डायनासोर
डायनासोर से
कंक्रीट के जंगल
धीरे-धीरे खाने लगे
नदी से रेत
पर्वत से पत्थर
वन से लकड़ी
खानों से लोहा।
धीरे-धीरे धरती पे
बढ़ने लगा प्रकृति का कोप
आने लगीं बाढ़ें
होने लगे झंझावात
भूकंप, सुनामी
रोज की सी बातें।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नजर उठीं
नजर उठीं,
उठकर लड़ी,
लड़कर झुकीं,
झुककर खिली।
तुम भँवरा बने,
हम फूल बने,
तुम गूँजे,
फिर उड़े,
हम खिले,
फिर बुझे।
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कविता बिना भाव,
व्यंग्य बिना धार,
गीत बिना लय,
शोभा नहीं देते।।
हर रिश्ते को थोड़ी परवरिश चाहिये,
थोड़ी धूप, थोड़ी छाँव चाहिये।
स्नेह का जल, प्यार के छींटे चाहिये,
अपनेपन की थोड़ी हवा चाहिये।।
मिट्टी एक..........
मिट्टी एक, रूप अनेक
कभी बन घट, बुझाती प्यास
और कभी मानव बन
स्वयं बनती प्यास।
कभी बन मूर्ति देती वर
स्वयं बनती याचक।
कभी फूल बन महक जाते हो जीवन में,
कभी बन बारिश सरस जाते हो तुम।
कभी बन धूप खिल जाते हो जीवन में,
कभी यूँ ही ख्वाबों में मुस्का जाते हो तुम।
प्रिया के पाँव
रूनझुन पायल
मोहती मन।