दिन दिन घटते दिन, लंबी होती रातें।
धीरे से दस्तक दी सर्दी ने आने की।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
मुड़ जायेंगे
लचक है लता सी
चाहोगे जैसे।
छुईमुई सी
नजरों से छुओ तो
कुम्हलाती हो।
ताप सह के
देते हैं हमें छाँव
वट, पीपल।
खुशी के पल
धूप खिली आँगन
छँटा कोहरा।
लिबासों की तरह बदलते हैं जो मित्र,
कैसे निभायेंगे वो रिश्ते पुराने।
टूटे जो रिश्ते
मन मिले बिना तो
जुड़ ना सकें।