हिन्दी साहित्य
Tuesday, May 14, 2019
आज
और कल में समय निकलता जा रहा।
मानों मुठ्ठी से रेत फिसलता जा रहा।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
Monday, May 13, 2019
पूछा जो उनसे चाँद निकलता है किस तरह
जुल्पों को रूख पे डाल के झटका दिया कि यूँ।
आरजू लखनवी
Sunday, May 12, 2019
पलकों की ओट में वो छुपा ले गया मुझे
यानी नजर नजर से बचा ले गया मुझे।
कृष्ण बिहारी नूर
बिगड़ी बात बनै नहीं,
लाख करे किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय।।
रहीमदास
Friday, May 10, 2019
यादों के समन्दर में, यादों की नावें,
यादों की नावों में, यादें सवार,
दूर क्षितिज तक, नजरें पहुँचें जहाँ तक,
दिखती हैं यादें ही यादें हर तरफ.
डॉ. मंजूश्री गर्ग
Thursday, May 9, 2019
अनजानी डगरों पर भटकते हैं तो राह दिखा देती हैं.
अँधेरी राहों में लड़खड़ाते हैं तो सँभाल लेती हैं.
दुआएँ मेरे साथ हैं उजालों की तरह,
साया सा बनकर रहती हैं साथ-साथ मेरे.
डॉ. मंजूश्री गर्ग
Wednesday, May 8, 2019
जानती न थी मुझे जैसे दीवारें
मुझको मेरा घर मिला यूं बेरूखी से।
-गुलशन मदान
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