Tuesday, October 6, 2026

 

नीम वृक्ष


डॉ. मंजूश्री गर्ग

नीम वृक्ष भारतीय मूल का पर्णपाती वृक्ष है। इसका वैज्ञानिक नाम Azadirachta indica है। संस्कृत में इसे निंब कहते हैं व अंग्रेजी में Neemtree  या  Margosatree कहते हैं। नीम वृक्ष भारत के अतिरिक्त भारत के समीपवर्ती देशों में नेपाल, बांग्लादेश, बर्मा, थाइलैंड, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका के साथ-साथ अफ्रीका, दक्षिणी अफ्रीका, आदि अन्य उष्ण कटिबन्धीय व उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पाया जाता है।

नीम वृक्ष की लंबाई 15 से 20 मी. तक होती है। इसका तना सीधा लगभग 1 मी. व्यास तक होता है। इसकी छाल कठोर व दरार युक्त सफेद या भूरे रंग की होती हैं। शाखायें चारों तरफ फैली हुई व बहुत मजबूत होती हैं, इसीलिये सावन के महीने में आम के पेड़ की शाखाओं की तरह इन पर झूले डाले जाते हैं। तने से एक प्रकार का चिपचिपा पदार्थ निकलता है जो गोंद होता है। नीम के पेड़ पर पत्तियाँ इस पर कटावदार संयुक्त लगती हैं जो पतझड़ के मौसम में झड़ जाती हैं और बसन्त के मौसम में नई कोंपले आनी शुरू होती हैं जो हल्की गुलाबी-हल्के पीले रंग की होती हैं। फूल सुगन्धित सफेद रंग के गुच्छों के रूप में खिलते हैं जिन पर 2 से. मी. लम्बा व 1.5 से.मी. व्यास का चिकना व अण्डाकार हल्के पीले रंग का फल लगता है जिसे निंबौली कहते हैं। इसमें बीज होता है। नीम की पत्तियों व फलों का स्वाद हल्का कड़वा होता है, लेकिन दोनों ही स्वास्थ्य के लिये लाभकारी होते हैं। नीम वृक्ष की पतली पुरानी टहनियाँ दातुन के काम आती हैं जो दाँतों के स्वास्थ्य के लिये लाभकारी होती हैं। नीम की पत्तियों को उबालकर इसके पानी से नहाने पर चर्म रोग में बहुत लाभ मिलता है।

नीम वृक्ष की छाया अत्यन्त सुखद व शीतल होती है इसीलिये शिवकासी(तमिलनाडु राज्य) जैसे शुष्क क्षेत्र में नीम वृक्ष बहुतायत से लगाये गये हैं। इनकी छाया में आतिशबाजी बनाने का काम होता है।

भारत में नीम का प्रयोग एक औषधि के रूप में किया जाता है। आज के समय में बहुत सी एलोपैथिक दवाईयाँ नीम की पत्ती व उसकी छाल से बनती हैं। कोरोना काल में प्रायः घरों में हवा शुद्ध होने के लिये नीम की टहनियों को रखते थे।

 

 

 

 


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