Wednesday, September 14, 2022

 

14 सितंबर, 2022 हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें


संस्कृत की एक लाड़ली बेटी है ये हिन्दी।

बहनों को साथ लेकर चलती है ये हिन्दी।

सुंदर है, मनोरम है, मीठी है, सरल है,

ओजस्विनी है और अनूठी है ये हिन्दी।

पाथेय है, प्रवास में, परिचय का सूत्र है,

मैत्री को जोड़ने की सांकल है ये हिन्दी।

पढ़ने व पढ़ाने में सहज है, ये सुगम है,

साहित्य का असीम सागर है ये हिन्दी।

तुलसी, कबीर, मीरा ने इसमें ही लिखा है।

कवि सूर के सागर की गागर है ये हिन्दी।

वागेश्वरी का माथे पर वरदहस्त है,

निश्चय ही वंदनीय माँ-सम है ये हिन्दी।

अंग्रेजी से भी इसका कोई बैर नहीं है,

उसको भी अपनेपन से लुभाती है ये हिन्दी।

यूं तो देश में कई भाषायें और हैं,

राष्ट्र के माथे की बिंदी है ये हिन्दी।

-------------




Tuesday, September 13, 2022

 

हर रिश्ते को थोड़ी परवरिश चाहिये,

थोड़ी धूप, थोड़ी छाँव चाहिये।

स्नेह का जल, प्यार के छींटे चाहिये,

अपनेपन की थोड़ी हवा चाहिये।।

  

             डॉ. मंजूश्री गर्ग


Monday, September 12, 2022

 

सहेजा

डॉ. मंजूश्री गर्ग

सहेजा शब्द सहेजना से बना है जिस का अर्थ है सँभालकर रखना. सामान्यतः सहेजा शब्द दही के लिये प्रयोग होता है. जब हमें दूध का दही बनाना होता है तो हम उसमें थोड़ा सा दही मिला देते हैं यही थोड़ा सा दही सहेजा कहलाता है. यदि हम दही प्रयोग करते समय थोड़ा सा दही ना बचायें तो आगे स्वयं दही बनाना मुश्किल हो जायेगा. फिर हमें या तो बाजार से दही लाना होगा या किसी पड़ोसी से सहेजा लेना होगा.

दही तो एक उदाहरण है. यदि हमें किसी भी वस्तु को पुनः प्राप्त करना है तो उसे सहेज कर रखना होता है- जैसे बिना बीजों को सहेजे आगे नई पैदावर उत्पन्न करना मुश्किल है. वस्तुयें ही नहीं; संबंधों को भी सहेज कर रखना होता है जो हमारे सुख-दुःख में काम आते हैं.-------------------------------------------------------------------


Sunday, September 11, 2022


 

मंजिल पानी है गर

अवरोधों से डरना कैसा!

कौन है? जिसने ताप सहा नहीं

सूरज जैसा चमका जो भी।।


      डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

Saturday, September 10, 2022


                                                          भीग गये आज तन-मन के छोर सारे।

भीगे हैं आज खुली बारिश की बाहों में।।


          डॉ. मंजूश्री गर्ग

Thursday, September 8, 2022

 


9 सितंबर, 2022 भारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी की जयंती पर शत्-शत् नमन


नये जमाने की मुकरी


सीटी देकर पास बुलावै।

रूपया ले तो निकट बिठावै।

ले भागे मोहिं खेलहिं खेल।

क्यों सखि सज्जन नहिं सखि रेल।।1।।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र




सुंदर बानी कहि समुझावै।

विधवागन सो नेह बढ़ावै।

दयानिधान परम गुन-आगर।

क्यों सखि सज्जन नहिं विद्यासागर।।2।।


भारतेन्दु हरिश्चन्द्र



भीड़ में रहकर भी हम अकेले ही रहे।

क्योंकि तन्हाई में तुम साथ-साथ रहे।।


                डॉ. मंजूश्री गर्ग