हजार दीप
जगमगाये मन
बँधी है आस।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
बिन कहे बहुत कहा तुमसे।
दिल का हाल छुपाया हमने
मौन रहे कुछ भी ना कहा.
महफिल में भी रहे, तो
मुस्कान, गहने सी रहे पहने.
फिर भी, नयनों की उदासी ने
जब हम हुते तवै तुम्ह नांही, अब तुम्ह हौं मैं नांही।
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कहै रैदास भगति एक उपजी, सहजै होइ स होइ।
रैदास
उखड़ेंगे ना
दूब से जुड़े हुये
हम धरा से।
जीतने के लिये ही नहीं, हारने के लिये भी साथी चाहिये और ऐसा साथी जिससे हारने पर भी आनन्द की अनुभूति हो।
डॉ.मंजूश्री गर्ग
सुबह हुई तो,
रात के
मधुर सपने
चुरा ले गयी।
कुछ लालिमा
आकाश तले,
कुछ मधुरता
फूलों पे
बिखरा गयी।
समय की दहलीज पर जला दो आज चिराग।
रोशन होंगी आने वाली राह अँधेरी।।