Wednesday, February 8, 2023

 

    

डायनासोर


डायनासोर से

कंक्रीट के जंगल

धीरे-धीरे खाने लगे

नदी से रेत

पर्वत से पत्थर

वन से लकड़ी

खानों से लोहा।

 

धीरे-धीरे धरती पे

बढ़ने लगा प्रकृति का कोप

आने लगीं बाढ़ें

होने लगे झंझावात

भूकंप, सुनामी

रोज की सी बातें।

         डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

 

 


Tuesday, February 7, 2023


नजर उठीं

डॉ. मंजूश्री गर्ग


नजर उठीं,

उठकर लड़ी,

लड़कर झुकीं,

झुककर खिली।

 

तुम भँवरा बने,

हम फूल बने,

तुम गूँजे,

फिर उड़े,

हम खिले,

फिर बुझे। 

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Monday, February 6, 2023

        कविता बिना भाव,

                               व्यंग्य बिना धार,

                               गीत बिना लय,

                               शोभा नहीं देते।। 


                                                                                                डॉ. मंजूश्री गर्ग


Sunday, February 5, 2023

 

        

हर रिश्ते को थोड़ी परवरिश चाहिये,

थोड़ी धूप, थोड़ी छाँव चाहिये।

स्नेह का जल, प्यार के छींटे चाहिये,

अपनेपन की थोड़ी हवा चाहिये।।

  

               डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, February 4, 2023


मिट्टी एक..........

 

मिट्टी एक, रूप अनेक

कभी बन घट, बुझाती प्यास

और कभी मानव बन

स्वयं बनती प्यास।

कभी बन मूर्ति देती वर

और कभी मानव बन

स्वयं बनती याचक।


        डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, February 2, 2023


कभी फूल बन महक जाते हो जीवन में,

कभी बन बारिश सरस जाते हो तुम।

कभी बन धूप खिल जाते हो जीवन में,

कभी यूँ ही ख्वाबों में मुस्का जाते हो तुम।

 

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, February 1, 2023


प्रिया के पाँव

रूनझुन पायल

मोहती मन।


                           डॉ. मंजूश्री गर्ग