Thursday, February 19, 2026

 

यशोदा हरि पालने झुलावै।

हलरावै दुलराइ मल्हावै, जोइ-सोइ कछु गावै।

मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै ना आनि सुवावै।

तू काहै न बेगहिं आवै, तोको कान्ह बुलावै।

कबहुँ पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।

सोवत जानि मौन है करहिँ, करि-करि सैन बतावै।

इति अंतर अकुलाई उठे हरि, जसुमति मधुर गावै।

जो सुख सूर अमर मुनि दुर्लभ, सो नंदभामिनी पावै।

                                      सूरदास

उपर्युक्त पंक्तियों में कवि ने यशोदा के माध्यम से भारतीय माँ का ही चित्र उकेरा है जो पालने में अपने लाल को सुला रही है, सोया जानकर आँखों के इशारे से सबको चुप रहने को कहती है. वहाँ से हटकर घर के और काम करना ही चाहती है कि बालक अकुलाकर उठ जाता है.


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