भाव-लहरी
ह्रदय में उमड़ी
शब्दों में बही।
डॉ. मंजूश्री गर्ग
नदी जल में
किल्लोल हैं करती
पानी की बूँदें।
थकित मन
चाँदनी सी शीतल
तेरी छुअन।
मधु-मालती के फूल रात में खिलें।
महकें और महकायें मन-आँगन।।
ताप सह के
देते हमें हैं छाँव
वट-पीपल।
आज की बातें
बीते युग की बातें
होनी हैं कल।
बरखा बाद
धानी चूनर ओढ़
सजी धरती।