Monday, May 13, 2024


धान



डॉ. मंजूश्री गर्ग




धान(चावल) का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है. खाद्यान्न के रूप में तो गेहूँ के बाद चावल का प्रयोग ही सबसे अधिक होता ही है. भारतीय संस्कृति में प्रतीक रूप से भी चावल के विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है जैसे-अक्षत, खील, धान.


अक्षत-

अक्षत साबूत चावल को कहते हैं. हर पूजा की थाली में रोली-चन्दन के साथ अक्षत अवश्य रखे जाते हैं, ये श्वेत वर्ण मोती के प्रतीक हैं.


खील-

खील छिलका सहित चावल(धान) से बनायी जाती है. दीवाली पर्व पर लक्ष्मी-पूजन में बतासे-खिलौने के साथ खील का भी भोग लगाया जाता है. जैसे- धान अग्नि के गर्भ में तपकर शुभ्रवर्ण मुस्काती खील में परिवर्तित हो जाती है उसी प्रकार दीवाली की रात असंख्य दीपकों की रोशनी से अँधेरी रात भी जगमग-जगमग करती मुस्कुरा उठती है.


खील का विवाह के समय भी प्रतीक रूप में विशेष महत्व है. विवाह के समय नव-दम्पत्ति अग्नि में खील की आहुति देते हैं, जिसका तात्पर्य है कि जब तक पति-पत्नी दोनों मिलकर रहेंगे उनका जीवन सदा खील की तरह मुस्कुराता रहेगा. जैसे- जब तक धान में चावल के साथ छिलका जुड़ा रहता है धान खील के रूप में अग्नि के गर्भ से भी बाहर मुस्कुराती जाती है.


धान-

कन्या के विवाह के समय गौरी पूजन के समय कन्या के चारों ओर कन्या के माता-पिता, चाचा-चाची, मामा-मामी, आदि सभी रिश्तेदार परिक्रमा करते हुये धान बोते हैं और माँ पानी देकर सींचती है जो इस बात का प्रतीक है कि कन्या का धन धान के समान होता है. जब तक इन्हें अन्य न रोपा जाये ये फलीभूत नहीं होती.









 

कल्प-वृक्ष - च्यूरा वृक्ष


डॉ. मंजूश्री गर्ग


 

च्यूरा एक सदाबहार बहुउपयोगी वृक्ष है। इसे तेजी से बढ़ने वाले तिलहन मूल का वृक्ष भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम डिप्लोवनेमा बूटीरेशिया है। भारत में इसे मक्खन वृक्ष या बटर ट्री(Butter tree) के नाम से भी जाना जाता है। च्यूरा वृक्ष को मैदानी भागों में पाये जाने वाले बहुउपयोगी महुआ वृक्ष की पहाड़ी प्रजाति का माना जाता है। भारत के पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड, कश्मीर, सिक्किम और भूटान में बहुतायत सा पाये जाते हैं। उत्तराखंड के कुमायूँ मंडल में अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चम्पावत जिले में काली, पनार, रामगंगा और सरयू नदी, नैनीताल के पास भीमताल के आस-पास के स्थानों में च्यूरा के वृक्ष बहुत अधिक हैं।

 

च्यूरा का वृक्ष ऊँचा और तना मजबूत होता है। इसकी ऊँचाई 15 मी. से 22 मी. तक होती है तथा तने की चौड़ाई 1.5 मी. से 3 मी. तक होती है। च्यूरा वृक्ष की पत्तियाँ 20-25 से. मी. लम्बी और 9-18 से. मी. चौड़ी होती हैं जो शाखाओं के अग्रभाग पर गुच्छे के रूप में लगी होती हैं। इनकी पत्तियाँ शुभ मानी जाती हैं और आम के पत्तों की तरह बंदनवार बनाने के काम आती हैं। साथ ही पौष्टिक होने के कारण दुधारू पशुओं के चारे के रूप में पत्तियों का प्रयोग किया जाता है।

 

