स्नेह का धागा, संवाद की सुईं और क्षमा की दो बूँदें
जीवन की चादर में उधड़ते रिश्तों की तुरपाई कर देती हैं।
अरूण गोविल
अभी अपना चेहरा आँचल में छुपा लो तुम।
ख्वाबों में मिले हो हमसे ये राज छुपा लो तुम।।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
आने को कहा है
जब से तुमने
एक-एक पल
इन्तजार का
कट रहा है
मुश्किल में।
घड़ी-घड़ी
घड़ी देखती हूँ।
एक पल उमंग
एक पल उदासी
छा रही है
मन-मन्दिर में।
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हो आदि शक्ति तुम ही
निराकार हो या साकार तुम,
हो आदि शक्ति तुम ही।
नदियाँ इठलाती चलतीं,
फलती-फूलती प्रकृति तुम से ही।
गृह-नक्षत्र रहते घूमते,
चाँद चाँदनी बरसाता तुम से ही।
लीन प्रलय में होकर एक दिन,
नव जीवन सब पाते तुम से ही।
चैत्री नवरात्र की हार्दिक शुभकामनायें।
तेरी ही गंध से
धूप, दीप, चंदन,
अक्षत रखे हैं थाल में।
अर्ध्य देने को आतुर
हैं नयन हमारे।
प्रिय! बीत गया विरह का मौसम
बासंती मौसम आ गया।
बासंती गंध से महक रहे
राजपथ के गलियारे।
दिल के गलियारे महकें
तेरी ही गंध से।
तेरी जुल्फों के साये में शामें सुहानी हैं,
हैं रोशन रातें तेरी ही मुस्कानों से।
बज उठते हैं जब तेरी यादों के घुँघरू
जिंदगी कई सरगमें सुनाती है हमें।।