तेरी जुल्फों के साये में शामें सुहानी हैं,
हैं रोशन रातें तेरी ही मुस्कानों से।
बज उठते हैं जब तेरी यादों के घुँघरू
जिंदगी कई सरगमें सुनाती है हमें।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
डायनासोर
डायनासोर से
कंक्रीट के जंगल
धीरे-धीरे खाने लगे
नदी से रेत
पर्वत से पत्थर
वन से लकड़ी
खानों से लोहा।
धीरे-धीरे धरती पे
बढ़ने लगा प्रकृति का कोप
आने लगीं बाढ़ें
होने लगे झंझावात
भूकंप, सुनामी
रोज की सी बातें।
ये दर्द,
ये चुभन,
ये बेचैनी।
सब दोस्त
हैं अपने।
भूलकर भी,
भूलना चाहें
तुम्हें तो;
भूल नहीं
पायेंगे हम।
एक पल
एक पल की उड़ान क्या होती है?
पिंजरे में कैद पक्षी से पूछो!
जल की शीतलता क्या होती है?
जल विहिन मछली से पूछो!
मिलन का एक पल क्या होता है?
विरह में डूबे प्रेमी से पूछो!
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भीष्म प्रतिज्ञा
अंधा प्रेम ही नहीं होता,
अंधा मोह ही नहीं होता,
अंध भक्ति भी होती है.
जैसे- गंगापुत्र देवव्रत ने
अंध पितृ भक्ति के कारण,
आजीवन विवाह न करने की
भीष्म प्रतिज्ञा ले ली, औ’
हस्तिनापुर का भविष्य ही
दाँव पर लगा दिया.
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सुबह हुई तो,
रात के
मधुर सपने
चुरा ले गयी।
कुछ लालिमा
आकाश तले,
कुछ मधुरता
फूलों पे
बिखरा गयी।
संदेश
कोयल की कुहुक सी
आमों की सुगंध सी
महकती हवायें।
चारों दिशाओं से
दे रहीं हैं संदेश
प्रिय के आने का।