च्यूरा के फूल सफेद या पीले रंग के होते हैं जो जनवरी से अक्टूबर महीने के बीच खिलते हैं। फूलों का व्यास 2.0 से 2.5 से. मी. होता है। फूल बहुत ही सुगंधित होता है जिसके कारण मधुमक्खियाँ इनकी ओर आकर्षित होती हैं। इनके फूलों से प्राप्त शहद उत्तम स्वादिष्ट व औषधीय गुणों से भरपूर होता है। च्यूरा के फल का गूदा स्वादिष्ट, मीठा, सुगंधित व रसीला होता है। इसके फल के गूदे में शर्करा की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे स्थानीय लोग गुड़ बनाते हैं. गूदे के अवशेषों को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है।

 

च्यूरा के फलों के अन्दर 1.5 से. मी. से 2.0 से.मी. लम्बाई वाले काले चमकदार लगभग बादाम के आकार के बीज होते हैं जिनके अंदर सफेद गिरी होती है। इनके बीजों का उपयोग वनस्पति घी बनाने में किया जाता है और घी की तरह ही खाने में प्रयोग किया जाता है। च्यूरा के बीजों से प्राप्त घी देसी घी के समान ही गुणकारी होता है। च्यूरा वृक्ष की जड़ों की भूमि पर मजबूत पकड़ होती है। जिस कारण यह वृक्ष पहाड़ी ढ़लानों पर भू-कटाव को रोकने में अत्यधिक उपयोगी माना जाता है।

 

इस प्रकार च्यूरा वृक्ष का लगभग प्रत्येक भाग किसी न किसी रूप में मानव जीवन में अपनी अहम् भूमिका निभाता है। इसीलिये च्यूरा वृक्ष को कल्प-वृक्ष भी कहते हैं।

 

 

  



Sunday, May 12, 2024


 कत्था

डॉ. मंजूश्री गर्ग


पान का हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान है। पूजा-अर्चना में ही नहीं, प्रायः भोजन के पश्चात् हमारे यहाँ पान खाने की परम्परा है। पान बनारस का हो या कलकत्ता का सभी में कत्था अवश्य लगाया जाता है। पान खाने से जो होंठ और मुँह लाल होते हैं वो कत्थे के कारण ही होते हैं।

कत्था हमें खैर नामक पेड़ की लकड़ी से प्राप्त होता है। खैर एक प्रकार का बबूल का पेड़ है। इस वृक्ष की लकड़ी के टुकड़ों को उबाल कर और उसके रस को जमा कर कत्था बनाया जाता है, जो पान में चूने के साथ लगाया जाता है।

खैर को कथकीकर और सोनकर भी कहते हैं। यह समस्त भारत में पाया जाता है। जब खैर के पेड़ का तना लगभग 12 इंच मोटा हो जाता है तो इसे काट लेते हैं और छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गर्म पानी में पकाते हैं। गाढ़ा रस निकालने के बाद चौड़े बर्तन में खुला रख कर सुखाया जाता है। सूखने के बाद चौकोर आकार का काट लेते हैं। यही कत्था होता है जिसे पानी में घोलकर पान की पत्ती पर लगाया जाता है। मुँह के फंगल इंफेक्शन में भी कत्था बहुत लाभकारी होता है। मुँह में छाले होने पर सूखा कत्था छोटी हरी इलायची के साथ मुँह में रखने से आराम मिलता है।

 

 

 

 


Saturday, May 11, 2024

वैजयंती माला

 


डॉ. मंजूश्री गर्ग


वैजयंती माला विष्णु भगवान को बहुत प्रिय है और श्री कृष्ण की प्रिय पाँच वस्तुओं(गाय, बाँसुरी, मोरपंख, माखन-मिश्री और वैजयंती माला) में से एक है। वैजयंती माला का शाब्दिक अर्थ है विजय दिलाने वाली माला।

वैजयंती के पत्ते हरे रंग के और एक मीटर तक लंबे होते हैं और दो इंच के लगभग चौड़े होते हैं। ये पत्ते सीधे जमीन से निकलते हैं इनमें कोई तना या टहनी नहीं होती। वैजयंती के पौधे में कोई फूल नहीं आता, एक बीज फली के साथ निकलता है। बीज में ही जुड़ा हुआ पराग होता है। ऊपर से पराग तोड़कर बीज प्राप्त किया जाता है जो एक मोती के समान चमकीला होता है। प्रारम्भ में यह हरे रंग का होता है पकने पर भूरे रंग का हो जाता है। वैजयंती बीज कमल गट्टा(कमल का बीज) के आकार का होता है। वैजयंती का पौधा कैना-लिली(केलई) से भिन्न होता है।

