Wednesday, December 31, 2025


नये साल 2026 की आप सभी को हार्दिक शभकामनायें

नया साल है

दो हजार छब्बीस

एक नम्बरी।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 


नये साल 


 की 

हार्दिक शुभकामनायें

नये साल की पूर्व संध्या पर नये साल के नये सूरज की प्यार भरी नमस्ते.

Tuesday, December 30, 2025


जीतने के लिये ही नहीं, हारने के लिये भी साथी चाहिये।

औ' ऐसा साथी जिससे हारने पर भी आनन्द का अनुभव हो।।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, December 29, 2025


अब ना आयेगा, उदासी का एक पल जीवन में,

तुम्हारा मुस्कुराता चेहरा है साथ हमारे।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, December 28, 2025


जगमगाती हैं रातें यादों के उजालों से।

महकती हैं साँसें तुम्हारी ही खुशबू से।।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, December 27, 2025


लक्ष्मण झूला

लक्ष्मण ने बनाया

ऋषिकेश में।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, December 25, 2025


श्यामल धारा

बहे अति पावन

यमुनोत्री से।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 


अति पावन

गोमुख से निकले

गंगा की धारा।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, December 23, 2025


छोटा सा दिन

लम्बी होती रातें

दिसम्बर में।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, December 22, 2025


बरसे नेह

अविरल तुम्हारा

सरसे घर।

                     डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Sunday, December 21, 2025


अक्षर ज्ञान

ब्रह्म ज्ञानमय, जो

क्षर ना होता।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

Saturday, December 20, 2025


सूरज नहीं

देखो उजाले लिये

आये हैं हम।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Friday, December 19, 2025


तेरी मुस्कान

कड़कती सर्दी में

धूप सरीखी।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, December 18, 2025


हकीकत में उन्हें पहचान अवसर की नहीं कुछ भी,

जिन्होंने ये कहा अक्सर, हमें अवसर नहीं मिलते।

                नित्यानंद तुषार 

Wednesday, December 17, 2025


छोड़ दो तुम हाथ,

चलने दो, दो कदम,

डगमगाते ही सही।

दृढ़ता वही देंगे,

मीलों के सफर की।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

Tuesday, December 16, 2025


चाहतें हों खूबसूरत

अधूरी भी अच्छी।

रोज रंगीन सपने

सजाती जीवन में।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Monday, December 15, 2025


हकीकत में ना सही,

ख्वाबों में ही सही।

पल भर जी लेते हैं, 

मुस्कुरा लेते हैं पल भर।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

Sunday, December 14, 2025


ताँबा बिना ना सोना गढ़ता।

फिर भी ताँबा ताँबा ही रहता।।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Saturday, December 13, 2025

 

'अग्नि पुराण' में 'भगवान' का प्रयोग विष्णु के लिये किया गया है क्योंकि उसमें 'भ' से भर्त्ता के गुण विद्यमान हैं और 'ग' से गमन अर्थात् प्रगति या सृजन कर्त्ता का बोध होता हैं। विष्णु को सृष्टि का पालन कर्त्ता और श्रीवृद्धि का देवता माना गया है। 'भग' का पूरा अर्थ ऐश्वर्य, श्री, वीर्य, शक्ति, ज्ञान, वैराग्य और यश होता है जो कि विष्णु में निहित है। 'वान' का प्रयोग प्रत्यय के रूप में हुआ है, जिसका अर्थ धारण करनें वाला अथवा चलाने वाला होता है अर्थात् जो सृजनकर्त्ता, पालन कर्त्ता हो, श्रीवृद्धि करने वाला हो, यश और ऐश्वर्य देने वाला हो, वह भगवान है। विष्णु में ये सभी गुण विद्यमान हैं।

                                                            -अग्नि पुराण से

Friday, December 12, 2025


ऊँट जहाज

रेत का समन्दर

चले शान से।

                   डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Thursday, December 11, 2025


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो।

जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर  देखो।।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग

Wednesday, December 10, 2025


बंद मुठ्ठी में

अनगिन सपने

लेकर आये।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, December 9, 2025


 सम्बन्धों की देहरी पर, 

खिले प्रेम के फूल।

रखना कदम आगे,

विश्वासों  के साथ।.

