Thursday, May 9, 2024

बाँस


 

डॉ. मंजूश्री गर्ग

बाँस, ग्रामिनीई कुल की एक घास है जो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में पायी जाती है. बाँस में प्रकृति को संरक्षित करने का अद्भुत गुण है. इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी होती है. छोटी-छोटी घरेलू वस्तुओं से लेकर मकान बनाने तक काम आती है.

 

बाँस का नया उगा पौधा खाने के काम आता है, इसका अचार और मुरब्बा भी पड़ता है. बाँस में अधिक कार्बोहाइड्रेट होने से यह स्वास्थ्यवर्धक भी है. अन्य पौधों की अपेक्षा बाँस का पेड़ अधिक ऑक्सीजन छोड़ता है. साथ ही यह पीपल के पेड़ की तरह दिन में कार्बन डाईऑक्साइड खींचता है और रात में ऑक्सीजन छोड़ता है.

 

बाँस की खेती आर्थिक दृष्टि से भी उपयोगी होती है. एक बार बाँस बोने के बाद पाँच साल बाद उपज देने लगते हैं. यह पृथ्वी पर सबसे तेज बढ़नेवाले पौधों में से एक है. एक दिन में 121 से0मी0 तक इसकी लम्बाई बढ़ जाती है, कभी-कभी कुछ प्रजातियों में इसके बढ़ने की गति 1 मी0 प्रति घंटा हो जाती है. इसका तना लम्बा, गाँठदार, प्रायः खोखला और अनेक शाखाओं वाला होता है तने की निचली गाँठों से जड़ें निकलती हैं जो रेशेदार होती हैं इसकी पत्तियाँ लम्बी और नुकीली होती हैं. जब बाँस में फूल खिलते हैं तो उसका जीवन समाप्त हो जाता है. सूखे तने गिरकर रास्ता बंद कर देते हैं, अगले वर्ष वर्षा के बाद बीजों से नयी कलमें फूटती हैं और जंगल फिर हरा हो जाता है.

 

बाँस का जीवन एक वर्ष से पचास वर्ष तक का होता है, जब तक की फूल नहीं खिलते. फूल बहुत ही छोटे, रंगहीन, बिना ठंडल के छोटे-छोटे गुच्छों में पाये जाते हैं. साधारणतः बाँस तभी फूलता है जब सूखे के कारण खेती मारी जाती है और दुर्भिक्ष पड़ता है. शुष्क एवम् गरम हवा के कारण पत्तियों के स्थान पर कलियाँ खिलती हैं. फूल खिलने पर पत्तियाँ झड़ जाती हैं. बहुत से बाँस एक वर्ष में फूलते हैं. ऐसे बाँस भारत में नीलगिरि की पहाड़ियों में पाये जाते हैं. यदि फूल खिलने का समय ज्ञात हो तो काट-छाँट कर फूलने की प्रक्रिया को रोका जा सकता है.

 

बाँस के द्वारा कागज भी बनाया जाता है. यूनान और भारत में दवाईयाँ बनाने के लिये भी बाँस का प्रयोग किया जाता है.

 

फेंगशुई में बाँस का बहुत अधिक महत्व है इसे घरों में सौभाग्य सूचक माना जाता है. काँच के छोटे बर्तन में थोड़ा पानी भरकर, कुछ बाँस की कलमों को लाल रिबन से बाँधकर रखा जाता है. बर्तन में थोड़े से पत्थर भी डाले जाते हैं. इस तरह से फेंगशुई में इस गमले को लकड़ी(बाँस), पृथ्वी(पत्थर), जल, अग्नि(लाल रिबन), धातु(काँच का बर्तन) का प्रतीक माना जाता है.

