Saturday, March 23, 2019




संधि द्वारा निर्मित शब्द-
कभी-कभी दो शब्द या पद मिलकर नया शब्द बनाते हैं. यह कार्य ‘समास’ और ‘संधि’ द्वारा होता है. समास में जहाँ दोनों पदों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता, केवल कथन में संक्षिप्तता आ जाती है, वहीं दो पदों की संधि के समय प्रथम पद के अंतिम वर्ण या स्वर और द्वितीय पद के प्रथम वर्ण में प्रायः परिवर्तन होकर एक नया शब्द बनता है; जैसे- ‘विद्या’ पद और ‘आलय’ पद की संधि से ‘विद्यालय’ शब्द बनता है. इसमें दोनों पदों की संधि के समय ‘आलय’ पद का ‘आ’ स्वर का लोप हो गया है.
हिंदी में संधि द्वारा शब्द अधिकांशतः संस्कृत भाषा के नियमों के अनुसार ही बनते हैं, किंतु कुछ हिन्दी भाषा के संधि नियम अपने भी विकसित हुये हैं. इस तरह हिंदी भाषा के संधि नियमों को हम प्रमुख दो भागों में विभाजित कर सकते हैं-

अ.  संस्कृत भाषा के संधि नियमों द्वारा शब्द रचना
आ.        हिंदी भाषा के संधि नियमों द्वारा शब्द रचना
अ.  संस्कृत भाषा के संधि नियमों द्वारा शब्द रचना
संधि के भेद
स्वर संधि            वर्ण/व्यंजन संधि            विसर्ग संधि

विद्या+आलय=        सत+आचार=                   निः+अर्थक=
विद्यालय            सदाचार                  निरर्थक

                  
                   स्वर संधि-
दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार(परिवर्तन) को स्वर संधि कहते हैं. इस संधि के पाँच भेद हैं-
1.दीर्घ संधि
2.गुण संधि
3.वृद्धि संधि
4.यण संधि
5. अयादि संधि

1.दीर्घ संधि-
जब पहल्रे शब्द के अन्त में अ, आ, इ, ई, उ, ऊ स्वर आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में उसी स्वर के समान लघु या दीर्घ स्वर आये तो संधि द्वारा बने शब्द में एक शब्द का लोप हो जाता है और एक स्वर दीर्घ स्वर में परिवर्तित हो जाताहै. उदाहरण-
दीप+अवली = दीपावली      (अ+अ = आ)
रवि+इंद्र = रवींद्र           (इ+इ =ई)
महा+आत्मा = महात्मा      (आ+आ = आ)
सु+उक्ति = सूक्ति                   (उ+उ = ऊ)

2.गुण संधि-
जब प्रथम शब्द के अंत में अ या आ आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में इ, ई / उ, ऊ / ऋ स्वर आये, तो दोनों मिलकर क्रमशः ए / ओ / अर हो जाते हैं.
उदाहरण-
देव+इंद्र = देवेंद्र            (अ+इ = ए)
पर+उपकार = परोपकार      (अ+उ = ओ)
महा+उत्सव = महोत्सव      (आ+उ = ओ)
राज+ऋषि = राजर्षि         (अ+ऋ = अर)

3.वृद्धि संधि-
जब प्रथम शब्द के अंत में अ या आ स्वर आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ए, ऐ / ओ, औ स्वर आयें, तो दोनों मिलकर ऐ / औ हो जाते हैं.
उदाहरण-
सदा+एव = सदैव           (आ+ए = ऐ)
वन+औषधि = वनौषधि      (अ+औ =औ)

4.यण संधि-
जब प्रथम शब्द के अंत में इ, ई / उ, ऊ / ऋ स्वर आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई अन्य स्वर आये तो इ, ई / उ, ऊ / ऋ का क्रमशः य / व / र हो जाता है, तब यण संधि होती है.
उदाहरण-
यदि+अपि = यद्यपि        (इ+अ = य)
सु+आगत = स्वागत        (उ+आ = व)
पितृ+आज्ञा = पित्राज्ञा       (ऋ+आ = र)

5.अयादि संधि-
जब प्रथम शब्द के अंत में ए, ऐ, ओ, औ स्वर हों और दूसरे शब्द के प्रारंभ में अन्य स्वर आते हों तो ए, ऐ, ओ, औ का क्रमशः अय, आय, अव, आव हो जाता है, तब अयादि संधि होती है.
उदाहरण-
ने+अयन = नयन               (ए+अ = अय)
गै+अक = गायक                (ऐ+अ =आय)
पो+अन = पवन                 (ओ+अ = अव)
पौ+अक = पावक                (औ+अ = आव)

वर्ण/व्यंजन संधि
जब प्रथम शब्द के अंत में कोई व्यंजन हो और दूसरे शब्द के प्रारंभ में कोई स्वर या व्यंजन हो , तब उन दोनों शब्दों की संधि से निर्मित शब्द में जो परिवर्तन होता है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं. स्वर संधि में जहाँ स्वर में परिवर्तन होता है, वहीं व्यंजन संधि में व्यंजन में परिवर्तन होता है. जैसे- ‘शरत’ और ‘चंद्र’ शब्द की संधि से ‘शरच्चंद्र’ शब्द बनता है, इसमें पहले शब्द के अंतिम वर्ण ‘त’ का ‘च’ हो जाता है.
वर्ण सम्बंधी परिवर्तन के कुछ विशेष नियम हैं-

1.क वर्ग , च वर्ग , आदि के पहले वर्ण का तीसरे वर्ण में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द के अंत में किसी वर्ग(क, च, ट, त, प) का प्रथम वर्ण आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई स्वर या वर्ण आये तो क, च, ट, त, प वर्ण का क्रमशः उसी वर्ग के तीसरे वर्ण(ग, ज, ड, द, ब) में परिवर्तन हो जाता है.
उदाहरण-
वाक+दान = वाग्दान
सत+गति = सद्गति
षट+आनन = षडानन
जगत+ईश = जगदीश

2.क वर्ग, च वर्ग, आदि के पहले वर्ण का अनुनासिक वर्ण में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द के अंत में क, च, ट, त, प, वर्ण हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई अनुनासिक वर्ण हो, तो क, च, ट, त, प वर्ण का क्रमशः उसी वर्ग के पाँचवे वर्ण में परिवर्तन हो जाता है.
उदाहरण-
वाक+मय = वाङ्मय
जगत+नाथ = जगन्नाथ

3.त या द वर्ण का अन्य वर्ग के वर्ण में परिवर्तन-
जब पहले शब्द के अंत में त या द वर्ण आता है और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में च या छ वर्ण आता है तो संधि के समय त या द वर्ण का च हो जाता है. ऐसे ही त या द वर्ण के सामने ज या झ आने पर त या द का ज हो जाता है; ट या ठ आने पर त या द का ट हो जाता है; ड या ढ़ आने पर त या द का ङ हो जाता है और ल आने पर त या द का ल हो जाता है.
उदाहरण-
सत+जन = सज्जन
तत+लीन = तल्लीन

4.दोनों वर्णों में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द के अंत में त या द वर्ण आता है और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में
श वर्ण आता है तो त या द वर्ण च वर्ण में परिवर्तित हो जाता है और श वर्ण छ वर्ण में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
उत्‌+श्वास = उच्छ्वास
उत्‌+श्रृंखल = उच्छृंखल
ऐसे ही यदि प्रथम शब्द के अंत में त या द वर्ण हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ह वर्ण हो, तो त या द वर्ण द में परिवर्तित होता है और ह वर्ण ध में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
उत+हार = उद्धार
पद+हति = पद्धति

5.म वर्ण में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द के अंत में म वर्ण हो और दूसरे शब्द के प्रारंभ में क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग में से कोई वर्ण हो तो म वर्ण का क्रमशः उसी वर्ग का पांचवाँ वर्ण हो जाता है; और कोई वर्ण होने पर म का अनुस्वार हो जाता है.
 उदाहरण-
सम+कल्प = सङकल्प
सम+तोष = सन्तोष
सम+बंध = सम्बंध
सम+चार = सञ्चार
सम+हार = संहार
सम+शय = संशय

6.न वर्ण में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द के अंत में ऋ, र, ष वर्ण हों और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में न वर्ण हो तो न वर्ण ण वर्ण में परिवर्तित हो जाता है.                 उदाहरण-
ऋ+न = ऋण
तृष+ना = तृष्णा
विशेष-
व्यंजन संधि में अधिकांशतः प्रथम शब्द के अंत में वर्ण होता है और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई स्वर या वर्ण होता है; किंतु कभी-कभी प्रथम शब्द के अंत में कोई स्वर होता है और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई वर्ण होता है

ऐसी परिस्थिति में वर्ण परिवर्तन के दो नियम हैं-

अ.जब प्रथम शब्द के अंत में कोई स्वर हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में छ वर्ण हो तो छ से पहले च वर्ण जुड़ जाता है; जैसे-
आ+छादन = आच्छादन
परि+छेद = परिच्छेद

आ.जब प्रथम शब्द के अंत में अ, आ को छोड़कर अन्य कोई स्वर आये और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में स वर्ण आये तो स का ष हो जाता है; जैसे-
वि+सम = विषम
अभि+सेक = अभिषेक


विसर्ग संधि
जब प्रथम शब्द के अंत में विसर्ग(ः) हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई स्वर या व्यंजन हो तो उन दोनों शब्दों की संधि से निर्मित शब्द में जो परिवर्तन होता है उसे विसर्ग संधि कहते हैं. स्वर संधि में जहाँ स्वर में परिवर्तन होता है; व्यंजन संधि में जहाँ वर्ण में परिवर्तन होता है; वहीं विसर्ग संधि में विसर्ग में परिवर्तन होता है.
विसर्ग सम्बंधी परिवर्तन के कुछ विशेष नियम हैं-
1.विसर्ग का स, श, ष वर्ण में परिवर्तन-
जब शब्द के अंत में विसर्ग और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में त या थ; च या छ; ट या ठ वर्ण हो तो विसर्ग का क्रमशः स, श, ष वर्ण में परिवर्तन होता है.
उदाहरण-
मनः+ताप = मनस्ताप
निः+छल = निश्छल
निः+ठुर = निष्ठुर
2.विसर्ग का र वर्ण में परिवर्तन-
जब पहले शब्द के अंत में विसर्ग हो और विसर्ग से पहले अ, आ को छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो तथा दूसरे शब्द के प्रारम्भ में कोई स्वर हो या क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग प वर्ग में से किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पांचवाँ वर्ण हो या य, ल, व, ह वर्ण हो तो विसर्ग र में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
निः+उपाय = निरुपाय
निः+विकार = निर्विकार
निः+जन = निर्जन
निः+मल = निर्मल
दुः+जन = दुर्जन
3.विसर्ग का ष वर्ण में परिवर्तन-
जब पहले शब्द के अंत में विसर्ग और विसर्ग के पहले इ, उ स्वर हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में क, ख, प, फ वर्ण हो तो विसर्ग ष वर्ण में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
परिः+कार = परिष्कार
निः+फल = निष्फल
4.विसर्ग का ओ स्वर में परिवर्तन-
जब प्रथम शब्द में विसर्ग हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में किसी वर्ग का तीसरा, चौथा या पांचवाँ वर्ण हो या य, र, ल, व, ह वर्ण हो तो विसर्ग ओ स्वर में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
सरः+ज = सरोज
मनः+रथ = मनोरथ
5.विसर्ग में किसी परिवर्तन का ना होना-
जब प्रथम शब्द के अंत में विसर्ग हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में क, ख, प, फ, स, श, ष हो तो विसर्ग में कोई परिवर्तन नहीं होता. केवल दोनों शब्दों को मिलाकर लिख देते हैं.
उदाहरण-
अंतः+करण = अंतःकरण
निः+शुल्क = निःशुल्क
6.विसर्ग का लोप होना-
विसर्ग संधि में दो अवस्थाओं में विसर्ग किसी वर्ण में परिवर्तित न होकर लुप्त हो जाता है. पहला जब प्रथम शब्द के अंत में विसर्ग और विसर्ग से पहले आ को छोड़कर कोई स्वर और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में र वर्ण हो. इस अवस्था में विसर्ग का लोप हो जाता है और लघु स्वर दीर्घ स्वर में परिवर्तित हो जाता है. दूसरा जब पहले शब्द के अंत में विसर्ग और विसर्ग से पहले अ स्वर हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में अ को छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो तो विसर्ग का लोप हो जाता है.
 उदाहरण-
निः+रस = नीरस
अतः+एव = अतएव
2.हिंदी भाषा के संधि नियमों द्वारा शब्द रचना-
क.महाप्राणीकरण-
जब पहले शब्द के अंत में कोई अल्पप्राण वर्ण(क, ग, ड़, च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म) हो और दूसरे शब्द के प्रारम्भ में ह वर्ण हो तो संधि के समय ह वर्ण का लोप हो जाता है और अल्पप्राण वर्ण महाप्राण वर्ण(ख, घ, छ, झ, ठ, ढ़, थ, ध, फ, भ) में परिवर्तित हो जाता है.
उदाहरण-
जब+ही = जभी
अब+ही = अभी
ख.अल्पप्राणीकरण-
जब पहले शब्द के अंत में महाप्राण वर्ण हो और संधि के समय वो अल्पप्राण वर्ण में परिवर्तित होता है; जैसे-
ताख+पर = ताक पर
दूध+वाला = दूद वाला
ग.वर्ण का लोप-
कभी-कभी दो शब्दों की संधि में किसी एक वर्ण का लोप हो जाता है.
उदाहरण-
वहाँ+ही = वहीं
वह+ही = वही
किस+ही = किसी
नक+कटा = नकटा
घ.लघुकरण-
सामासिक पदों में पहले शब्द का दीर्घ स्वर प्रायः लघु हो जाता है. इसके दो रुप होते हैं- पहला- जब प्रथम शब्द के पहले वर्ण का दीर्घ स्वर लघु स्वर में परिवर्तित होता है. दूसरा- जब प्रथम शब्द के अंतिम वर्ण का दीर्घ स्वर लघु स्वर में परिवर्तित होता है.
उदाहरण-
आम+चूर = अमचूर
हाथ+कंडा = हथकंडा
बहू+ऐं = बहुऐं
लड़का+पन = लड़कपन
ड़.सादृशीकरण-
जब प्रथम शब्द का अंतिम वर्ण और दूसरे शब्द का प्रथम वर्ण भिन्न होते हुये भी संधि द्वारा एक वर्ण में परिवर्तित हो जाते हैं.
उदाहरण-
पोत+दार = पोद्दार
च.स्वर परिवर्तन-
विशेष रुप से सामासिक पदों में प्रथम शब्द या दूसरे शब्द के किसी वर्ण का या दोनों शब्दों के वर्णों में स्वर परिवर्तित हो जाते हैं.
उदाहरण-
पानी+घाट = पनघट
घोड़ा+दौड़ = घुड़दौड़






 समास द्वारा निर्मित शब्द
समास का अर्थ है संक्षेप. जब दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर नया शब्द बनता है और उनके स्वरुप में कोई खास परिवर्तन नहीं होता, केवल संक्षिप्तता आती है तो उसे समास कहते हैं.
समास रचना में सामान्यता दो शब्द प्रमुख होते हैं. पहले पद को पूर्व पद और दूसरे पद को उत्तर पद कहते हैं. समास रचना से बना हुआ शब्द समस्तपद कहलाता है. समास के प्रयोग से भाषा में सटीकता व संक्षिप्तता आती है. जैसे- ‘राजा का महल’ जैसे तीन पदों के स्थान पर ‘राजमहल’ समास का प्रयोग अधिक स्पष्ट और संक्षिप्त है.
सामान्यतः समास और संधि में कोई विशेष अंतर नहीं है क्योंकि शब्दों को जोड़ने में प्रायः संधि के नियम भी लागू हो जाते हैं; किंतु फिर भी समास और संधि दोनों में मामूली सा अंतर है. समास में पहले दोनों का संबंध सूचक शब्द लुप्त हो जाता है; फिर यदि संधि का नियम लागू होगा, तो संधि होगी वरना दोनों शब्दों को या तो मिलाकर लिखा जायेगा या फिर शब्दों के बीच में सामासिक चिह्न(-) लगा दिया जायेगा.
उदाहरण-
राम का अवतार = राम अवतार= रामावतार
भाई और बहन = भाई-बहन

समास में दो पदों (शब्दों) के संयोग की चार प्रमुख स्थितियाँ होती हैं.
समास
द्वंद           बहुव्रीहि         तत्पुरुष              अव्ययी भाव
(दोनों पद       (दोनों पद       (पहला पद गौण,      (पहला पद प्रधान
प्रधान)          अप्रधान)        दूसरा प्रधान)              दूसरा गौण)
भाई-बहन       त्रिनेत्र          देशभक्ति            प्रतिदिन
1.द्वंद समास-
द्वंद समास में दोनों पद प्रधान होते हैं, इसमें समास के बनाते समय दोनों पदों के बीच का सम्बंध सूचक शब्द लुप्त हो जाता है और बीच में सामासिक चिह्न लग जाता है.
उदाहरण-
राम और कृष्ण = राम-कृष्ण
गाना और बजाना = गाना-बजाना
2.बहुव्रीहि समास-
बहुव्रीहि समास में दोनों पद ही अप्रधान होते हैं किंतु दोनों पदों द्वारा निर्मित शब्द किसी विशेष अर्थ को अभिव्यक्त करते हैं, ये अर्थ रुढ़ होते हैं. अतः इन्हें यौगिक रुढ़ शब्द भी कहते हैं.
उदाहरण-
नीला है कंठ जिसका = नीलकंठ अर्थात शिव
लम्बा है उदर जिसका = लम्बोदर अर्थात गणेश
3.तत्पुरुष समास-
तत्पुरुष समास में दूसरा पद प्रधान होता है और पहला पद विशेषण, उपमासूचक या संख्यावाची विशेषण होता है, इसी आधार पर इसके दो भेद होते हैं.
क.कर्मधारय समास
ख.द्विगु समास
क.कर्मधारय समास-
कर्मधारय समास में दूसरा पद प्रधान होता है और पहला पद विशेषण या उपमासूचक होता है.
उदाहरण-
महा+पुरुष = महापुरुष
चंद्रमा के समान मुख = चंद्र्मुख
ख.द्विगु समास-
द्विगु समास में भी दूसरा पद प्रधान होता है और पहला पद संख्यावाची विशेषण होता है.
उदाहरण-
चार राहें = चौराहा
तीन माह = तिमाही
4.अव्ययी समास-
अव्ययी समास में पहला पद अव्यय शब्द होता है, समस्त पद में अव्ययी भाव रहता है.
उदाहरण-
यथा+समय = यथासमय      (समय के अनुसार)
अकेला+अकेला = अकेला-अकेला  (बिल्कुल अकेला)



