Friday, May 6, 2016


7.
राम अवतार



डॉ0 मंजूश्री गर्ग


त्रेता युग में अयोध्यापुरी में राजा दशरथ के यहाँ श्री रामचंद्र ने जन्म लिया. श्री राम ने बाल्यावस्था में ही अनेक राक्षसों को मारकर विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा की थी. बिना परिश्रम श्री राम ने शिव-धनुष को तोड़्कर राजा जनक की पुत्री सीता से विवाह किया था. अपनी माता कैकेयी व पिता की आज्ञा के अनुसार श्री राम  चौदह वर्ष के लिये वन में गये, वहाँ अनेक राक्षसों को मारा व अनेक ऋषियों को व अपने भक्तों को दर्शन देकर कृतार्थ किया.
रावण द्वारा सीता हरण करने पर, श्री राम ने वानर-भालुओं की मदद से लंका पर विजय प्राप्त की व रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद, आदि महाप्रतापी राक्षसों को मारकर, उनके भार से पृथ्वी को मुक्त किया. चौदह वर्ष बाद श्री राम अयोध्या आकर राजगद्दी पर आसीन हुये. श्री रामचंद्र के न्यायोचित धर्म के कारण त्रेतायुग में भी सतयुग का आभास होता था. इसीलिये श्री राम के राज्य-काल को धर्म-राज्यया राम-राज्यकहा जाता है.
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6.
परशुराम अवतार


डॉ0 मंजूश्री गर्ग


जमदग्नि और रेणुका के चारों पुत्रों में से परशुराम सबसे छोटे थे. वे बड़े क्रोधी, युद्ध-कर्ता और महान विजयी थे. उन्होंने इक्कीस बार देवताओं और ब्राह्मणों के द्रोही क्षत्रियों को मारकर उनके वंश का नाश किया था.
एक बार जमदग्नि ने रेणुका के पर-पुरूष की जल-क्रीड़ा पर आसक्त होने के कारण अपने पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी; किंतु बड़े तीन पुत्रों ने मना कर दिया, तब पिता की आज्ञा का पालन करते हुये परशुराम ने अपनी माता व बड़े तीन भाइयों का वध किया. प्रसन्न होकर जमदग्नि ने परशुराम से वर माँगने को कहा. तब परशुराम ने अपनी माता और भाइयों को पुनः जीवित होने का वर प्राप्त किया. उनकी कृपा से माता और तीनों भाई पुनः जीवित हो गये.

एक बार परशुराम की अनुपस्थिति में सहस्त्राबाहु के सौ पुत्र अपने पिता का बदला लेने के उद्देश्य से जमदग्नि ऋषि को मारकर, उनका सिर काटकर अपने साथ ले गये. जब परशुराम को यह समाचार ज्ञात हुआ तो उन्होंने उसी समय क्रोधावेश में आ यह प्रतिज्ञा की कि, “मैं पृथ्वी को विप्रद्रोही क्षत्रियों से हीन कर दूँगा.” इसी प्रतिज्ञा के फलस्वरूप परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से हीन कर, कुरूक्षेत्र में नहाकर, उन राजाओं कि सारी पृथ्वी कश्यप-वंशी ब्राह्मणों को दान कर दी. 

Thursday, May 5, 2016

5.


मतस्य अवतार की कथा

डॉ0 मंजूश्री गर्ग

एक बार प्रलय रात्रि के समय ब्रह्मा जी अचेतावस्था में सोये हुये थे. दिन होने पर उन्हें जम्हाई आई. उस समय हयग्रीव नामक दैत्य उनके मुख से वेद निकाल कर पाताल लोक में ले गया. यह देखकर ब्रह्मा जी ने नारायण जी से प्रार्थना की कि, “ हे महाराज! हयग्रीव दैत्य वेद चुराकर ले गया है. मुझमें और देवताओं में उसे जीतने की सामर्थ्य नहीं है, इसलिये आप वेदों को लाने का कोई उपाय कीजिये.” तब भगवान मतस्य(मछली) का रूप रखकर पाताल लोक से वेदों को लेकर आये.
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4.
वामन अवतार



