Wednesday, June 7, 2023

 

कल्प वृक्ष-च्यूरा वृक्ष


डॉ. मंजूश्री गर्ग

च्यूरा एक सदाबहार बहुउपयोगी वृक्ष है। इसे तेजी से बढ़ने वाले तिलहन मूल का वृक्ष भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम डिप्लोवनेमा बूटीरेशिया है। भारत में इसे मक्खन वृक्ष या बटर ट्री(Butter tree) के नाम से भी जाना जाता है। च्यूरा वृक्ष को मैदानी भागों में पाये जाने वाले बहुउपयोगी महुआ वृक्ष की पहाड़ी प्रजाति का माना जाता है। भारत के पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड, कश्मीर, सिक्किम और भूटान में बहुतायत सा पाये जाते हैं। उत्तराखंड के कुमायूँ मंडल में अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चम्पावत जिले में काली, पनार, रामगंगा और सरयू नदी, नैनीताल के पास भीमताल के आस-पास के स्थानों में च्यूरा के वृक्ष बहुत अधिक हैं।

 

च्यूरा का वृक्ष ऊँचा और तना मजबूत होता है। इसकी ऊँचाई 15 मी. से 22 मी. तक होती है तथा तने की चौड़ाई 1.5 मी. से 3 मी. तक होती है। च्यूरा वृक्ष की पत्तियाँ 20-25 से. मी. लम्बी और 9-18 से. मी. चौड़ी होती हैं जो शाखाओं के अग्रभाग पर गुच्छे के रूप में लगी होती हैं। इनकी पत्तियाँ शुभ मानी जाती हैं और आम के पत्तों की तरह बंदनवार बनाने के काम आती हैं। साथ ही पौष्टिक होने के कारण दुधारू पशुओं के चारे के रूप में पत्तियों का प्रयोग किया जाता है।

 

च्यूरा के फूल सफेद या पीले रंग के होते हैं जो जनवरी से अक्टूबर महीने के बीच खिलते हैं। फूलों का व्यास 2.0 से 2.5 से. मी. होता है। फूल बहुत ही सुगंधित होता है जिसके कारण मधुमक्खियाँ इनकी ओर आकर्षित होती हैं। इनके फूलों से प्राप्त शहद उत्तम स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से भरपूर होता है। च्यूरा के फल का गूदा स्वादिष्ट, मीठा, सुगंधित व रसीला होता है। इसके फल के गूदे में शर्करा की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे स्थानीय लोग गुड़ बनाते हैं. गूदे के अवशेषों को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

 

च्यूरा के फलों के अन्दर 1.5 से. मी. से 2.0 से.मी. लम्बाई वाले काले चमकदार लगभग बादाम के आकार के बीज होते हैं जिनके अंदर सफेद गिरी होती है। इनके बीजों का उपयोग वनस्पति घी बनाने में किया जाता है और घी की तरह ही खाने में प्रयोग किया जाता है। च्यूरा के बीजों से प्राप्त घी देसी घी के समान ही गुणकारी होता है। च्यूरा वृक्ष की जड़ों की भूमि पर मजबूत पकड़ होती है। जिस कारण यह वृक्ष पहाड़ी ढ़लानों पर भू-कटाव को रोकने में अत्यधिक उपयोगी माना जाता है।

 

इस प्रकार च्यूरा वृक्ष का लगभग प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में मानव जीवन में अपनी अहम् भूमिका निभाता है। इसीलिये च्यूरा वृक्ष को कल्प-वृक्ष भी कहते हैं।

 

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Tuesday, June 6, 2023


धुआं है कहीं

तो आग भी होगी ही

ना बेफ्रिक सो।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, June 5, 2023

 


डॉ. कन्हैया लाल नंदन


डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

जन्म-तिथि- 1जुलाई, सन् 1933 ई. उत्तर प्रदेश

पुण्य-तिथि- 25 सितंबर, सन् 2010 ई.

 

कन्हैयालाल नंदन हिन्दी भाषा के प्रसिद्ध पत्रकार, साहित्यकार, मंचीय कवि व गीतकार थे। नंदन जी का जन्म उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के परदेसपुर गाँव में हुआ था। नंदन जी ने डी. ए. वी. कॉलेज, कानपुर से बी. ए. किया और प्रयागराज विश्वविद्यालय, प्रयागराज से एम. ए. किया। भावनगर विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की।

 

प्रारम्भ में कन्हैयालाल नंदन ने अध्यापन कार्य किया। चार बर्षों तक मुबंई विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया. उसके बाद पत्रकारिता से जुड़े। सन् 1961 ई. से 1972 तक टाइम्स ऑफ इंडिया की साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के संपादक रहे। 1972 से दिल्ली में क्रमशः पराग, सारिका, दिनमान पत्रिकाओं के संपादक रहे। तीन वर्ष तक दैनिक नवभारत टाइम्स में फीचर संपादन किया। 6 वर्ष तक हिंदी संडे मेल में प्रधान संपादक रहने के बाद 1994 में इंडसइंड मीडिया में निर्देशक पद पर रहे।

 

कन्हैयालाल नंदन को 1999 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भारतेन्दु पुरस्कार, अज्ञेय पुरस्कार, मीडिया इंडिया पुरस्कार, कालचक्र पुरस्कार, रामकृष्ण जयदयाल सद्भावना पुरस्कार, आदि से भी नंदनजी को सम्मानित किया गया।

 

कन्हैयालाल नंदन ने 36 से अधिक पुस्कतें लिखीं, इनमें से प्रसिद्ध कृतियाँ हैं- लकुआ का शाहनामा, घाट-घाट का पानी, अंतरंग नाट्य परिवेश, आग के रंग, अमृता शेरगिल, समय की दहलीज, बंजर धरती पर इंद्रधनुष, गुजरा कहाँ-कहाँ से।

कन्हैयालाल नंदन द्वारा लिखित श्रृंगार रस की एक कविता के कुछ अंश-

 

एक नाम अधरों पर आया,

अंग-अंग चंदन वन हो गया।

 

बोल हैं कि वेद की ऋचायें,

सांसों में सूरज उग आये,

आँखों में ऋतुपति के छंद तैरने लगे,

मन सारा नील गगन हो गया।

 

गंध गुंथी बाहों का घेरा,

जैसे मधुमास का सबेरा,

फूलों की भाषा में देह बोलने लगी,

पूजा का एक जतन हो गया।

 

                                         कन्हैयालाल नंदन

 

 

           

 

 

Sunday, June 4, 2023


हमेशा बहे

अनुकूल ही हवा

संभव नहीं।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, June 3, 2023


तुम आओ या ना आओ,

हम तुम्हारे दरस को आते रहेंगे।

 

कभी चाँदनी बन मुस्कुरायेंगे,

कभी बन बदली बरस जायेंगे।

 

कभी फूल बन मुस्कुरायेंगे,

कभी बन तितली उड़ जायेंगे।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग          

Friday, June 2, 2023


हस्त रेखायें

भाग्य हैं कहती

कर्म से मिल।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, June 1, 2023


कुंठित मन

बंजर धरती से 

कैसे खिलेंगे।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग