Friday, April 21, 2017


गीत

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

शाख कब खिला फूल मत पूछ,
बिखरी-बिखरी हर पंखुरी है मत पूछ।

शाम है या सुबह मत पूछ,
कितनी उदासी है लाली में मत पूछ।

नींद कब आयी आँखों में मत पूछ,
सपने ही तिरते रहे मत पूछ।

सपने कब साकार हुये मत पूछ,
हर सुबह हम खोते रहे मत पूछ।

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फूल की आब शाख पर ही मुरझायेगी
हर फूल को कोई सराहे मुमकिन नहीं होता.

                                         डॉ0 मंजूश्री गर्ग


दिन और रात यूँ ही कटते हैं इंतजार में
कैसे कटेगी जिंदगी हम जानते नहीं.

                                         डॉ0 मंजूश्री गर्ग











Wednesday, April 19, 2017


कदंब

डॉ0 मंजूश्री गर्ग



सूरज ने रंग दी पंखुरियां
शीत पवन ने भेजी गंध,
पात-पात में बजी बाँसुरी
दिशा-दिशा झरता मकरंद।

सावन के भीगे संदेशे
लेकर आया फूल कदंब।
                        - शशि पाधा

कदंब भारतीय उपमहाद्वीप में उगने वाला शोभाकार वृक्ष है. सुगंधित फूलों से युक्त बारहों महीने हरे, तेजी से बढ़ने वाले इस विशाल वृक्ष की छाया शीतल होती है. इसके पेड़ की अधिकतम ऊँचाई 45 मी0 तक हो सकती है. पत्तियों की लंबाई 13 से 23 से0मी0 होती है. अपने स्वाभाविक रूप में चिकनी, चमकदार, मोटी और उभरी नसों वाली होती हैं, जिनसे गोंद निकलता है.
चार-पाँच वर्ष का होने पर कदंब में फूल आने शुरू हो जाते हैं. कदंब के फूल लाल, गुलाबी, पीले और नारंगी रंगों के होते हैं. अन्य फूलों से भिन्न कदंब के फूल गेंद की तरह गोल लगभग 55 से0मी0 व्यास के होते हैं, जिनमें उभयलिंगी पुंकेसर कोमल शर की भाँति बाहर की ओर निकले होते हैं. ये गुच्छों में खिलते हैं इसीलिये इसके फल भी छोटे गूदेदार गुच्छों में होते हैं, जिनमें से हर एक में चार संपुट होते हैं. इसमें खड़ी और आड़ी पंक्तियों में लगभग 8000 बीज होते हैं. पकने पर ये फट जाते हैं और इनके बीज हवा या पानी से दूर-दूर तक बिखर जाते हैं. कदंब के फल और फूल पशुओं के लिये भोजन के काम आते हैं. इसकी पत्तियाँ भी गाय के लिये पौष्टिक भोजन समझी जाती हैं. इसका सुगंधित नारंगी फूल हर प्रकार के पराग एकत्रित करने वाले कीटों को आकर्षित करता है जिसमें अनेक भौंरे मधुमक्खियाँ तथा अन्यकीट शामिल हैं.
श्याम ढ़ाक आदि कुछ स्थानों में ऐसी जाति के कदंब पाये जाते हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से दोनों की तरह मुड़े हुये पत्ते निकलते हैं. कदंब का तना 100 से0 मी0 160 से0मी0।
पुराना होने पर धारियाँ टूट कर चकत्तों जैसी बन जाती हैं. कदंब की लकड़ी सफेद से हल्की पीली होती है. इसका घनत्व 290 से 560 क्यूबिक प्रति मीटर और नमी लगभग 15 प्रतिशत होती है. लकड़ी के रेशे सीधे होते हैं यह छूने में चिकनी होती है और इसमें कोई गंध नहीं होती. लकड़ी का स्वभाव नर्म होता है इसलिये औजार और मशीनों से आसानी से कट जाती है. यह आसानी से सूख जाती है और इसको खुले टैंकों या प्रेशर वैक्यूम द्वारा आसानी से संरक्षित किया जा सकता है. इसका भंडारण भी लंवे समय तक किया जा सकता है. इस लकड़ी का प्रयोग प्लाइवुड के मकान, लुगदी और कागज, बक्से, क्रेट, नाव और फर्नीचर बनाने के काम आती है. कदंब के पेड़ से बहुत ही उम्दा किस्म का चमकदार कागज बनता है. इसकी लकड़ी को राल या रेजिन से मजबूत किया जाता है. कदंब की जड़ों से एक पीला रंग भी प्राप्त किया जाता है.
जंगलों को फिर से हरा-भरा करने, मिट्टी को उपजाऊ बनाने और सड़कों की शोभा बढ़ाने में कदंब महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह तेजी से बढ़ता है और छः से आठ वर्षों में अपने पूरे आकार में आ जाता है. इसलिये जल्दी ही बहुत-सी जगह को हरा-भरा कर देता है. विशालकाय होने के कारण यह ढ़ेर सी पत्तियाँ झाड़ता है जो जमीन के साथ मिलकर उसे उपजाऊ बनाती है. सजावटी फूलों के लिये इसका व्यवयायिक उपयोग होता है साथ ही इसके फूलो का प्रयोग एक विशेष प्रकार के इत्र को बनाने में भी किया जाता है. भारत में बनने वाला यह इत्र कदंब की सुगंध को चंदन में मिलाकर वाष्पीकरण पद्धति द्वारा बनाया जाता है. ग्रामीण अंचलों में इसका उपयोग खटाई के लिये होता है. इसके बीजों से निकला तेल खाने और दीपक जलाने के काम आता है.
इस प्रकार कदंब का वृक्ष प्रकृति और पर्यावरण को तो संरक्षण देता ही है, औषधि और सौन्दर्य का भी महत्तवपूर्ण स्रोत है.