                                क्रमशः

Friday, March 22, 2019



क.  शब्द-परिचय
“शब्द क्रमबद्ध ध्वनियों का ऐसा समूह है जिसका एक निश्चित अर्थ होता है और उसकी स्वतंत्र सत्ता होती है”.
भिन्न-भिन्न भाषाओं में एक ही वस्तु के लिये अलग-अलग शब्दों का प्रयोग होता है; जैसे- पानी के लिये हिंदी में ‘जल’, तमिल में ‘तन्नी’, उर्दू में ‘आब’, अंग्रेजी में ‘वाटर’. कभी-कभी एक ही शब्द दो भिन्न भाषाओं में अलग-अलग अर्थ रखते हैं; जैसे- ‘कम’ शब्द हिंदी में न्यूनता के लिये आता है और अंग्रेजी में ‘आना’ क्रिया के लिये. शब्द के अर्थ हमें शब्द कोशों से प्राप्त होते हैं.
शब्दों की रचना के लिये वर्णों का निश्चित क्रम में होना आवश्यक है; जैसे- ‘कलम’ और कमल’. दोनों शब्दों में ‘क’, ‘ल’, ‘म’ तीन ही वर्ण हैं किंतु स्थान परिवर्तन के कारण दोनों शब्दों का अर्थ भिन्न है. जहाँ ‘कलम’ शब्द ‘पेन’ का पर्याय है, वहीं ‘कमल’ शब्द एक पुष्प का नाम है. कई बार वर्णों के स्थान परिवर्तन से न केवल अर्थ बदलता है, वरन शब्द निरर्थक भी हो जाते हैं; जैसे- ‘कलम’ की जगह मकल, लकम.
हिंदी भाषा की विशाल शब्द संपदा है, जिसके कारण आज हिंदी भाषा में सामान्य विषयों पर ही नहीं, वरन् वैज्ञानिक, गणितीय, तकनीकी, सांख्यिकी, आदि विषयों में भी पुस्तकें लिखी जा रही हैं. हिंदी भाषा की शब्द संपदा का अध्धयन हम निम्नलिखित विषयों को आधार बनाकर कर सकते हैं-


1.  रचना के आधार पर
2.  अर्थ के आधार पर
3.  व्याकरणिक विवेचन के आधार पर
4.  स्रोत/इतिहास के आधार पर
5.  प्रयोग के आधार पर

रचना के आधार पर-
क.  सामान्य शब्द
ख. उपसर्ग द्वारा निर्मित शब्द
ग.   प्रत्यय द्वारा निर्मित शब्द
घ.   संधि द्वारा निर्मित शब्द
ङ.    समास द्वारा निर्मित शब्द
च.   ध्वनि अनुकरण द्वारा निर्मित शब्द
क.  सामान्य शब्द-
सामान्य शब्द दो या दो से अधिक वर्णों से मिलकर बनते हैं और इनका एक निश्चित अर्थ होता है, इसलिए इन्हें रूढ़ शब्द भी कहते हैं; जैसे-‘जल’, ‘कमल’, आदि. कभी-कभी एक ही वर्ण शब्द के रूप में प्रयुक्त होता है और उसका एक निश्चित अर्थ होता है; जैसे- ‘न’ और ‘व’. ‘न’ ‘नहीं’ के अर्थ में आता है और ‘व’ ‘और’ के लिये.
ख. उपसर्ग द्वारा निर्मित शब्द-
कुछ शब्द हमेशा किसी अन्य शब्द के प्रारंभ में जुड़कर आते हैं और उस शब्द को नया अर्थ प्रदान करते हैं, किंतु उनका प्रयोग स्वतंत्र इकाई के रूप में नहीं होताहै. ये ‘उपसर्ग’ कहलाते हैं. ‘उपसर्ग’ से निर्मित शब्दों की चार दशाएँ हो सकती हैं-
  
1. शब्द का अर्थ ठीक विपरीत हो सकता है; जैसे ‘ज्ञान’ शब्द में ‘अ’ उपसर्ग लगकर ‘अज्ञान’ शब्द बनता है जो  ज्ञान के ठीक विपरीत अर्थ ’अज्ञानता’ का अर्थ प्रकट करता है.
2. शब्द का अर्थ बदल सकता है; जैसे- ‘हार’ शब्द में ‘प्र’ उपसर्ग लगकर ‘प्रहार’ शब्द बनता है, जिसका ‘हार’ शब्द के अर्थ से कोई भी संबंध नहीं है. ‘हार’ शब्द का एक अर्थ युद्ध या प्रतियोगिता में ‘हारने’ से है, वहीं दूसरा अर्थ फूलों या मोतियों की ‘माला’ से है. वहीं ‘प्रहार’ शब्द का अर्थ किसी जीव पर किसी आयुध से ‘वार’ करने से है.
3. शब्द का अर्थ तो वही रहे, लेकिन उसके अर्थ में विशिष्टता आ सकती है; जैसे- ‘भ्रमण’ शब्द में ‘परि’ उपसर्ग लगकर ‘परिभ्रमण’ शब्द बनता है. ‘भ्रमण’ शब्द जहाँ सामान्य घूमने के अर्थ में प्रयुक्त होता है वहीं ‘परिभ्रमण’ शब्द किसी विशेष उद्देश्य से किये गये भ्रमण के लिये प्रयुक्त होता है.
4. शब्द के अर्थ में कोई परिवर्तन न हो; जैसे- ‘शेष’ शब्द में ‘अव’ उपसर्ग लगकर ‘अवशेष’ शब्द बनता है. ‘शेष’ और ‘अवशेष’ दोनों शब्दों का समान ही अर्थ है.

