय दुहने की उत्सुकता भी पैदा हो गयी है. इसीलिये ग्वालिनी के संग बैठकर गाय का दुहना देखते हैं और कहते हैं-----------

धेनु दुहत हरि देखत ग्वालिनी।
आपुन बैठ गए तिनके संग सिखवहु मोहि कहत गोपालनि।

और फिर एक दिन गाय चराने को मचलने लगते हैं------------

मैया हौं गाय चरावन जैहौं।
तू कहत महरि नन्दाबाबा सौं बड़ो भयो न डरैहौं।

सूरदास रचित काव्य में राधा और कृष्ण के बीच प्रेम का विकास शनैः शनैः स्वाभाविक ढ़ंग से हुआ है जो शैशवोचित चपलता से प्रारम्भ होता है और धीरे-धीरे अनुराग बढ़ता जाता है--------

श्याम का राधा से पूछना-

बूझत श्याम, कौन तू गौरी।
कहाँ रहत, काकी तू बेटी, देखी नाहिं कहूँ ब्रज खोरी।

और राधा का उत्तर देना-

काहे को हम ब्रज तन आवति, खेलत रहत आपनि पौरी।
सुनति रहति श्रवनन नंद ढोता करत रहत माखन दधि चोरी।

-बालसुलभ वार्तालाप का ही उदाहरण है.
ऐसे ही प्रस्तुत उदाहरण में आपसी नोंक-झोंक का वर्णन कवि ने किया है------

श्रीकृष्ण का गाय दुहना-
धेनु दुहत अति ही रति बाढ़ी।
एक धार दोहनि पहुँचावत, एक धार जहँ प्यारी ठाढ़ी।

और इस पर राधा का उत्तर-

तुम पै कौन दुहावै गैया।
इत चितवत उत धार चलावत, एहि सिखयो है मैया।

जिस रागात्मकता के साथ सूरदासजी ने श्रीकृष्ण के बाल-जीवन की विविध लीलाओं को अभिव्यक्त किया है उसी प्रकार श्रीकृष्ण और बलराम के मथुरा गमन पर वात्सल्य- वियोग का वर्णन भी किया है. सूरदास द्वारा वर्णित प्रवासजन्य विरह का चित्रण उभयपक्षीय है. कृष्ण के मथुरा गमन से नन्द-यशोदा, गोप-गोपियाँ, राधारानी ही दुःखी नहीं है, वरन् कृष्ण भी मथुरा में अनन्त वैभव-विलास में रहते हुये भी माता यशोदा व ब्रज-वासियों को नहीं भुला पाते. श्रीकृष्ण तभी तो नन्द के ह्रदय को कठोर बताते हुये कहते हैं----------

कहियो नन्द कठोर भये।
हम दोउ वीरैं डारि परघरैं मानों थाति सौंपि गए।

ऐसे ही माता यशोदा की याद करते हुये श्रीकृष्ण कहते हैं----- 

जा दिन ते हम तुम तें बिछुरे काहु न कह्यौ कन्हैया।
कबहुँ प्रात न कियो कलेवा साँझ न पीनी छैया।

कान्हा की याद में माता यशोदा का ह्रदय भी व्यथित हो रहा है--------

जद्यपि मन समुझावत लोग।
शूल होत नवनीत देखिकै मोहन के मुख जोग।

और माता यशोदा पथिकों के हाथ संदेश भेजती हैं-----

संदेशो देवकी सौ कह्यो।
हौं तो धाय तिहारे सुत की कृपा करत ही रहियौ।

वास्तव में सूरदासजी ने श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं और मातृभावना को लेकर जिस रागात्मकता के साथ वात्सल्य रस की धारा प्रवाहित की है, उससे वात्सल्य भाव को रसों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ है.













Wednesday, July 26, 2017


नजर में सज के नगीना बन गये
गिर गये तो कहलायेंगे पत्थर।

                       डॉ0 मंजूश्री गर्ग


Sunday, July 23, 2017



गोल मिर्च
डॉ0 मंजूश्री गर्ग



गोल मिर्च सिर्फ काली मिर्च नहीं होती, जिसे हम गरम मसाले में प्रयोग करते हैं. गुलाबी मिर्च भी गोल होती है और काली मिर्च को भी अलग-अलग तरीकों से तोड़कर व सुखाकर अलग-अलग रंग(सफेद, हरी व काली) की तैय्यार की जाती हैं.
जैसे-

काली मिर्च-
अधपकी अवस्था में तोड़ी जाती है और काला रंग होने तक धूप में सुखाया जाता है.

हरी मिर्च-
कच्ची अवस्था में ही तोड़ ली जाती है और धूप में सुखाया जाता है.

सफेद मिर्च-
पकने के बाद ही तोड़ा जाता है, नमकीन पानी में भिगोया जाता है, ताकि छिलका हट जाये. सफेद मिर्च को दक्खिनी मिर्च भी कहते हैं, यह आँखों के लिये बहुत लाभकारी होती है.

गुलाबी मिर्च-
गुलाबी मिर्च सरसों की प्रजाति से जुड़ी होती है, पकने के बाद तोड़ी जाती है और धूप में सुखाई जाती है.


‘मैं’ कुम्हार के चाक चढ़ी
फिर आग में तपी
तब छोटा दीप बनी।
अब सदा जलना है
करने रोशन जहाँ सारा।

                डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Tuesday, July 18, 2017



साँझ का मन उदास है प्रिये!
कोई गीत गुनगुनाओ
चाँद आता ही होगा गगन में
जड़ रहा होगा सितारे चुनरी में.

                          डॉ0 मंजूश्री गर्ग