झिलमिलाते सितारे
और
सूर्य की स्वर्णिम किरणों
के साथ
नववर्ष 2025
की
आप सबको हार्दिक शुभकामनायें
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नचिकेता की कथा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नचिकेता
प्रसिद्ध ऋषि वाजऋवस के पुत्र थे. एक बार वाजऋवस ने एक अनोखा अनुष्ठान किया, जिसमें अपनी सारी धन-संपत्ति दीन-दुखियों व
ब्राह्मण-पुरोहितों को दान कर दी. जब वे अपनी सारी संपत्ति बाँटने में व्यस्त थे, तो बालक नचिकेता ने मन में सोचा कि अवश्य पिताजी ने मुझे भी
दान कर दिया है. तब उसके मन में जिज्ञासा जाग्रत हुई कि पिताजी ने दान में मुझे
किसे दिया है. उसने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, आपने मुझे किसको दान कर दिया है.”
वाजऋवस
ने कोई उत्तर नहीं दिया. नचिकेता के बार-बार पूछने पर वाजऋवस ने झुँझला कर कहा, “यमराज को.” यह सुनकर नचिकेता सहित आसपास खड़े जन स्तब्ध रह
गये. कहने के बाद वाजऋवस को धक्का सा लगा. नचिकेता सोचने लगा कि, “मैंने ऐसा क्या किया कि पिता को मेरी मृत्यु की कामना करनी पड़ी. अवश्य ही
यही मेरा प्रारब्ध है कि यमराज से मेरी भेंट हो.
सभी के
मना करने पर भी नचिकेता यमराज से मिलने यमलोक चला गया, किंतु उस समय वहाँ यमराज नहीं थे. तीन दिन, तीन रातें बिना कुछ खाये-पिये वह यमराज की प्रतीक्षा करता रहा. जब यमराज
लौटे तो बालक के अपूर्व साहस और दृढ़ निश्चय को देखकर बहुत प्रसन्न हुये. यमराज ने
नचिकेता से तीन वर माँगने को कहा.
नचिकेता
ने पहला वर माँगा, “मेरे यहाँ आने
से मेरे पिता बहुत चिंतित और दुःखी होंगे. उनकी चिंता दूर हो और उनके मन को शांति
मिले.”
यमराज
ने कहा, “तथास्तु.”
नचिकेता
ने दूसरा वर माँगा, “स्वर्ग की
प्राप्ति कैसे होती है. स्वर्ग जहाँ न बुढ़ापे का भय है, न
मृत्यु का.”
यमराज
ने प्रसन्नता पूर्वक स्वर्ग प्राप्ति के साधन बता दिये.
नचिकेता
ने तीसरा वर माँगा, “यमराज! मुझे
मृत्यु का भेद बताइये. बताइये मृत्यु के बाद क्या होता है और मनुष्य अमर कैसे हो
सकता है.”
यमराज
दुविधा में पड़ गये, क्योंकि ये बड़े
गुप्त रहस्य की बात थी;जिनके बारे में ब्रह्म और यमराज ही
जानते थे.
यमराज
ने नचिकेता से कुछ और माँगने को कहा---धन, सत्ता अथवा राज्य. किंतु नचिकेता पर किसी भी प्रलोभन का असर नहीं हुआ.
यमराज हैरान थे कि इतने छोटे से बालक को ऐसी गूढ़ बातें जानने की कितनी जिज्ञासा
है. अंत में यमराज को नचिकेता के प्रश्नों के उत्तर देने ही पड़े. उन्होंने मनुष्य
के सच्चे रूप , यानि आत्मा को समझने की कठिनाईयाँ बतायीं.
यमराज
ने नचिकेता से कहा, “यदि तुम आत्मा
को भली प्रकार समझने में सफल हो जाओ तो तुम देखोगे कि मृत्यु एक छल मात्र है;
क्योंकि मनुष्य का सच्चा रूप तो आत्मा है, जो
कभी नहीं मरती. मरता तो केवल शरीर है.”
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गंगा अवतरण की कथा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
राजा
हरिश्चन्द्र के वंश में ही राजा सगर हुये जिन्होंने धर्मपूर्वक राज्य करते हुये,
अन्य राजाओं को जीतकर अपना राज्य बहुत बढ़ा लिया। उसके साठ हजार एक पुत्र थे। कुछ
समय पश्चात् राजा सगर ने सौ अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। निन्यानवें यज्ञ तो
भली-भाँति सम्पूर्ण हो गये परन्तु जब सौवाँ यज्ञ आरम्भ करके श्याम-कर्ण घोड़ा
छोड़ा और अपने साठ हजार पुत्रों को उसकी रक्षा के लिये साथ किया, तब इन्द्र ने
अपने इन्द्रासन चले जाने के भय से छल द्वारा घोड़े को पकड़कर कपिलमुनि के आश्रम
में बाँध दिया और स्वयं इन्द्रलोक चले गये। जब राजकुमारों को अपना घोड़ा कहीं
दिखाई नहीं दिया तो उन्होंने सारा वृतान्त राजा सगर को सुनाकर आज्ञा माँगी कि यदि
आप आज्ञा दें तो हम पृथ्वी को खोदकर घोड़ा ढ़ूँढ़ निकालें। राजा सगर ने आज्ञा दे
दी, तब सगर पुत्रों ने पृथ्वी को इस प्रकार खोदा कि भरत-खण्ड में सात छोटे-छोटे
समुद्र बन गये। जब वे घोड़े को ढ़ूँढ़ते हुये कपिलमुनि के आश्रम में पहुँचे, तो
देखा कि कपिलमुनि आँख बंद करके तपस्या कर रहे हैं और घोड़ा उनके पीछे बँधा है।
राजकुमारों की आवाज सुनकर कपिलमुनि की समाधि भंग हो गयी और मुनि ने राजकुमारों की
ओर देखा, तो वे सब साठ हजार सगर पुत्र उसी जगह जलकर भस्म हो गये।
जब राजा सगर को
बहुत दिनों तक अपने पुत्रों का कोई समाचार नहीं मिला तो राजा ने अपने पौत्र
अंशुमान को अपने चाचाओं और घोड़े का पता लगाने के लिये भेजा। अंशुमान उन्हें
ढ़ूँढ़ता हुआ कपिलमुनि के आश्रम पहुँचा, वहाँ उसने मुनि को प्रणाम कर उनकी बहुत
भाँति से स्तुति की। तब कपिलमुनि प्रसन्न होकर अंशुमान से बोले-“हे सगर पौत्र! तू अपना
घोड़ा ले जा, लेकिन तेरे समस्त चाचा मेरी क्रोधाग्नि द्वारा भस्म हो चुके हैं।
इसलिये जब गंगाजी पृथ्वी पर आवेंगी, तभी उनका उद्धार हो सकेगा।“ यह सुनकर अंशुमान कपिलमुनि को दण्डवत कर, श्याम कर्ण घोड़े
को ले, पितामह राजा सगर के पास आये और सारा वृतान्त सुनाया। पहले तो राजा सगर को
बहुत दुःख हुआ, फिर ईश्वर-इच्छा जानकर धैर्य धारण किया, सौंवा यज्ञ सम्पूर्ण कर
राज्य अंशुमान को सौंप स्वयं वन को चले गये।
कुछ समय तक
राज्य करने के बाद राजा अंशुमान ने राज्य अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया और स्वयं
वन में जाकर अपने चाचाओं के उद्धार के हेतु पृथ्वी पर श्रीगंगाजी को अवतिरत करने
के लिये श्रीहरिजी का तप करने लगे, वहीं राजा अंशुमान को मुक्ति प्राप्त हो गयी।
तत्पश्चात् राजा दिलीप ने भी गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के हेतु तप करके अपना शरीर
त्याग दिया, लेकिन गंगा जी तब भी पृथ्वी पर नहीं आयीं। राजा दिलीप के स्वर्गवास के
समय उनके पुत्र भगीरथ बाल्यावस्था में ही थे। मित्रों के साथ खेलते हुये भगीरथ ने
यह वृतान्त सुना कि अनके पिता और पितामह ने गंगा जी को पृथ्वी पर लाने के लिये तप
करते हुये अपना शरीर त्याग दिया है, तब उन्होंने प्रण किया कि जब तक मैं गंगाजी को
पृथ्वी पर लाने में सफल नहीं हो जाऊंगा राज सिंहासन पर आरूढ़ नहीं होऊँगा। यह
निश्चय कर तप करने के लिये वन में चले गये।
भगीरथ के तप से
प्रसन्न होकर गंगा जी ने उन्हें दर्शन देते हुये कहा- “हे पुत्र! तेरी क्या इच्छा है.”भगीरथ ने उनकी
दण्डवत परिक्रमा करके उत्तर दिया- “हे माता! कपिलदेव की
क्रोधाग्नि द्वारा मेरे साठ हजार पितामह जलकर भस्म हो गये हैं, इसलिये मेरी यह
इच्छा है कि आप पृथ्वी पर पधार कर उनकी भस्म को अपने साथ बहाकर ले जायें, तो उन
सबका उद्धार हो जाये।“ यह सुनकर गंगा जी बोलीं-
“हे भगीरथ! मुझे पृथ्वी
पर आना स्वीकार है, परन्तु मेरे आकाश से गिरने के वेग को न सह सकने के कारण पृथ्वी
रसातल को चली जायेगी। इसलिये तुम किसी ऐसे शक्तिशाली देवता की आराधना करो, जो मेरे
वेग को सह सके।“ तब भगीरथ ने महादेव जी को प्रसन्न करने के लिये तप किया। जब
शंकर जी ने प्रसन्न होकर भगीरथ को दर्शन दिये, तो भगीरथ ने उनसे प्रार्थना की कि- “हे कैलाश पति! आप कृपा कर गंगा जी को अपने मस्तक पर धारण कीजिए जिससे मेरे पूर्वजों का
उद्धार हो जाये।“ तब शंकर जी ने भगीरथ से कहा- “हे भगीरथ! मुझे तुम्हारी बात स्वीकार है।“ जब गंगा जी पृथ्वी पर आने
लगीं तब शंकर जी ने उस जल को अपनी जटाओं में ही समा लिया। तत्पश्चात् भगीरथ ने
शंकर जी से पुनः विनती की, तब शंकर जी ने भगीरथ को एक रथ देते हुये कहा- “हे भगीरथ! तू इस रथ पर सवार होकर आगे-आगे चल, तब गंगा जी तेरे पीछे-पीछे चलेंगी।“यह कहकर शंकर जी ने अपने सिर की जटाओं में से जल की एक छोटी
धारा पृथ्वी पर गिरा दी। तब भगीरथ शंकर जी के दिये हुये रथ पर बैठकर वहाँ चल दिये
जहाँ उसके पूर्वजों की भस्म पड़ी हुई थी। भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा जी ने उसके
साठ हजार पूर्वजों का उद्धार कर दिया और गंगा जी सागर में मिल गयीं। कपिलमुनि का
आश्रम गंगा सागर महातीर्थ का पुण्य स्थल बन गया, जहाँ प्रतिवर्ष मकर
संक्राति के दिन महापर्व का आयोजन होता है।
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भक्त ध्रुव
डॉ. मंजूश्री गर्ग
भक्त ध्रुव राजा उत्तानपाद
के पुत्र थे और राजा स्वायम्भुव मनु के पौत्र थे. राजा उत्तानपाद के दो रानियाँ
थी. बड़ी रानी का नाम सुनीति था जो ध्रुव की माँ थी, छोटी रानी का नाम सुरूचि था
जिसके पुत्र का नाम उत्तम था. राजा सुरूचि को अधिक प्यार करते थे, इसी कारण उसके
पुत्र उत्तम को भी ध्रुव से अधिक प्यार करते थे.
