नववर्ष 2024 की हार्दिक शुभकामनायें
नई किरण है, ज्योति नई।
नई उमंगें, नई तरंगें,
नई आस है, सांस नई।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
कौन रोकेगा?
सूरज की चमक
औ' कब तक।
डायनासोर
डायनासोर से
कंक्रीट के जंगल
धीरे-धीरे खाने लगे
नदी से रेत
पर्वत से पत्थर
वन से लकड़ी
खानों से लोहा।
धीरे-धीरे धरती पे
बढ़ने लगा प्रकृति का कोप
आने लगीं बाढ़ें
होने लगे झंझावात
भूकंप, सुनामी
रोज की सी बातें।
शिशिर ऋतु
कपँकपाती सर्दी
मन डरा सा।
नदी मिले तो
सागर हरषाये
महामिलन।
लालिमा लिये
साँझ का सूरज औ'
ज्यादा दमके।
आँख-मिचौली खेलोगे
यूँ ही कब तक प्रिये!
एक दिन करना ही होगा
समर्पण तुमको प्रिये!