Wednesday, September 7, 2022

 

रानी पद्मिनी

डॉ. मंजूश्री गर्ग

रानी पद्मिनी सिंघल द्वीप(श्रीलंका) की राजकुमारी व चित्तौड़ के राजा रतनसेन की पत्नी थी. रानी पद्मिनी अत्यंत सुंदर, वीर व बुद्धिमान थी. दूर-दूर तक रानी पद्मिनी के रूप-गुण की चर्चायें हुआ करती थीं. जब आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी ने रानी पद्मिनी के बारे में सुना, तो उसके मन में रानी पद्मिनी से मिलने की तीव्र अभिलाषा जाग्रत हुई, उसने राजा रतनसेन के पास प्रस्ताव रखा कि वह आपको भाई मानता है और एक  बार रानी पद्मिनी से मिलना चाहता है. जब राजा रतनसेन ने अलाउद्दीन खिलजी का प्रस्ताव रानी पद्मिनी से कहा तो वह सुल्तान  अलाउद्दीन खिलजी की कुटिल चाल समझ गयी. उसने कहा, “अलाउद्दीन खिलजी केवल मेरा प्रतिबिम्ब शीशे में देख सकता है.”

     अलाउद्दीन खिलजी अपने सीमित सैनिकों के साथ चित्तौड़ गया और वहाँ रानी पद्मिनी के अपूर्व सौंदर्य को आईने में देखकर ही इतना मोहित हो गया कि उसको पाने के लिये बेचैन हो गया. धोखे से राजा रतनसेन को बंदी बनाकर अपने खेमे(कैम्प) में ले आया और रानी पद्मिनी को संदेश भिजवाया कि यदि अपने पति राजा रतनसेन को जीवित देखना चाहती हो तो स्वंय खेमे में आकर अपने आप को समर्पित करें. पद्मिनी ने बुद्धिमानी से काम लेते हुये दूसरे दिन एक सौ पचास पालकियाँ तैय्यार कराईं. उनमें अपनी सखी व नौकरानियों की जगह नारी वेश में चित्तौड़ के जाबांज सिपाहियों को लेकर अलाउद्दीन खिलजी के खेमे में गयीं और राजा रतनसेन को आजाद कराकर चित्तौड़ वापस आ गयी.

 

1.

 

 

तब अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के किले पर सीधे आक्रमण बोल दिया. राजा रतनसेन अपने सिपाहियों के साथ किले के अंदर से ही वीरता के साथ अलाउद्दीन खिलजी और उसकी सेना का सामना करते रहे. धीरे-धीरे चित्तौड़ की सेना कम होती जा रही थी. दूसरे अलाउद्दीन खिलजी ने वह मार्ग भी बंद कर दिया था जिससे रसद किले में पहुँचाई जा रही थी. किले के अंदर का सामान धीरे-धीरे कम होता गया. तब राजा रतनसेन और उसकी सेना ने केसरिया पगड़ी बाँध कर, किले के द्वार खोलकर सीधे अलाउद्दीन खिलजी की सेना से युद्ध किया और किले के अंदर रानी पद्मिनी के साथ सभी नारियों ने संपूर्ण श्रंगार कर सामूहिक रूप से अग्नि प्रज्वलित कर अपने आपको अग्नि में समर्पित कर जौहरकिया. जब चित्तौड़ की सेना पर विजय प्राप्त कर अलाउद्दीन खिलजी व उसकी सेना ने किले में प्रवेश किया तो उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ. मानों जीत के भी हार गये हों.

 ------------------------------------------------------------------------------------------


 


Tuesday, September 6, 2022


आ जाओ कान्हा! सूनी हैं

वृन्दावन की गलियाँ सारी।

सूने हैं तट यमुना के,

सूनी कदंब की छाँव है ।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

Monday, September 5, 2022


प्रीत की रूनझुन सी पायल बँधी जिंदगी से।

मुस्कुराने लगी सुबह, गुनगुनाने लगी रात।।


                    डॉ. मंजूश्री गर्ग

  

Sunday, September 4, 2022


चाहतों की धूप औ' मुस्कानों की चाँदनी।

ख्वावों की नाव जाती इस पार से उस पार।। 


                     डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, September 3, 2022


हवा हमेशा हमारे अनुकूल नहीं होती,

कभी हवा के साथ, कभी विपरीत दिशा में

चलानी होती है नाव जिंदगी की।


                        डॉ. मंजूश्री गर्ग


 

Friday, September 2, 2022

 

दर्शन क्या है? मेरा दृष्टिकोण


डॉ. मंजूश्री गर्ग


दर्शन से अभिप्राय है दृष्टिकोण। हर व्यक्ति की चिंतन धारा अलग होती है, जीव और जगत को जानने और समझने की राह अलग होती है। सूझ्म से भी अति सूझ्म ईश्वरीय सत्ता को पाने का साधन अलग होता है।


ज्ञानमार्गी ज्ञान के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, उनके अनुसार आत्मा और परमात्मा एक ही तत्व के दो रूप हैं जैसे- नदी के जल और उससे भरे घड़े के जल में कोई फर्क नहीं होता।


भक्तिमार्गी भक्ति के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, उनके अनुसार जो कुछ है वो ईश्वर है। चाहे वो कृष्ण रूप मे हो या राम रूप में या किसी अन्य रूप में।


प्रकृतिवादी प्रकृति के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, उनके अनुसार चर-अचर, प्रकृति के कण-कण में ईश्वर व्याप्त हैं। ईश्वर को पाना है तो उसकी बनायी सृष्टि के कण-कण से प्रेम करो।





Thursday, September 1, 2022


संघर्षमय जीवन

 डॉ. मंजूश्री गर्ग

संघर्षों की गाथा पूछो,

नदी की मीठी धारा से।

पग-पग पे सहती आयी,

चट्टानों की चोटें।

 

संघर्षों की गाथा पूछो,

मुस्काती कली से।

पली, बढ़ी, खिली,

काँटों भरी डाली संग।

 

संघर्षों की गाथा पूछो,

देदीप्यमान दीप से।

अड़िग अस्तित्व बनाये,

लड़ रहा अंधकार से।

 

अमृतम, सुगंधमय,

ज्ञानमय बनना है तो

नदी, कली, दीप सा

जीवन जीना सीखो।

 -----------