Thursday, November 17, 2022

 


कवि विद्यापति गंगा मैय्या के बहुत बड़े भक्त थे. अन्त समय स्वयं गंगा मैय्या दस कोस चलकर कवि के पास तक आयीं थीं उस समय जो कवि ने रचना की प्रस्तुत है-

 

बड़ सुखसार पाओल तुअ तीरे।

छोड़इत निकट नयन बह नीरे।।

करनोरि बिलमओ विमल तरंगे।

पुनि दरसन होए पुनमति गंगे।।

एक अपराध होए छमब मोर जानी।

परमल माए पाए तुम पानी।।

कि करब जप-तप जोग-धेआने।

जनम कुतारथ एकहिं सनाने।।

भनई विद्यापति समदजों तोही।

अन्तकाल जनु बिसरह मोही।।

 

                       विद्यापति

 

 

 

 

 

 

 

ग. रीति काल

Wednesday, November 16, 2022


जीवन खिले तो खिले ऐसे जैसे खिले डाल पर फूल,

उपवन को सजाये और पवन को महकाये।

यश फैले तो फैले ऐसे जैसे फैलें प्रातः की किरणें

अंधकार को दूर करें और उजियारा फैलायें।।


                  डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

 

  

Tuesday, November 15, 2022


गीत

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

शरद सुहावनि आई रे

नया रंग भर लाई रे।

 

पत्तों पे हरियाली है

कली-कली मुस्काई है,

बादल उड़ते-फिरते रहते

कभी धूप, कभी छाँव है।

 

नदिया की धारा को देखो

मन्द-मन्द सी बहती है,

क्यूँ तेरे मेरे मन में

उथल-पुथल सी होती है।

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प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने अपने आत्म सम्मान का वर्णन किया है- एक बार अकबर ने कुम्भनदास को फतेहपुर सीकरी बुलाया, कवि राजा की भेजी हुई सवारी पर न जाकर पैदल ही गये और जब राजा ने कुछ गायन सुनने की इच्छा प्रकट की तो कवि ने गाया-

 

भक्तन को कहा सीकरी सों काम।

आवत जात पनहिया टूटी बिसरि गयो हरि नाम।

जाको मुख देखे दुख लागे ताको करन करी परनाम।

कुम्भनदास लाला गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम।

 

                        कुम्भनदास


Monday, November 14, 2022


जग विष भी देगा तो अमृत हो जायेगा।

मीरा की तरह दीवानी हूँ मैं तेरे नाम की।।


डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, November 13, 2022


सुबह सुहानी धूप है, रात मधुर है चाँदनी।

प्रिय! मुस्कान तुम्हारी है जीवनदायिनी।।


                         डॉ. मंजूश्री गर्ग

Saturday, November 12, 2022

 

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने भगवान राम के प्रति अपनी भक्ति भावना को अभिव्यक्त किया है-

राम सो बड़ो है कौन, मोसों कौन छोटो?

राम सो खरो है कौन, मोसों कौन खोटो?

                         तुलसीदास

 

कहाँ जाऊँ कासों कहौं, और ठौर न मेरो।

जनम गँवायो तेरे हि द्वारे, मैं किंकर तेरा।

                         तुलसीदास