Friday, July 22, 2016

हाइकु

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

कामद गिरि,
राम-भरत मिले
चित्रकूट में।

भरत-कूप,
सब तीर्थों का जल
अति पावन।

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Friday, July 15, 2016

गुब्बारे

डॉ0 मंजूश्री  गर्ग

रंग-बिरंगे
प्यारे-प्यारे
मन भावन
गुब्बारे सारे.
लाल, गुलाबी
नीले, पीले
हरे, बैंगनी
कितने सारे.
बच्चों की है
मुस्कान औ
खिलौने प्यारे
गुब्बारे सारे.
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Saturday, July 9, 2016


बरसातें----------------------

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

जेठ   बरसती  धूप,
औ' सावन बरसते मेघ।
कवार बरसती चाँदनी,
औ' फागुन बरसते रंग।

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Thursday, July 7, 2016

हाइकु

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

सहज मन
समर्पित तुमको
सारा जीवन।

चाहो जितना,
उड़ुँ पतंग सम,
तुम दो ढ़ील।

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Tuesday, July 5, 2016

फिर आया..............

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

फिर आया बरखा का मौसम
सिंदूरी शामों का मौसम   ।
अब भरता सड़कों पे पानी
फिर आया जामों का मौसम।

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Monday, July 4, 2016

हाइकु

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

नन्हें परों को
सिखा दिया उड़ना
छुयें आकाश।

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Sunday, July 3, 2016

क्योंकि मैं बीज हूँ
(डॉ0 मंजूश्री गर्ग)

क्योंकि मैं बीज हूँ
शिखर पर रहकर भी
कठोर आवरण में रहता हूँ.
समय आने पर, कहीं दूर
भूमि में बो दिया जाऊँगा
अंकुरित होने के लिये.
पुरातनता के संस्कार लिये
नयी हवा, पानी, मिट्टी में पनपने के लिये.

उजाला मुझे तब भी नहीं मिलेगा
जो मुझसे उष्मा पाकर
आयेंगे बाहर, वो अंकुर होंगे.
पल्लव होंगे, तने होंगे, फूल होंगे
और होंगे फल, लेकिन जब मेरा प्रतिरुप

बीज आयेगा; तो फिर वही कठोर आवरण में------------