हिंदी भाषा में मुख्यतः तीन प्रकार के उपसर्ग प्रचलित हैं-

अ.  संस्कृत उपसर्
आ.           हिंदी उपसर्ग
इ.    विदेशी उपसर्ग
अ.  संस्कृत उपसर्ग-
संस्कृत उपसर्गों का प्रयोग तत्सम शब्दों के साथ ही होता है अर्थात जो शब्द संस्कृत भाषा से हिंदी भाषा में शुद्ध रूप में आये हैं. जैसे-

उपसर्ग          अर्थ                शब्द     
अति           अधिक          अत्यंत, अत्युक्ति, अतिक्रमण
अव            पतन                अवनत, अवगत, अवलोकन
प्र         अधिक, ऊपर, आगे    प्रयोग, प्रस्थान, प्रमाण, प्रसिद्ध
सम       पूर्णतः संयोग         संकल्प, संग्रह, संस्कार
वि        भिन्न, विशेष         विवाद, विवेक, विशेष

आ.                       हिंदी उपसर्ग

हिंदी भाषा में अधिकांशतः संस्कृत उपसर्गों का प्रयोग होता है, किंतु कुछ अपने भी उपसर्ग हैं जिनका प्रयोग हिंदी में स्वयं निर्मित शब्दों के पूर्व किया जाता है; जैसे-
उपसर्ग              अर्थ                शब्द     
अध                आधा           अधखिला, अधपका, अधमरा
उन                 एक कम        उन्नीस, उनतीस, उनसठ
भर                 पूरा, ठीक       भरपेट, भरसक, भरमार
प्रति           विरोध, परिवर्तन       प्रतिकूल, प्रतिकार, प्रतिनिधि, प्रत्येक
पर                 दूसरा           पराधीन, परदेश
औ            निषेध, हीनता         औगुण, औसर

इ. विदेशी उपसर्ग
हिंदी भाषा में अरबी, फारसी, उर्दु, अंग्रेजी, आदि अनेक भाषाओं के शब्द प्रयोग में लाये जाते हैं, इन शब्दों की रचना में इन्हीं भाषा के उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं; जैसे-
उपसर्ग              अर्थ                     शब्द          
ब(फारसी)       के साथ/से                     बखूबी, बदौलत
बे(फारसी)            बिना                बेईमान, बेतुका
ला(अरबी)            नहीं/अभाव           लाजबाब, लावारिस
हैड(अंग्रेजी)                प्रमुख               हैड मास्टर, हैड मिस्ट्रेस
खुश(उर्दु)                 अच्छा               खुशबू, खुशकिस्मत
हम(उर्दु)                  बराबर               हमवतन, हम उम्र

ग.   प्रत्यय द्वारा निर्मित शब्द-
कुछ शब्द हमेशा किसी अन्य शब्द के अंत में जुड़कर आते हैं और उस शब्द को नया अर्थ प्रदान करते हैं. ‘उपसर्ग’ की भाँति इनका प्रयोग भी स्वतंत्र इकाई  के रूप में नहीं होता है, ये प्रत्यय कहलाते हैं.
उदाहरण- ‘जल’ शब्द में ‘ज’ प्रत्यय लगा देने से ‘जलज’ शब्द बना. ‘जल’ का अर्थ है पानी और ‘ज’ का अर्थ है जन्म लेने वाला. ‘जलज’ शब्द का अर्थ हुआ जल से उत्पन्न होने वाला. ‘जलज’ शब्द जल से उत्पन्न किसी भी वस्तु के लिये प्रयुक्त नहीं होता, वरन ‘कमल’ शब्द के लिये रूढ़ है.