एक दिन राज सिंहासन पर
बैठकर राजा उत्तानपाद अपने पुत्र उत्तम को गोद में बैठाकर प्यार कर रहे थे, तभी
पाँच बर्षीय ध्रुव भी वहाँ आया और उसके मन में भी पिता की गोद में बैठने की इच्छा
हुई, किन्तु राजा ने रानी सुरूचि के डर से ध्रुव को गोद में नहीं लिया. उस समय सुरूचि
ने ध्रुव को सुनाते हुये कहा, “हे! ध्रुव तूने पूर्वजन्म में हरि भगवान की तपस्या व स्मरण
नहीं किया, इसी से तू अभागा पैदा हुआ. यदि तू पूर्वजन्म में तपस्या करता तो मेरे
गर्भ से उत्पन्न होता और तब तू राजा की गोद में बैठने का भी अधिकारी होता”. ध्रुव वहाँ से
रूदन करता हुआ अपनी माँ सुनीति के पास चला गया. सुनीति ने ध्रुव को रोता हुआ देखकर
अपनी गोद में ले लिया, कारण जानने पर वो भी बहुत दुखी हुई.
सुनीति ने ध्रुव से कहा, “कुमाता(सुरूचि) सही कहती हैं, श्री नारायण की तपस्या करने से ही मनुष्य की सब अभिलाषायें पूर्ण हो सकती हैं, अतः तुझे उन्हीं की शरण में जाना चाहिये. माता की बात सुनकर ध्रुव घर से बाहर निकल श्री नारायण की तपस्या के लिये वन की ओर चला गया. वह अपने मन में सोचता जा रहा था कि मैं अज्ञानी बालक श्री नारायण को किस प्रकार प्राप्त कर सकूँगा. तभी मार्ग में ध्रुव को नारद जी मिले जो उसकी परीक्षा लेने के लिये ही आये थे कि ध्रुव अपने प्रण पर अटल हैं या नहीं. नारद जी ने ध्रुव को घर वापस जाने के लिये काफी समझाया लेकिन ध्रुव को अपने प्रण पर अटल देखकर नारद जी ने ध्रुव को श्री नारायण के दर्शन प्राप्त करने का उपाय बताया और कहा- “मथुरापुरी जाकर, वहाँ उत्तर दिशा की ओर मुख करके श्री नारायण जी के स्वरूप –उनका स्याम रंग है, कमल के समान नेत्र हैं, सिर पर रत्न जड़ित मुकुट एवं कानों में मकराकृत कुंडल धारण किये हुये हैं, मुख चन्द्रमा के समान है, बैजंती माला एवं कौस्तुभ मणि गले में है और मंद-मंद मुस्कान है- का ध्यान करते हुये द्वादशाक्षर मंत्र(ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करना. श्री नारायण भगवान अवश्य प्रसन्न होंगे और तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी”. ध्रुव ने देवर्षि नारद जी को प्रणाम किया और मथुरापुरी को चल दिया.
ध्रुव के घर त्यागने के बाद राजा उत्तानपाद और सुनीति दोनों ही घर पर बहुत दुखी हुये, सोच रहे थे अबोध बालक न जाने कहाँ भटक रहा होगा. तभी नारद जी ने आकर उन्हें समझाया कि ध्रुव अपने प्रण पर अटल है. मैंने उसे घर जाने के लिये बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना, उसके मन में नारायण जी से मिलने की सच्ची प्रीति है. उसका अटल प्रण देखकर ही मैंने उसे नारायण जी की सहज प्राप्ति का मार्ग बताया है, मैं अभी वहीं से आ रहा हूँ. तुम चिन्ता मत करो. ध्रुव को ऐसा अटल पद प्राप्त होगा, जैसा तुम्हारे वंश में आज तक किसी को नहीं मिला.
