जादुई खेल
चमत्कार हाथों का
धोखा आँखों को।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
उत्सव वाले दिन कहाँ?
दो-चार फूलों के खिलने से
उपवन नहीं सजा करते।
दो-चार दीपक के जलने से
दीपावली नहीं सजतीं।
दो-चार बूँदों के गिरने से
बरसात नहीं होती।
दो-चार जन के सजने से
उत्सव नहीं मना करते।
कोमल तंतु
मुड़ जायेंगे, पर
टूटेंगे नहीं।
बूँद ‘मैं’, समुद्र ‘तुम’
कण ‘मैं’, पर्वत ‘तुम’
पाँखुरी ‘मैं’, फूल ‘तुम’
‘अंश’ तुम्हारा ही हूँ प्रभु ‘मैं’।
सोना, मानुष
जितना तपता है
खरा होता है।
मय पी के जो गिरता है तो लेते हैं उसे थाम
नजरों से गिरा जो उसे फिर किसने सँभाला।।
नजीर अकबराबादी
सूना पटल
चितेरा है बादल
रचे भवन।