प्रत्यय दो प्रकार के होते है-
1.  कृत प्रत्यय
2.  तद्धित प्रत्यय
1.  कृत प्रत्यय-
जो प्रत्यय धातुओं के अंत में लगते हैं, वे कृत प्रत्यय कहलाते हैं. कृत प्रत्यय के योग से बने शब्दों  को कृदंत कहते हैं; ‘लिख’ धातु में ‘आवट’ प्रत्यय लगने से लिखावट शब्द बनता है.
कृत प्रत्यय पाँच प्रकार के होते हैं—
अ.  कर्तृवाचक कृदंत
आ.           कर्मवाचक कृदंत
इ.    करण वाचक कृदंत
ई.    भाव वाचक कृदंत
उ.    क्रिया वाचक कृदंत
अ.  कर्तृ वाचक कृदंत-
जिस प्रत्यय से बने कार्य करने वाले अर्थात कर्त्ता का बोध हो, वह कर्तृ वाचक कृदंत कहलाते हैं. जैसे- ‘पढ़्ना’ सामान्य क्रिया के साथ ‘वाला’ प्रत्यय लगने से पढ़्ने वाला शब्द बना.
अन्य उदाहरण-
धातु              प्रत्यय               शब्द
पालना            हारा                पालनहारा
गय              अक                गायक
भिक्ष             उक                 भिक्षुक
खेल              आड़ी                खिलाड़ी    22.
आ.           कर्म वाचक कृदंत-
जिस प्रत्यय से बने शब्द से किसी कर्म का बोध हो, वह कर्म वाचक कृदंत कहलाते हैं ‘गा’ धातु में ‘आना’ प्रत्यय लगने से ‘गाना’ शब्द बना.
अन्य उदाहरण-
धातु                     प्रत्यय                    शब्द     
सूँघ                     नी                      सूँघनी
पूज                     आ                      पूजा
बिछ                     औना                    बिछौना
ओढ़                     ना                      ओढ़्ना
इ.    करणवाचक कृदंत-
          जिस प्रत्यय से बने शब्द से क्रिया के साधन अर्थात करण का बोध हो, वह करण वाचक कृदंत कहलाते हैं; जैसे ‘बेल’ धातु में ‘न’ प्रत्यय लगने से ‘बेलन’ शब्द बनता है, जो रोटी बनाने का एक साधन है.
अन्य उदाहरण-
धातु                     प्रत्यय               शब्द     
झूल                     आ                 झूला
झाड़                     ऊ                  झाड़ू
23.
धौंक                     नी                 धौंकनी
सुमर                    नी                 सुमरनी
ई.    भाव वाचक कृदंत-
          जिस प्रत्यय से बने श्ब्द से भाव अर्थात क्रिया के व्यापार का बोध हो, वह भाव वाचक कृदंत कहलाता है; जैसे- ‘मिल’ धातु में ‘आप’ प्रत्यय लगने से ‘मिलाप’ शब्द बनता है जो आपस में मेल भाव का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
धातु                प्रत्यय               शब्द     
चढ़                 आव                चढ़ाव
सज                आवट               सजावट
कम                आई                कमाई
थक                आवट               थकावट
उ.    क्रिया वाचक कृदंत-
जिस प्रत्यय से बने शब्द से क्रिया के होने का भाव प्रकट हो, वह क्रिया वाचक कृदंत कहलाते हैं. इसमें मूल धातु के साथ ‘ता’ लगाकर, बाद में ‘हुआ’ लगा देने से वर्तमानकालिक क्रिया वाचक कृदंत बनते हैं; जैसे- ‘लिखता हुआ’ में ‘लिख’ धातु के साथ ‘ता’ प्रत्यय लगा है और बाद में ‘हुआ’ शब्द आया है. क्रिया वाचक कृदंत केवल पुल्लिंग और एक वचन में प्रयुक्त होता है.

2. तद्धित प्रत्यय-
जो प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम, या विशेषण के अंत में लगकर नये शब्द बनाते हैं, वे  तद्धित शब्द कहलाते हैं. जैसे- ‘टोपी’ एक वस्तु का नाम है, इसमें ‘वाला’ प्रत्यय लगकर ‘टोपीवाला’ शब्द बनता है, यह तद्धित शब्द है.
तद्धित प्रत्यय आठ प्रकार के होते हैं-
क.  कर्तृ वाचक तद्धित
ख. भाव वाचक तद्धित
ग.   सम्बंध वाचक तद्धित
घ.   लघुता वाचक तद्धित
ङ.    गणना वाचक तद्धित
च.   सादृश्य वाचक तद्धित
छ.  गुण वाचक तद्धित
ज.  स्थान वाचक तद्धित
क.  कर्तृ वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों के अंत में प्रत्यय लगकर ऐसे शब्द का निर्माण करते हैं, जिससे किसी कार्य के करने वाले का बोध हो, तो वे शब्द कर्तृ वाचक तद्धित कहलाते हैं; जैसे- ‘गाड़ी’ शब्द में ‘वाला’ प्रत्यय लगकर ‘गाड़ीवाला’ शब्द बना, जो गाड़ी चलाने वाले के लिये प्रयुक्त होता है.
अन्य उदाहरण-

संज्ञा/विशेषण              प्रत्यय               शब्द 
सुख                इया                सुखिया
तेल                 ई                  तेली
सोना                आर                सुनार
दुकान               दार                 दुकानदार

ख. भाव वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण शब्दों के अंत में प्रत्यय लगकर ऐसे शब्द का निर्माण करते हैं, जिससे किसी भाव का बोध हो, तो वे शब्द भाव वाचक तद्धित कहलाते हैं. जैसे- ‘अरूण’ शब्द में ‘इमा’ प्रत्यय लगकर ‘अरूणिमा’ शब्द बनता है, जो सूर्योदय के समय आकाश में छाई अरूणिमा(लालिमा) का भाव अभिव्यक्त करता है.
अन्य उदाहरण-

संज्ञा/सर्वनाम/विशेषण        प्रत्यय          शब्द     
कड़वा                    आहट          कड़वाहट
बूढ़ा                     पा             बुढ़ापा
गर्म                     ई             गर्मी
भला                     आई           भलाई
अपना                    पन            अपनापन

ग.    सम्बंध वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा, विशेषण शब्दों के अंत में प्रत्यय लगकर बने शब्द किसी सबंध का बोध कराते हैं, तो वे सम्बंध वाचक तद्धित कहलाते हैं. जैसे-
26.