 

 

 

Wednesday, May 8, 2024

कमल पुष्प

 


डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

कमल हमारा राष्ट्रीय पुष्प है. कमल का फूल देखने में मनमोहक व अधिकांशतः गुलाबी रंग का अति सुन्दर फूल होता है. हिन्दी साहित्य में प्रारम्भिक काल से कवि नायक या नायिका के सुन्दर नयनों की, अधरों की, करों की, पदों की उपमा कमल से देते रहे हैं. भक्तिकाल के कवि सूर और तुलसी ने भी अपने-अपने आराध्य देव कृष्ण और राम के रूप का वर्णन करते समय कमल की उपमा का प्रयोग किया है.

उत्तर प्रदेश में काशीपुर में द्रोणासागर नामक स्थान पर ग्रीष्म काल में कमल-सरोवर का सौन्दर्य देखते ही बनता है, जब द्रोणासागर में कमल के फूल अपने पूर्ण यौवन के साथ खिले होते हैं. इस समय मन्दिरों में भगवान की मूर्तियों पर प्रायः कमल के फूल ही चढ़े हुये देखने को मिलते हैं.

कमल के फूल सुन्दर होने के साथ-साथ बहुपयोगी भी होते हैं. कमल के फूलों के तने जहाँ कमल ककड़ी के नाम से जाने जाते हैं वहीं कमल के फल भी खाने में स्वादिष्ट होते हैं. फलों के अन्दर के बीज कमल गट्टे कहलाते हैं जो पककर काले और भूरे रंग के हो जाते हैं. एक तरफ कमल गट्टे भगवान शिव की पूजा करते समय शिव-लिंग पर चढ़ाये जाते हैं तो दूसरी तरफ कमल गट्टों से ही मखाने बनाये जाते हैं.


Tuesday, May 7, 2024

वैनिला (vanilla)


 

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

वैनिला की फसल सर्वप्रथम मैक्सिको के गुल्फकोस्ट घाटी में पाई गयी. आजकल मेडागास्कर में सबसे अधिक उत्पादन होता है. विश्व का लगभग अस्सी प्रतिशत वैनिला का उत्पादन मेडागास्कर में ही होता है.

 

वैनिला बेल जैसे उगती है और किसी पेड़ या खम्भे के सहारे चढ़ती है. वैनिला के फूल हल्के पीले रंग के होते हैं. एक फूल से एक ही फल बनता है. फूल में नर(Anther) और मादा(Stigma) दोनों अंग होते हैं जो एक हल्की सी झिल्ली से जुड़े रहते हैं. पहले एक विशेष मधुमक्खी के द्वारा Pollination की क्रिया होती थी जो मैक्सिको में ही पाई जाती हैं किन्तु अभी कृत्रिम तरीके से हाथ द्वारा Pollination करके फसल उगायी जाती है. वैनिला की फली गहरे भूरे रंग की होती है. जब यह फली पक जाती है, तो फटने से पहले ही इन्हें तोड़ लिया जाता है. इन फली(beans) के अन्दर गहरा लाल रंग का तरल पदार्थ होता है, यही(vanilla essence) होता है, जो कि बहुत मँहगा होता है. मसालों में केसर के बाद vanilla essence का नंबर आता है, किंतु आजकल synthetic vanilla essence भी बाजार में उपलब्ध है.

 

 

 

 

Monday, May 6, 2024

कॉफी बीन्स्


 

डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

 

कॉफी के पेड़ पर चैरी की तरह के फल लगते हैं, उसका बीज कॉफी बीन्स् कहलाता है. अधिकतर कॉफी चैरी में दो बीज होते हैं, किन्तु कुछ कॉफी चैरी में एक बीज भी होता है. कॉफी का पेड़ लगभग दस से बीस फुट तक ऊँचा होता है. कॉफी के पेड़ पर तीन-चार साल में फल आने लगते हैं.

 

कॉफी दो प्रकार से तैय्यार की जाती है-

 

1.     कॉफी चैरी को पानी में भिगोकर उनका गूदा बीन्स् से अलग किया जाता है, फिर उन बीन्स् को धूप में सुखाकर, भूनकर, पीसकर कॉफी पाउडर तैय्यार किया जाता है.

