दो जन मिले बिना, सम्भव नहीं,
बात प्यार की हो, या तकरार की।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कोई हार कर भी खुश है,
कोई जीत कर भी नहीं।
अपनी-अपनी परिधियाँ,
हार जीत की सबकी।
मत अधीर हो धरा, आ पहुँचे पाहुने बादल।
रससिक्त तुम्हें कर, पहनायेंगे चूनर धानी।।
रिमझिम-रिमझिम सावन जैसा,
पल-पल बरसता प्यार तुम्हारा।
अन्तरतम तक जो भिगो दे,
ऐसा मधुरिम प्यार तुम्हारा।।
ठुकराइये या अपनाइये,
रूठिये या मनाइये।
हम तो जियेंगें तेरे नाम से,
मरेंगें तो तेरे नाम से।।
जमीं पर नहीं पड़ते हैं कदम हमारे,
अरमानों को पंख लगे हैं आज।
आकाश को छू लेंगे एक दिन हम,
चाहतों में नया रंग भरा है आज।।
तन के गहने
हैं अनगिन।
मन का सिंगार
तुम हो प्रियतम।।