उधर ध्रुव ने भी मथुरापुरी
पहुँचकर कुश-आसन बिछाकर उत्तर की ओर मुँह करके, नारायण जी के चतुर्मुखी स्वरूप का
ध्यान करते हुये, द्वादश अक्षर मंत्र(ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय) का जप करना प्रारम्भ
कर दिया. धीरे-धीरे ध्रुव श्री नारायण जी के ध्यान में इतना लीन हो गया कि उसने
अन्न-जल का भी त्याग कर दिया. छठे महीने ध्रुव ने अपना मुँह बंद करके श्वाँस लेना
भी छोड़ दिया और उसका समस्त अन्तःकरण श्री नारायण जी के स्वरूप से द्रवीभूत हो
गया. तब श्री नारायण जी ने अपने चतुर्मुखी स्वरूप में ध्रुव को दर्शन दिये, दर्शन
पाकर ध्रुव अति प्रसन्न हुआ. नारायण जी ने ध्रुव से वरदान माँगने को कहा तो ध्रुव
ने कहा, “हे भगवन्! जब मुझे आपके चरणों के दर्शन प्राप्त हो गये, फिर माँगने
के लिये और क्या शेष है मैं तो आपके चरणों की भक्ति चाहता हूँ”. भक्त ध्रुव से
भगवान अति प्रसन्न हुये और कहा, “अभी तुम घर
जाओ, तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी राह देख रहे हैं. राजगद्दी तुम्हें ही मिलेगी,
तुम 36,000 वर्ष तक राज्य करोगे और मरने पर हम तुझे रहने के लिये ब्रह्म-लोक से भी
ऊँचे ध्रुव-लोक में स्थान देंगे”. देवताओं ने प्रसन्न होकर
पुष्प वर्षा की. उसी समय नारद जी ने राजा उत्तानपाद को आज्ञा दी कि “तुम्हारा पुत्र प्रभु दर्शन कर घर आ रहा है, उसे आदर पूर्वक
घर ले आओ”. नारद जी के वचन सुनकर राजा उत्तानपाद बहुत प्रसन्न हुये और
उसे सहर्ष महल में ले आये. कुछ समय बीत जाने पर ध्रुव के युवा होने पर राजा
उत्तानपाद ध्रुव को राजसिंहासन पर बैठाकर स्वयं तपस्या करने वन को चले गये.
ध्रुव जी के शरीर त्यागने
पर स्वर्ग से सुन्दर विमान आया और पार्षदों ने उन्हें ध्रुवलोक चलने को कहा. तब
ध्रुव ने कहा, “मेरी छोटी माता सुरूचि गुरू
के समान है, जिनकी प्रेरणा से ही मैं इस पद को प्राप्त कर सका हूँ. अतः मैं उनको
भी ध्रुवलोक ले जाना चाहता हूँ”. तब पार्षद बोले, “हे ध्रुव जी! प्रभु ने हमें आपकी दोनों माताओं सहित ही आपको ले आने की आज्ञा दी है, वे
आपसे पहले ही ध्रुवलोक पहुँच जायेंगी”. यह सुनकर ध्रुव
बहुत हर्षित हुये और पत्नी सहित विमान में बैठकर ध्रुवलोक को चले गये. देवताओं ने
उनपर फूल बरसाये.
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प्रद्युम्न की कथा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
प्रद्युम्न श्रीकृष्ण और रूक्मिणी के पुत्र थे.