वैजयंती बीज की विशेषता है कि इसमें धागा डालने के लिये प्राकृतिक रूप से छेद बना होता है। वैजयंती माला को धारण करने के लिये सोमवार और शुक्रवार का दिन शुभ है।


 


Friday, May 10, 2024


कचनार 


डॉ. मंजूश्री गर्ग


कचनार का वृक्ष सड़क किनारे या उपवनों में अधिकांशतः पाया जाता है। नवंबर से मार्च तक के महीनों में अपने गुलाबी व जामुनी रंगों के फूलों से लदा ये वृक्ष अपनी सुंदरता से सहज ही सबका मन मोह लेता है।

 

सन् 1880 ई. में हांगकांग के ब्रिटिश गवर्नर सर् हेनरी ब्लेक(वनस्पतिशास्त्री) ने अपने घर के पास समुद्र किनारे कचनार का वृक्ष पाया था। उन्हीं के सुझाये हुये नाम पर कचनार का वानस्पतिक नाम बहुनिया ब्लैकियाना पड़ गया। कचनार हांगकांग का राष्ट्रीय फूल है और इसे आर्किड ट्री के नाम से भी जाना जाता है। भारत में मुख्यतः कचनार के नाम से ही जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कन्दला या कश्चनार कहते हैं। भारत में यह उत्तर से दक्षिण तक सभी जगह पाया जाता है।

 

कचनार के पेड़ की लंबाई 20 फीट से 40 फीट तक होती है। कचनार अपनी पत्तियों के आकार के कारण सहज ही पहचान में आ जाता है। पत्तियाँ गोलाकार होती हैं और अग्रभाग से दो भागों में बँटी होती हैं। मध्य रेखा से आपस में जुड़ी होती हैं। इसकी पत्तियों की तुलना ऊँट के खुर से भी की जाती है। कचनार के गुलाबी रंग के फूल के पेड़ों में जब फूल आने शुरू होते हैं तो अधिकांशतः पत्तियाँ झड़ जाती हैं। जामुनी रंग के कचनार के पेड़ों में प्रायः फूलों के साथ पत्तियाँ भी रहती हैं। कचनार के फूलों में पाँच पँखुरियां होती हैं और फूलों से भीनी सुगंध आती है।

कचनार के पेड़ भूस्खलन को भी रोकते हैं। कचनार के फूल की कली देखने में भी सुंदर होती है और खाने में स्वादिष्ट भी। कचनार के वृक्ष अनेक औषधि के काम आते हैं व इससे गोंद भी निकलता है। कचनार की पत्तियाँ दुधारू पशुओं के लिये अच्छा आहार होती हैं।


Thursday, May 9, 2024

बाँस


 

डॉ. मंजूश्री गर्ग

बाँस, ग्रामिनीई कुल की एक घास है जो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में पायी जाती है. बाँस में प्रकृति को संरक्षित करने का अद्भुत गुण है. इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी होती है. छोटी-छोटी घरेलू वस्तुओं से लेकर मकान बनाने तक काम आती है.

 

बाँस का नया उगा पौधा खाने के काम आता है, इसका अचार और मुरब्बा भी पड़ता है. बाँस में अधिक कार्बोहाइड्रेट होने से यह स्वास्थ्यवर्धक भी है. अन्य पौधों की अपेक्षा बाँस का पेड़ अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है. साथ ही यह पीपल के पेड़ की तरह दिन में कार्बन डाईऑक्साइड खींचता है और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है.