 

2.     कॉफी चैरी को ऐसे ही धूप में सुखाकर फिर बीन्स् को गूदे से अलग करके, भूनकर, पीसकर कॉफी पाउडर तैय्यार किया जाता है.




Sunday, May 5, 2024

कोको पाउडर (चॉकलेट पाउडर)


 डॉ. मंजूश्री गर्ग

कोको पाउडर हमें कोको बीन्स् से मिलता है. कोको बीन्स् का पेड़ सबसे पहले अमेरिका में पाया गया. आजकल अफ्रीका में सबसे ज्यादा कोको बीन्स् की खेती होती है. कोको बीन्स् के फल कटहल(jackfruit) के फल की तरह सीधे मुख्य तने या बड़ी शाखाओं में लगते हैं. फल भी आकार में काफी बड़े होते हैं. फल के अन्दर बीस से तीस बड़े आकार के कत्थई या जामुनी रंग के बीज होते हैं यही कोको बीन्स् कहलाते हैं. कोको बीन्स् के फल का बाहरी छिलका उतारकर गूदे सहित कोको बीन्स् को खमीर उठाने के लिये रख दिया जाता है. बाद में कोको बीन्स् को गूदे से अलग कर दिया जाता है. कोको बीन्स् को सुखाने के बाद पीस लिया जाता है. यही कोको पाउडर(चॉकलेट पाउडर) कहलाता है.

-------------------------------------------------------------------

 

 

 

 


Saturday, May 4, 2024


 

अमलतास


डॉ. मंजूश्री गर्ग

पीताभ गुच्छ

झमरों से झूमते

अमलतास।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

गर्मियों के दिनों में सड़क किनारे या पार्कों में लगे गुच्छों के रूप में खिले पीले फूलों से लदे अमलतास के पेड़ बरबस ही मन मोह लेते हैं. इसके सौंदर्य को देखते हुये  इसे विभिन्न नामों से अलंकृत किया गया है. आयुर्वेद में इसे स्वर्ण वृक्षकहते हैं. वाल्मीकि जी ने इसे कंचन वृक्ष नाम दिया. अंग्रेजी में इसे गोल्डन शॉवर या गोल्डन ट्री कहा जाता है. अमलतास थाइलैंड का राष्ट्रीय पुष्प है और थाइलैंड की भाषा में इसे डोक ख्यून नाम से जाना जाता है.

 

अमलतास मूल रूप से दक्षिणी एशिया, दक्षिणी पाकिस्तान और भारत का वृक्ष है पर अमेरिका, म्यांमार, श्रीलंका, बर्मा, वेस्टइंडीज में भी बहुतायत से पाया जाता है. यह सूर्य प्रिय वृक्ष है जो लवण और अकाल की स्थिति को भी सह सकता है. बीज का अंकुरित होना थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन बीज एक बार जड़ पकड़ लें तो अमलतास के पेड़ आसानी से बड़े हो जाते हैं. अमलतास को रूखा मौसम ज्यादा पसंद है परंतु जरा सी भी सर्दी बर्दाश्त नहीं कर पाता.

 

 

 

 

अमलतास मध्यम आकार का वृक्ष है जिसकी लम्बाई 10 मी. से 20 मी. तक होती है. अमलतास के पत्ते एक से ड़ेढ़ फुट लंबे, बड़े व संयुक्त होते हैं, चार से

