Friday, October 10, 2025


जहाँ कृष्ण ने रची लीलायें।

राधा-गोपी संग रास रचाये।।

पावन धरा मथुरा-वृन्दावन।

कण-कण में हैं कृष्ण बसे।।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, October 8, 2025


चाहे-अनचाहे मोड़ों ने, जीवन का दिया नया रूप।

जैसे सीधा-सपाट कागज कोई, बन गया हो नाव।।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, October 7, 2025


अँधेरे कब रूके हैं उजालों के आगे।

निराशायें कब रूकी हैं आशाओं के आगे।

आकाश कब दूर है उड़ानों के आगे।

मंजिल कब दूर है चाहतों के आगे।।

 

                          डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, October 6, 2025


आराधना हम तेरी, दिन-रात करते हैं।

नैनों के दीप जलाकर, इंतजार करते हैं।।


            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, October 5, 2025


मेरे मिलन में तुम हो प्रिये! मेरे विरह में भी तुम।

मेरी जीत में तुम हो प्रिये! मेरी हार में भी तुम।

मेरी मुस्कान में तुम हो प्रिये! मेरे अश्रु में भी तुम।

और मेरी साँसों की लय में भी तुम ही तुम हो प्रिये!

 

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, October 4, 2025

 

क्यों किसी की राह के रोड़े बने हम,

बन सकें तो मील के पत्थर बनें हम।

किसी को पर हम दे नहीं सकते

दे सकें तो होसलों की उड़ान दे हम।

 

        डॉ. मंजूश्री गर्ग

Friday, October 3, 2025

 


प्रस्तुत पंक्तियों में कवि ने गंगा जी के अवतरण की संक्षिप्त कथा का वर्णन किया है- अंशुमान और दिलीप के तप करने पर भी गंगा जी धरती पर नहीं आई. जब भगीरथ ने तप किया तब गंगा जी ने दर्शन दिये-

अंशुमान सुनि राज बिहाइ। गंगा हेतु कियो तप जाइ।

यही विधि दिलीप तप कीन्हो। पै गंगा जू बरनहिं दीन्हों।

बहुरि भगीरथ तप बहु कियौ। तब गंगा जू दरसन दियौ।

                          सूरदास