 

बाँस की खेती आर्थिक दृष्टि से भी उपयोगी होती है. एक बार बाँस बोने के बाद पाँच साल बाद उपज देने लगते हैं. यह पृथ्वी पर सबसे तेज बढ़नेवाले पौधों में से एक है. एक दिन में 121 से0मी0 तक इसकी लम्बाई बढ़ जाती है, कभी-कभी कुछ प्रजातियों में इसके बढ़ने की गति 1 मी0 प्रति घंटा हो जाती है. इसका तना लम्बा, गाँठदार, प्रायः खोखला और अनेक शाखाओं वाला होता है तने की निचली गाँठों से जड़ें निकलती हैं जो रेशेदार होती हैं इसकी पत्तियाँ लम्बी और नुकीली होती हैं. जब बाँस में फूल खिलते हैं तो उसका जीवन समाप्त हो जाता है. सूखे तने गिरकर रास्ता बंद कर देते हैं, अगले वर्ष वर्षा के बाद बीजों से नयी कलमें फूटती हैं और जंगल फिर हरा हो जाता है.

 

बाँस का जीवन एक वर्ष से पचास वर्ष तक का होता है, जब तक की फूल नहीं खिलते. फूल बहुत ही छोटे, रंगहीन, बिना ठंडल के छोटे-छोटे गुच्छों में पाये जाते हैं. साधारणतः बाँस तभी फूलता है जब सूखे के कारण खेती मारी जाती है और दुर्भिक्ष पड़ता है. शुष्क एवम् गरम हवा के कारण पत्तियों के स्थान पर कलियाँ खिलती हैं. फूल खिलने पर पत्तियाँ झड़ जाती हैं. बहुत से बाँस एक वर्ष में फूलते हैं. ऐसे बाँस भारत में नीलगिरि की पहाड़ियों में पाये जाते हैं. यदि फूल खिलने का समय ज्ञात हो तो काट-छाँट कर फूलने की प्रक्रिया को रोका जा सकता है.

 

बाँस के द्वारा कागज भी बनाया जाता है. यूनान और भारत में दवाईयाँ बनाने के लिये भी बाँस का प्रयोग किया जाता है.

 

फेंगशुई में बाँस का बहुत अधिक महत्व है इसे घरों में सौभाग्य सूचक माना जाता है. काँच के छोटे बर्तन में थोड़ा पानी भरकर, कुछ बाँस की कलमों को लाल रिबन से बाँधकर रखा जाता है. बर्तन में थोड़े से पत्थर भी डाले जाते हैं. इस तरह से फेंगशुई में इस गमले को लकड़ी(बाँस), पृथ्वी(पत्थर), जल, अग्नि(लाल रिबन), धातु(काँच का बर्तन) का प्रतीक माना जाता है.

 

 

 

Wednesday, May 8, 2024

कमल पुष्प

 


डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

कमल हमारा राष्ट्रीय पुष्प है. कमल का फूल देखने में मनमोहक व अधिकांशतः गुलाबी रंग का अति सुन्दर फूल होता है. हिन्दी साहित्य में प्रारम्भिक काल से कवि नायक या नायिका के सुन्दर नयनों की, अधरों की, करों की, पदों की उपमा कमल से देते रहे हैं. भक्तिकाल के कवि सूर और तुलसी ने भी अपने-अपने आराध्य देव कृष्ण और राम के रूप का वर्णन करते समय कमल की उपमा का प्रयोग किया है.

उत्तर प्रदेश में काशीपुर में द्रोणासागर नामक स्थान पर ग्रीष्म काल में कमल-सरोवर का सौन्दर्य देखते ही बनता है, जब द्रोणासागर में कमल के फूल अपने पूर्ण यौवन के साथ खिले होते हैं. इस समय मन्दिरों में भगवान की मूर्तियों पर प्रायः कमल के फूल ही चढ़े हुये देखने को मिलते हैं.

कमल के फूल सुन्दर होने के साथ-साथ बहुपयोगी भी होते हैं. कमल के फूलों के तने जहाँ कमल ककड़ी के नाम से जाने जाते हैं वहीं कमल के फल भी खाने में स्वादिष्ट होते हैं. फलों के अन्दर के बीज कमल गट्टे कहलाते हैं जो पककर काले और भूरे रंग के हो जाते हैं. एक तरफ कमल गट्टे भगवान शिव की पूजा करते समय शिव-लिंग पर चढ़ाये जाते हैं तो दूसरी तरफ कमल गट्टों से ही मखाने बनाये जाते हैं.