डॉ0 मंजूश्री गर्ग



राजा बलि प्रहलाद के पौत्र थे. उसने अपने पराक्रम से तीनों लोकों में अपना शासन स्थापित किया था. उसने विश्व विजयी बनने के लिये सौ यज्ञ करने का संकल्प किया था. निन्नियानवें यज्ञ तो भली प्रकार सम्पन्न हो गये किंतु जब सौंवा यज्ञ करने लगा तो देवताओं की माता अदिति, जो देवताओं का राज्य छिन जाने से अति दुखित थी और भी दुःखी हुई. तब उन्होंने अपने को निःसहाय पा विष्णु भगवान की आराधना की कि किसी तरह मेरे पुत्रों का राज्य वापस मिल जाये.
विष्णु भगवान ने अदिति की आराधना से प्रसन्न हो अदिति और कश्यप के यहाँ पुत्र रूप में जन्म लिया. थोड़ा बड़े होने पर ब्रह्मचारी का वेश बना, हाथ में दण्ड-कमण्डल ले राजा बलि के सौंवे यज्ञ में चले गये. उनके तेज से पूरी यज्ञशाला प्रकाशमान हो गयी. राजा बलि ने वामन भगवान को उच्च आसन पर बैठाया और कुछ दान माँगने के लिये अनुग्रह किया. तब वामन भगवान ने केवल तीन पग धरती माँगी. राजा बलि ने कहा, “प्रभु! आप जहाँ से चाहें भूमि नाप लें.” तब वामन भगवान ने अपना विराट रूप रखकर एक पग में स्वर्गलोक के सातों भुवन और दूसरे पग में पाताललोक के सातों भुवन नाप लिये. तब राजा बलि शर्मिंदा होकर हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गये तो वामन भगवान ने राजा बलि के मस्तक पर पैर रखकर तीसरे पग की धरती मापी. इस प्रकार वामन भगवान ने देवताओं को उनका राज्य वापस दिलाया और राजा बलि को सुतल लोक का राज्य दिया.

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Wednesday, May 4, 2016

3.
कच्छ्प(कछुआ) अवतार 
डॉ0 मंजूश्री गर्ग

भाई होते हुये भी देवताओं और दानवों मे प्रायः आपस में युध्द होते रहते थे. कभी देवता दानवों को हराकर उनका राज्य, शक्ति, आदि छीन लेते थे और कभी दानव देवताओं को हराकर उनका राज्य, आदि छीनकर उन्हें श्रीहीन कर देते थे. एक बार सब देवताओं ने मिलकर नारायण भगवान से प्रार्थना की कि, “हे प्रभु! कोई ऐसा उपाय बताइये कि हम कभी भी दानवों से पराजित न हों. हम, हमारा राज्य अमर हो जाये.” तब नारायण भगवान ने कहा कि तुम दानवों के साथ मिल समुद्र-मंथन करो. उसमें से जो अमृत निकलेगा उसे पीकर तुम अमर हो जाओगे. तब देवताओं ने दानवों से मित्रवत् बात करते हुये समुद्र-मंथन के लिये राजी किया और मंदराचल पर्वत को मथानी बनाने के लिये क्षीरसागर में रखा किंतु अपने वजन के कारण मंदराचल पर्वत सागर में डूबने लगा. तब नारायण भगवान ने कच्छप का रूप रखा और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थित किया. जब तक समुद्र-मंथन हुआ मंदराचल पर्वत कच्छप भगवान की पीठ पर स्थित रहा. समुद्र-मंथन के बाद वह समुद्र में डूब गया. समुद्र-मंथन से चौदह रत्नों के साथ जब अमृत निकला तो छल से मोहिनी रूप रखकर नारायण भगवान ने अमृत देवताओं को पिला दिया.


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2. नृसिंह अवतार
डॉ0 मंजूश्री गर्ग


