पतझड़ है, आँधियाँ नहीं, गिरायेंगी सूखे पात ही।
नव कोंपलें मुस्कायेंगी, पहनेंगे पेड़ नव दुकूल।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
प्रीत की रूनझुन सी पायल बँधी जिंदगी से।
मुस्कुराने लगी सुबह, गुनगुनाने लगी रात।।
बनोगे संत
अहंकार अपना
तोड़ो तो सही।
पक्षी समूह
तीर सा बनाकर
उड़ा आकाश।
माघ बरसे
मानों गेहूँ के खेतों
सोना बरसे।
अश्रु जो बह नहीं पाये,
शब्द रूप में मोती बन गये।
तेरी बाहों के घेरे में,
आबद्ध है मेरा सारा जीवन।