जब वह अठारह दिन के थे तो शम्बासुर नामक राक्षस प्रद्युम्न को उठा कर ले गया और
उन्हें समुद्र में फेंक दिया. समुद्र में एक मछली ने उन्हें निगल लिया. एक बार वह
मछली मछेरे के जाल में आ गयी और शम्बासुर के रसोईघर में लाई गयी. जब मछली का पेट
चीरा गया तो उसमें से एक सुन्दर बालक निकला. उस अत्यन्त सुन्दर बालक का मायावती(
जो शम्बासुर के यहाँ रसोइया बनकर रह रही थी) ने पालन-पोषण किया. मायावती
प्रद्युम्न के प्रति रति भाव रखती थी. धीरे-धीरे प्रद्युम्न बड़ा होने लगा और
सांसारिक बातों को समझने लगा. एक दिन प्रद्युम्न ने मायावती से पूछा, “हे माता! तुम मेरी माँ
होकर मुझे पति भाव से क्यों देखती हो.” तब मायावती ने कहा, “तुम पूर्वजन्म
में मेरे पति कामदेव थे और मैं तुम्हारी पत्नी रति. एक बार कामदेव ने देवताओं के
हित के लिये शिवजी की तपस्या भंग की थी. तब शिवजी ने क्रोधित होकर कामदेव को भस्म
कर दिया था. किन्तु बाद में उन्हें बोध हुआ कि कामदेव निर्दोष है तब रति का विलाप
सुन, उसे आर्शीवाद देते हुये शिवजी ने रति से कहा, हे रति! तू चिन्तित मत हो. तेरा पति द्वापर युग में जब
कृष्णावतार होगा और श्रीकृष्ण-रूक्मिणी का विवाह होगा तो रूक्मिणी के गर्भ से जन्म
लेगा और तुझे शम्बासुर की रसोई में मिलेगा. पन्द्रह वर्ष की आयु में वह शम्बासुर
को मारकर तुझे द्वारिका ले जायेगा. वहाँ तेरा और उसका विधिवत विवाह होगा.” एक दिन प्रद्युम्न ने शम्बासुर को युद्ध के लिये
ललकारा और द्वन्द्व युद्ध करते हुये शम्बासुर को मार दिया. फिर प्रद्युम्न और रति
विमान में बैठकर द्वारिका जा पहुँचे. वहाँ बड़ी धूमधाम के साथ दोनों का विधिवत
विवाह हुआ.
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जय-विजय की कथा
डॉ. मंजूश्री गर्ग
एक बार सनत् कुमार बिष्णु भगवान के दर्शन के
लिये बैकुण्ठ लोक को गये, किन्तु वहाँ के द्वारपाल जय-विजय ने उन्हें बच्चे समझकर
अन्दर जाने से रोक दिया. परिणाम स्वरूप सनत् कुमारों ने क्रोधवश जय-विजय को श्राप
दिया कि तुमने हमारा तीन घड़ी समय नष्ट किया है, इसलिये तुम्हें तीन बार मृत्यु
लोक में दैत्य योनि में जन्म लेना होगा. जब स्वयं बिष्णु भगवान बाहर आये तो
उन्होंने सनत् कुमारों को वहाँ क्रोध की अवस्था में जय-विजय को श्राप देते हुये
देखा. तब बिष्णु भगवान ने सनत् कुमारों का अभिवादन किया और कहा कि जय-विजय तो मेरी
ही आज्ञा का पालन कर रहे थे. जय और विजय ने भी सनत् कुमारों के चरण पकड़ कर अनुरोध
किया कि हमसे जो भूल हुई है उसे क्षमा करने की कृपा कीजिए और श्राप से मुक्त कर
दीजिए. तब सनतकुमारों ने कहा कि दिया हुआ श्राप तो वापस नहीं हो सकता किन्तु साथ
ही यह वरदान भी देते हैं कि हर जन्म में तुम्हारी मृत्यु प्रभु के ही हाथों होगी
और तीसरी बार तुम्हें मुक्ति मिलेगी.
जय-विजय ने प्रथम जन्म हिरण्याक्ष और
हिरण्यकश्यप के रूप में लिया. जब हिरण्याक्ष को मारने के लिये प्रभु ने वाराह
अवतार लिया और हिरण्यकश्यप को मारने के लिये नृसिंह अवतार लिया. दूसरे जन्म में
जय-विजय रावण और कुम्भकर्ण बने, तब प्रभु ने राम अवतार लेकर रावण और कुम्भकर्ण को
मारा. तीसरे जन्म में जय-विजय ने शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप में जन्म लिया, तब
प्रभु ने कृष्ण अवतार लेकर शिशुपाल और दन्तवक्र को मारकर दैत्य योनि से मुक्त कर
बैकुंठ-धाम भेज दिया.
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