आँधियों में उजड़े चमन, बसाती प्यार की बयारें।
आँधियाँ हों नफरत की, तो बसायेगा फिर कौन?
डॉ. मंजूश्री गर्ग
पंख जल गये हैं सभी कड़ी धूप में।
फिर भी मन की उड़ानें लगती हैं सुन्दर।।
जिंदगी में छाँव बनकर आप आये हैं।
अब हमें धूप सुहानी लग रही है।।
ठोकर नहीं कहती कि रोक दो बढ़ते कदम।
कहती है बढ़ते रहो आगे सँभल-सँभल कर।।
बिन थामे ही हाथ, हमेशा
थामे रहते हाथ हमारा।
कैसे कह दें! साथ नहीं हो,
पल-पल साथ निभाते हो।।
मंजिल पानी है ‘गर
अवरोधों से डरना कैसा!
कौन है? जिसने ताप सहा नहीं
सूरज जैसा चमका जो भी।।
तुम साथ थे मेरे
तुम साथ हो मेरे
तुम साथ रहोगे हमेशा।
मेरी बातों में तुम
मेरे ख्बाबों में तुम
मेरी यादों में तुम
मेरे गीतों में तुम
मेरी गजलों में तुम
तुम ही तुम हो
जीवन के हर पल में तुम।