Friday, April 13, 2018


मत आँख मिलाओ मुझसे, प्रखर धूप में जल जाओगे।
मैं  सूरज हूँ  भोर का, साँझ  का  नहीँ।।


डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Wednesday, April 11, 2018



आजकल प्रकृति के मनोरम दृश्यों को निहारने का किसी के पास समय ही नहीं है, इसी सामाजिक संवेदना की अभिव्यक्ति कवि ने प्रस्तुत पंक्तियों में की है-

इस सोते संसार बीच,
जग कर, सज कर रजनी बाले।
कहाँ बेचने ले जाती हो,
ये गजरे तारों वाले?
मोल करेगा कौन,
सो रही उत्सुक आँखें सारी।
मत कुम्हलाने दो,
सूनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी।
निर्झर के निर्मल जल में,
ये गजरे हिला-हिला धोना।
लहर हहर कर यदि चूमे तो,
किंचित् विचलित मत होना।
होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित,
लहरों में ही लहराना।
लो मेरे तारों के गजरे
निर्झर स्वर में यह गाना।
यदि प्रभात तक कोई आकर,
तुम से हाय! न मोल करे।
तो फूलों पर ओस-रूप में
बिखरा देना सब गजरे।
          रामकुमार वर्मा


Monday, April 9, 2018


मेरा तन एक मन्दिर है,
जिसमें एक परकोटा दिल है,
जिसमें  तुम  रहती हो।
तुम्हारी स्वर्णिम आभा से,
आलोकित है जीवन अपना।
साँस भी लेता हूँ तो धीरे से,
कहीं ठेस तुम्हें न लग जाये।


                         डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Sunday, April 8, 2018



आये तुम कौन राजकुमार.........

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

परियों के देश से
आये तुम कौन राजकुमार?

सूने जीवन में
मधुमय बसंत का
पीत गुलाब देने
आये तुम कौन राजकुमार?

हेमंत ऋतु में
सोये थे जो बीज
अंकुर बन जग रहे बसंत में

सोये थे जो अरमान मन में
फिर से जगाने
आये तुम कौन राजकुमार?


-------------------
-------- 



Wednesday, April 4, 2018



प्रायः बच्चे अज्ञानवश ऐसी वस्तु की जिद कर बैठते हैं जिनका पूरा करना माँ-बाप के लिए असम्भव-सा हो जाता है. इसी संवेदना की अभिव्यक्ति कवि ने, श्रीकृष्ण के चंदा को खिलौने के रूप में चाह करने पर जसोदा मैया किस तरह उन्हें मनाती हैं,  प्रस्तुत पंक्तियों में की है-
कहति जसोदा कौन विधि, समझाऊँ अब कान्ह।
भूलि दिखायो चंद मैं, ताहि कहत हरि खान।
यहै देत नित माखन मोको। छिन छिन देति तात सो तोको
जो श्याम तुम चंद को खैहो। बहुरो फिर माखन कह पैहो?
देखत रहौ खिलौना चंदा। हठ नहिं कीजै बाल गोविंदा
पा लागौ हठ अधिक न कीजै। मैं बलि, रिसहि रिसहि तन छीजै।
जसुमति कहति कहा धौं कीजै। माँगत चंद कहाँ ते दीजै।
तब जसुमति इक जलपुट लीनो। कर मैं लै तेहि ऊँचों कीनो
ऐसे कहि स्यामै बहरावै। आव चंद, तोहि लाल बुलावै
हाथ लिए तेहि खेलत रहिए। नैकु नहीं धारनी पै धारिए।

                             ब्रजवासी दास

Tuesday, April 3, 2018


स्नेहिल स्पर्श पा श्री राम का,
जड़ अहिल्या बनी फिर नारी।

अधरों की छुअन पा श्री कृष्ण की,
जड़ बाँसुरी बजी सप्तम स्वर में।

प्यार की छुअन जब-जब मिली,
नाच उठा मन-मयूर वन में।

                                   डॉ0 मंजूश्री गर्ग

Sunday, April 1, 2018



नटराज(शिव) की प्रतिमा



डॉ0 मंजूश्री गर्ग

शिव कल्याण के देवता हैं इसीलिये अमृतमंथन के समय समुद्र से निकले विष को शिव ने स्वयं पान कर देवता और दानवों को अभय दान दिया। शिव स्वयं विषपायी कहलाये पर विष को कंठ से नीचे नहीं जाने दिया. इसी से शिव नीलकंठ कहलाये।

सृष्टि के दो पक्ष हैं सृजन और विनाश। जब प्रलय के बाद नव सृष्टि की रचना करनी होती है तो शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ मिलकर लास्य नृत्य करते हैं और जब संसार में पापाचार, अत्याचार अधिक बढ़ जाते हैं तो शिव सृष्टि के विनाश के लिये क्रुद्ध होकर तांडव नृत्य करते हैं।

नटराज की प्रतिमा में शिव के नृत्य के दोनों भावों अर्थात् लास्य नृत्य और तांडव नृत्य को दर्शाया गया है। नटराज की प्रतिमा में शिव के चार हाथ दर्शाये गये हैं- प्रथम दाहिने हाथ में डमरू है- जो नाद का प्रतीक है- सभी भाषाओं, व्याकरण, कलाओं और साहित्य का मूल स्रोत है। प्रथम बायें हाथ में अग्नि-शिखा है जो बुराई का विनाश करने की प्रतीक है। दूसरा दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है जो सतपथ पर चलने वाले मानवों को रक्षा का भरोसा देता है। दूसरा बाँया हाथ नृत्य की मुद्रा में स्वतंत्र रूप से ऊपर उठे पैर की ओर इशारा करता है। नृत्य की मुद्रा में दाहिना पैर एक राक्षस को दबाये है और बाँया पैर स्वतंत्र रूप से ऊपर उठा हुआ है।