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

Monday, December 8, 2025

 

किनारे-किराने चलोगे तो कैसे  पार जाओगे।

पार जाना है तो बीच धार में नाव चलाओ।।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

Sunday, December 7, 2025


प्रीत की रूनझुन सी पायल बँधी जिंदगी से,

मुस्कुराने लगी सुबह, गुनगुनाने लगी रात।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग

 

Saturday, December 6, 2025


 पल भर को तुम मुस्कुराये,

छा गया बसंत जीवन में।

खिलने लगे फूल खुशी के, 

महकने सी लगी हवायें,

बहकने लगे कदम मेरे।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग

Friday, December 5, 2025


चलें दो कदम,

चलें निरन्तर,

मंजिल की ओर।

पा लेंगे हम, 

मंजिल एक दिन।


                     डॉ. मंंजूश्री गर्ग 

Thursday, December 4, 2025


'ओस' की बूँद

'मोती' का सा आभास

पल भर को।

                डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Wednesday, December 3, 2025


हर बार मिलन अधूरा ही रहा।

चाह कर भी चाह कह नहीं पाये।।

                    डॉ. मंजूश्री गर्ग 

Tuesday, December 2, 2025

 

कोविदार वृक्ष/कचनार

 

डॉ. मंजूश्री गर्ग

अयोध्या में राम मंदिर के ध्वज में तीन प्रतीक चिह्न हैं-चमकता हुआ सूर्य, ओम् और कोविदार वृक्ष। कोविदार वृक्ष देव वृक्ष है जिसे ऋषि कश्यप ने मंदार और पारिजात के वृक्षों से बनाया था। यह रामचन्द्रजी के समय भी अयोध्या के राजध्वज में अंकित था। इसे कचनार के नाम से भी जाना जाता है। अयोध्या के राम मंदिर परिसर में भी यह वृक्ष लगाया गया है। श्रीकृष्ण को भी कचनार का वृक्ष बहुत प्रिय था, वृंदावन में बहुतायत से ये वृक्ष पाये जाते हैं।

 

कचनार का वृक्ष सड़क किनारे या उपवनों में अधिकांशतः पाया जाता है। नवंबर से मार्च तक के महीनों में अपने गुलाबी व जामुनी रंगों के फूलों से लदा ये वृक्ष अपनी सुंदरता से सहज ही सबका मन मोह लेता है।

 

सन् 1880 ई. में हांगकांग के ब्रिटिश गवर्नर सर् हेनरी ब्लेक(वनस्पतिशास्त्री) ने अपने घर के पास समुद्र किनारे कचनार का वृक्ष पाया था। उन्हीं के सुझाये हुये नाम पर कचनार का वानस्पतिक नाम बहुनिया ब्लैकियाना पड़ गया। कचनार हांगकांग का राष्ट्रीय फूल है और इसे आर्किड ट्री के नाम से भी जाना जाता है। भारत में मुख्यतः कचनार के नाम से ही जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कन्दला या कश्चनार कहते हैं। भारत में यह उत्तर से दक्षिण तक सभी जगह पाया जाता है।

 

कचनार के पेड़ की लंबाई 20 फीट से 40 फीट तक होती है। कचनार अपनी पत्तियों के आकार के कारण सहज ही पहचान में आ जाता है। पत्तियाँ गोलाकार होती हैं और अग्रभाग से दो भागों में बँटी होती हैं। मध्य रेखा से आपस में जुड़ी होती हैं। इसकी पत्तियों की तुलना ऊँट के खुर से भी की जाती है। कचनार के गुलाबी रंग के फूल के पेड़ों में जब फूल आने शुरू होते हैं तो अधिकांशतः पत्तियाँ झड़ जाती हैं। जामुनी रंग के कचनार के पेड़ों में प्रायः फूलों के साथ पत्तियाँ भी रहती हैं। कचनार के फूलों में पाँच पँखुरियां होती हैं और फूलों से भीनी सुगंध आती है।

 

कचनार के पेड़ भूस्खलन को भी रोकते हैं। कचनार के फूल की कली देखने में भी सुंदर होती है और खाने में स्वादिष्ट भी। कचनार के वृक्ष अनेक औषधि के काम आते हैं व इससे गोंद भी निकलता है। कचनार की पत्तियाँ दुधारू पशुओं के लिये अच्छा आहार होती हैं।

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Monday, December 1, 2025


बरस रही है चाँदनी,

चमक रहे हैं रेतीले तट।

नदी और  सागर हों,

चाहें कितनी दूरी पे,

एक गगन की छाया में

धड़कने हैं एक दोनों की।

            डॉ. मंजूश्री गर्ग