हिरण्याक्ष के वध से उसका भाई हिरण्यकश्यप और माता दिति बहुत दुःखी हुईं. तब हिरण्यकश्यप ने माँ को सांत्वना दी और नारायण को हराने के लिये असीम शक्ति प्राप्त करने की कामना ले, मंदराचल पर्वत पर जा ब्रह्मा की आराधना की. कठोर तप करते हुये सौ वर्ष बीत गये , तब ब्रह्मा जी ने उसे दर्शन दिये और वर माँगने को कहा. तब हिरण्यकश्यप ने वर माँगा कि, “हे ब्रह्मा जी! मुझे ऐसी शक्ति दो कि तीनों लोको में कोई भी मुझे न मार सके. न मनुष्य न पशु, ना दिन को मरूँ ना रात को, ना अस्त्र से ना शस्त्र से मरूँ अर्थात तीनों लोक मेरे आधीन हों.” वर सुनकर ब्रह्मा जी बड़े असमंजस में पड़ गये, फिर मन में सोचा कि यदि इसे वर नहीं देता तो यह और तपस्या करेगा अर्थात वर देना ही सही है, नारायण ही इस समस्या का कुछ हल निकालेंगे. ब्रह्मा जी हिरण्यकश्यप को मन चाहा वर दे, ब्रह्मलोक को चले गये.
ब्रह्मा जी से असीम शक्ति प्राप्त कर हिरण्यकश्यप ने देवता, मनुष्य सबको जीतकर अपने आधीन कर लिया  और तीनों लोको में अपने ही नाम का जप करवाने लगा. कोई भी उसके डर से नारायण का नाम नहीं लेता था. किंतु हिरण्यकश्यप के ही घर उसका पुत्र प्रहलाद हरिभक्त पैदा हुआ, जो दिन-रात नारायण के ही नाम का जप करता था. इसीलिये हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मारने के अनेक प्रयत्न किये. कभी पहाड़ों से नीचे फेंका, कभी आग में जलाकर मारने की कोशिश की; श्री नारायण ने हर समय, हर जगह अपने प्रिय भक्त  प्रहलाद की रक्षा की और उसका बाल भी बाँका नहीं हुआ. तब स्वयं हिरण्यकश्यप तलवार ले प्रहलाद को मारने के लिये उठा, वो समय शाम का था. तभी खंभे में से नृसिंह भगवान प्रकट हुये और उन्होंने अपने तेज नाखुनों से हिरण्यकश्यप का वध कर दिया. इस तरह आधा मनुष्य, आधा सिंह का रूप रख, शाम के समय बिना अस्त्र-शस्त्र से हिरण्यकश्यप का वध कर नृसिंह भगवान ने ब्रह्मा जी के वर का मान भी रख दिया और आतंकी दैत्य हिरण्यकश्यप का वध भी कर दिया. तब सभी देवताओं ने नृसिंह भगवान की स्तुति की और प्रहलाद उनके चरणों में गिर गया, जिसे उन्होंने प्रेमवश अपनी गोद में बैठा लिया.
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Monday, May 2, 2016

भगवान बिष्णु
दस अवतारों की कथा
डॉ0 मंजूश्री गर्ग
1.
वाराह अवतार
ब्रह्मा जी ने नारायण की आज्ञानुसार सृष्टि की रचना की, मानव जीवन के लिये पृथ्वी की उत्पत्ति की, जिस पर विभिन्न वनस्पति, पर्वत, नदी, वन, विभिन्न जीव-जंतुओं का विस्तार किया; दिति के पुत्र व हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष पृथ्वी को उठाकर पाताल लोक ले गया. पृथ्वी के बिना सारी सृष्टि आधार हीन हो गयी. इससे ब्रह्मा जी बहुत दुःखी हुये और उन्होंने बिष्णु भगवान की आराधना की. कहा कि, “हे प्रभु! मैंने आपकी आज्ञानुसार सृष्टि की रचना की, संसार को बसाने के लिये पृथ्वीका निर्माण किया, किंतु हिरण्याक्ष दैत्य पृथ्वीको उठाकर पाताल लोक ले गया है. बिना पृथ्वी संसार कैसे बसेगा.
बिष्णु भगवान ने ब्रहमा जी की आर्त वाणी सुनकर तुरंत ही वाराह(शूकर) का रूप धारण किया  और पाताल लोक जाकर अपने दो दातों पर पृथ्वी को उठा लिया. जब हिरण्याक्ष ने यह दृश्य देखा तो अपनी गदा से पृथ्वी लिये हुये वाराह भगवान पर प्रहार किया; किंतु वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष के प्रहार को बीच में ही रोक दिया और अपनी गदा के तेज प्रहार से हिरण्याक्ष का वध कर, पृथ्वी को पाताल लोक से बाहर ला अपनी कुछ शक्ति के साथ जल पर स्थापित कर दिया. पृथ्वी को जल पर स्थापित देखकर ब्रह्मा जी सहित सभी देवता अत्यंत प्रसन्न हुये और सबने वाराह भगवान की स्तुति करते हुये पुष्प वर्षा की.