गीत

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

होने लगा है प्यार हमें तुमसे
हर ऋतु सुहानी लगने लगी।

गर्मी के तप्त मौसम में
साथ तेरा शीतल लगने लगा।
बरखा की मस्त फुहारों में
मन मेरा मदमस्त होने लगा।

होने लगा है प्यार हमें तुमसे
हर ऋतु सुहानी लगने लगी।

शरद् के सुहाने मौसम में
तू मुझे प्यारा और लगने लगा।
शिशिर के सर्द मौसम में
साथ तेरा गरमाने लगा।

होने लगा है प्यार हमें तुमसे
हर ऋतु सुहानी लगने लगी।

हेमन्त के मौसम में मन
ख्बाब नये बुनने लगा।
बसन्त बहार के मौसम में
जीवन बहारों से भरने लगा।

होने लगा है प्यार हमें तुमसे
हर ऋतु सुहानी लगने लगी।






गीत

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

तेरे पास आने को
जी चाहता है।

तोड़ के
बंधन
 सारे
जग के
तेरे पास आने को
जी चाहता है।


लिपटती देख
लतायें
वृक्ष से
तेरे पास आने को
जी चाहता है।

चूमते देख
भँवरों को
कलियाँ
तेरे पास आने को
जी चाहता है।

नीड़ों को जाते
देख
पक्षी
तेरे पास आने को
जी चाहता है।
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Tuesday, April 18, 2017


आत्म-विश्वासः-

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

हर माली बीज बोता
उपवन उगाने को,
हर माली सिंचाई करता
उपवन रंगाने को,
हर माली कटाई करता
उपवन सजाने को, पर

बसन्त खिलने से पहले ही
कुहरा छा जाता,
भौंरों के आने से पहले ही
मकरंद बिखर जाता,
तितलियों के आने से पहले ही
रंग उड़ जाता.

मानों मकरंद नहीं बिखरता
माली की आशा है बिखरती.
मानों पंखुड़ियाँ नहीं टूटती
स्वप्न हैं टूट जाते.
मानों बगिया नहीं लुटती
माली ही है लुट जाता.

नहीं सफल हो पाती उसकी मेहनत,
नहीं सच हो पाती उसकी तमन्नायें.
मन की उमंग, मन में ही रहती.
फिर भी नहीं खत्म होता आत्मविश्वास
नव-आशा, नव-प्रेरणा लेकर जाता है,
फिर से बगिया उगाने को कर्म-पथ पर.






Monday, April 17, 2017


शून्यः

जिंदगी है शून्य, शून्य के समान
जहाँ कभी दुःख की आती घटायें.
जैसे शून्य में छा जाते है बादल
और कभी सुख की फूटती किरणें
कि जैसे बिखरती हैं किरणें रवि की।

जहाँ कभी फैलती रवि की लाली,
और कभी फैलती शशि की ज्योति।
जहाँ कभी फैलती रवि की प्रचंड अग्नि,
और कभी फैलती शशि की स्निग्ध शांति।

शून्य में ही मँडरा रहे सब नक्षत्र-गण
और विहार कर रहे विविध पक्षी-गण.
शून्य तो शून्य है, पर रहता न कभी शून्य
जिंदगी भी है शून्य, पर रहती न कभी शून्य।

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