ऋतु-चक्र
सर्दी में सर्दी पड़े, गर्मी में गर्मी.
तभी तो ऋतु-चक्र चलेगा,
सहज जीवन चक्र चलेगा.
बर्फ गिरेगी, हवा चलेगी.
बर्फ पिघलेगी, नदी बहेंगी.
बादल बनेंगे, बादल बरसेंगे.
हर्षित होगी धरा सारी.
डॉ. मंजूश्री गर्ग
आयेंगे आज बसंत कुअँर।
कर रही श्रृंगार प्रकृति सुन्दरी,
नव वल्लरियों से सजा तोरण,
पीत पराग से आपूरित आँगन।
नव किसलयों से सजा वन,
नव सुमनों से सजा उपवन।
पक्षी के रागों में शहनाई की धुन,
कोयल की कुहू में मीठी सी धुन।
खिलते कमल पर जैसे ओस की बूँद,
रंगोली पर सजे जैसे जलते दिये,
काजू कतली पर जैसे चाँदी की वर्क,
तुम्हारे मुख पर सजे ऐसे ही मुस्कान।
ये किसने!
सिलेटी रंग की स्लेट पर
सुनहरे आखर लिख डाले।
जगमगाने लगे तारे,
महकने लगी रात-रानी,
मुस्कुराने लगी रात।
उलझे ही रहे हम।
उलझे रहे, उलझे रहे,
कभी बालों में, कभी बातों में,
कभी यादों में, कभी ख्बाबों में।
आने को कहा है
जब से तुमने
एक-एक पल
इन्तजार का
कट रहा है
मुश्किल में।
घड़ी-घड़ी
घड़ी देखती हूँ।
एक पल उमंग
एक पल उदासी
छा रही है
मन-मन्दिर में।
संदेश
कोयल की कुहुक सी
आमों की सुगंध सी
महकती हवायें।
चारों दिशाओं से
दे रहीं हैं संदेश
प्रिय के आने का।