‘ससुर’ शब्द में ‘आल’ प्रत्यय लगने से ‘ससुराल’ शब्द बनता है. जो पति
और पत्नी का क्रमशः पत्नी और पति के घर से उसके सम्बंध का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
संज्ञा                प्रत्यय               शब्द     
       नाना              हाल                ननिहाल
       भाई/भातृ           जा                 भतीजा

घ.   लघुता वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा या विशेषण शब्दों के अंत में प्रत्यय लगकर बने शब्द, पूर्व शब्द के लघु रूप का बोध कराते हैं, तो वे लघुता वाचक तद्धित कहलाते हैं. जैसे- ‘लोटा’ शब्द में ‘इया’ प्रत्यय लगकर ‘लुटिया’ शब्द बनता है, जो ‘लोटा’ के लघु रूप का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
संज्ञा                प्रत्यय               शब्द 
खाट                इया                खटिया
कोठा                री                  कोठरी
ढ़ोलक               ई                  ढ़ोलकी
पाग                ड़ी                  पगड़ी

ड़. गणना वाचक तद्धित-
जब किसी संख्या वाचक विशेषण शब्द के अंत में प्रत्यय लगकर संख्या के  किसी विशेष क्रम या विशेष रूप का बोध कराते हैं, तो वे गणना वाचक प्रत्यय कहलाते हैं. जैसे- ‘एक’ शब्द में ‘हरा’ प्रत्यय लगकर ‘इकहरा’ श्ब्द बनता है, जो किसी वस्तु की एक पर्त की गणना का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
विशेषण              प्रत्यय               शब्द
तीन                हरा                 तिहरा
दो                  रा                  दूसरा
चार                 था                 चौथा
पाँच                वाँ                  पाँचवा
च.सादृश्य वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा, विशेषण शब्द के अंत में प्रत्यय लगकर, पूर्व शब्द की विशेषता से समता का बोध कराते हैं, तब वे सादृश्य वाचक तद्धित कहलाते हैं. जैसे- ‘पीला’ शब्द में ‘सा’ प्रत्यय लगकर ‘पीला सा’ शब्द बनता है जो किसी ऐसी वस्तु का बोध कराता है जिसका रंग पीले रंग के समान हो.
अन्य उदाहरण-
विशेषण                  प्रत्यय               शब्द
नीला                    सा                 नीला सा
सोना                    हरा                 सुनहरा


छ.  गुण वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा, विशेषण के अंत में प्रत्यय लगकर ऐसे शब्द बनते कहलाते हैं. जैसे- ‘दया’ शब्द में ‘लु’ प्रत्यय लगने से ‘दयालु’ शब्द बनता है जो किसी व्यक्ति के अंदर निहित दया के गुण का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
संज्ञा/विशेषण              प्रत्यय          शब्द 
धन                 वान            धनवान
रंग                 ईला            रंगीला
विष                ऐल            बिषैला
वांछना              ईय            वांछनीय
ज.  स्थान वाचक तद्धित-
जब किसी संज्ञा शब्द के अंत में प्रत्यय लगकर विशेषण बनते हैं और स्थान विशेष का बोध कराते हैं, तो वे स्थान वाचक तद्धित कहलाते हैं.जैसे- ‘पंजाब’ शब्द में ‘ई’ प्रत्यय लगकर ‘पंजाबी’ शब्द बनता है, जो पंजाब में रहने वाले व्यक्ति विशेष या अन्य किसी वस्तु का बोध कराता है.
अन्य उदाहरण-
संज्ञा                प्रत्यय               शब्द
          लखनऊ              वी                  लखनवी
          दिल्ली               वाला                दिल्ली वाला
            
विशेष-
1.कृत प्रत्यय और तद्धित प्रत्यय में मुख्य अंतर है-
कृत प्रत्यय धातु या क्रिया के अंत में जुड़कर शब्द बनाते हैं, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण में जुड़कर शब्द बनाते हैं.
2.’ई’ और ‘आनी’ जैसे कुछ महत्वपूर्ण प्रत्यय हैं, जो पुल्लिंग शब्दों के साथ लगकर उसे स्त्रीलिंग में परिवर्तित कर देते हैं.
जैसे-
चाचा‌+ई = चाची
सेठ+आनी = सेठानी

                                  क्रमशः