आठ पत्ते मिलकर जोड़े बनाते हैं. फूलों के आगमन से पहले मार्च, अप्रैल के महीने में पत्तियाँ झड़ने लगती हैं. अमलतास का फूल अप्रैल, मई, जून महीनों (भीषण गर्मी के समय) खिलता है. अमलतास का फूल पीले रंग का होता है, प्रत्येक फूल में पाँच पँखुरियाँ होती हैं जो 4 से. मी. से 7 से. मी. के व्यास में सुव्यवस्थित होती हैं. अनेकों फूल मिलकर एक गुच्छे का रूप देते हैं. बारिश के मौसम में अमलतास पर फल आते हैं. इसके फल को लेग्यूम कहते हैं जो लगभग 30 से. मी. से 60 से. मी. लंबे फली के आकार के होते हैं. लेग्यूम की गंध बड़ी तीखी होती है. एक फली में 25 से 100 तक भूरे रंग के बीज होते हैं. इसके बीज बहुत स्वादिष्ट होते हैं इसलिये इनमें कीड़ा लगने का डर भी रहता है. फली के अन्दर का गूदा काले रंग का होता है तथा बहुत ही मीठा होता है. यह गूदा पेट साफ करने के लिये दवा के रूप में भी प्रयोग किया जाता है.

 

अमलतास की लकड़ी भूरा रंग लिये होती है तथा मजबूत, भारी व स्थायी होने के कारण फर्नीचर बनाने के काम भी आती है. इस प्रकार अमलतास का पेड़ न केवल सौंदर्य की दृष्टि से, वरन् उपयोग की दृष्टि से भी लाभकारी है.

 

 

 


Friday, May 3, 2024


केसर 


डॉ. मंजूश्री गर्ग


केसर एक अनमोल वनस्पति है. उर्दू भाषा में इसे जाफरान और अंग्रेजी भाषा में सैफरन कहते हैं. विश्व में केसर उगाने वाले प्रमुख देश हैं- फ्रांस, स्पेन, भारत, ईरान, इटली, ग्रीस, जर्मनी, रूस, आस्ट्रेलिया एवम् स्विजरलैंड. विश्व का 80 प्रतिशत केसर स्पेन और ईरान में उगाया जाता है. पहले भारत के कश्मीर राज्य में भी केसर उगाया जाता था, किंतु आतंकी गतिविधियों के कारण केसर की खेती बहुत अधिक प्रभावित हुई है. आजकल उत्तर प्रदेश के चौबटिया जिले में केसर उगाने के प्रयास किये जा रहे हैं.

 

केसर को उगाने के लिये समुद्रतल से लगभग 2000 मी0 ऊँची पहाड़ी क्षेत्र एवम् शीतोष्ण सूखी जलवायु की आवश्यकता होती है. केसर का पौधा कली निकलने से पहले बर्फ और बारिश दोनों बर्दाश्त कर लेता है लेकिन कलियों के निकलने के बाद बर्फ या बारिश होने पर पूरी फसल बेकार हो जाती है.

 

केसर के कंद(बल्ब) अगस्त माह में बोये जाते हैं, जो दो-तीन महीने बाद नवंबर-दिसंबर महीने में खिलने शुरू हो जाते हैं. केसर के फूलों का रंग बैंगनी, नीला एवम् सफेद होता है. इसके भीतर तीन लाल या नारंगी रंग के मादा भाग पाये जाते हैं. इस मादा भाग को वर्तिका या वर्तिकाग्र कहते हैं, यही केसर कहलाते हैं. प्रत्येक फूल में केवल तीन केसर ही पाये जाते हैं. लाल-नारंगी रंग के आग की तरह दमकते हुये केसर को संस्कृत में अग्निशिखा नाम से भी जाना जाता है. इन फूलों की इतनी तेज खुशबू होती है कि आस पास का क्षेत्र महक उठता है.

केसर को निकालने के लिये पहले फूलों को चुनकर किसी छायादार स्थान में बिछा देते हैं. सूख जाने पर फूलों से मादा अंग यानि केसर को अलग कर देते हैं. रंग एवम् आकार के अऩुसार इन्हें-मागरा, लच्छी, गुच्छी, आदि श्रेणियों में बाँटते हैं. 1,50,000 फूलों से एक किलो सूखा केसर प्राप्त होता है.

 

केसर खाने में कड़वा होता है लेकिन खुशबू व औषधीय गुणों के कारण विभिन्न व्यंजनों एवम् पकवानों में डाला जाता है. गर्म पानी में डालने पर यह गहरा पीला रंग देता है.